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कोर्ट बदली, पर किशोर के ‘काले खेल’ नहीं बदले: टैक्स चोर गुटखा माफिया की कानूनी चालों पर फिर सवाल; सुनवाई टली, लेकिन क्या सच से बच पाएगा ‘फर्जीवाड़े’ का यह जाल

Khulasa First

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संवाददाता

27 मार्च 2026, 2:33 pm
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कोर्ट बदली, पर किशोर के ‘काले खेल’ नहीं बदले

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
गुटखा माफिया, फर्जी अखबारी सर्कुलेशन, करोड़ों की टैक्स चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे कारनामे करने वाला आरोपी किशोर वाधवानी का मामला कानूनी दांव-पेच, दस्तावेजी हेराफेरी और सिस्टम को उलझाने की कोशिशों का बड़ा उदाहरण बन रहा है। गुरुवार को इस बहुचर्चित प्रकरण में सुनवाई होना थी, लेकिन इससे पहले ही एक अहम प्रशासनिक बदलाव ने पूरे केस की दिशा पर नई चर्चा छेड़ दी।

एडीजे न्यायाधीश शुभ्रा सिंह की अदालत में चल रहा मामला एडीजे अशोक भारद्वाज की कोर्ट में पहुंच गया। सुनवाई इसी कारण आगे नहीं बढ़ सकी लेकिन सवाल सिर्फ कोर्ट बदलने का नहीं है। असल सवाल है क्या आरोपी किशोर वाधवानी लगातार कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल खुद और अपने नेटवर्क को राहत दिलाने के लिए कर रहा है?

और उससे भी बड़ा सवाल कि क्या यह पूरा मामला महज टैक्स गड़बड़ी का है या अखबार, विज्ञापन, सर्कुलेशन और कारोबार की आड़ में खड़ा किया गया बड़ा आर्थिक अपराध? यह केस अब उस मोड़ पर है, जहां अदालत में हर अगला कदम सिर्फ तारीख नहीं, बल्कि पूरे कथित फर्जीवाड़े की परतें खोलने वाला पड़ाव बनेगा।

कोर्ट बदलने के पीछे क्या है कहानी?
आरोपी किशोर वाधवानी ने पहले अपने केस को जज शुभ्रा सिंह की अदालत से हटाने के लिए मुख्य जिला एवं सत्र न्यायाधीश की कोर्ट में आवेदन किया था। उसमें दलील दी गई थी जज शुभ्रा सिंह के पिता और हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस शंभू सिंह से उसके ‘घनिष्ठ संबंध’ रहे हैं, इसलिए निष्पक्ष सुनवाई और भविष्य के विवाद से बचने के लिए केस को दूसरी अदालत में ट्रांसफर किया जाए।

यह दलील बेहद असामान्य मानी गई, क्योंकि सामान्य तौर पर आरोपी पक्ष तभी ऐसी आपत्ति उठाता है जब उसे यह महसूस होने लगे कि अदालत लगातार सुनवाई कर रही है, अनावश्यक राहत नहीं दे रही और केस को निर्णायक मोड़ तक ले जाने के मूड में है। सूत्रों के अनुसार जज शुभ्रा सिंह 17 सितंबर 2025 से 15 जनवरी 2026 तक इस केस की सुनवाई कर चुकी थीं और आरोपों पर बहस आगे बढ़ाने के पक्ष में थीं।

लंबे अंतराल वाली तारीखें देने के बजाय मामले को फ्रेमिंग ऑफ चार्ज यानी आरोप तय करने के चरण तक पहुंचा रही थीं। इससे आरोपी पक्ष की बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक था। हालांकि, जज शुभ्रा सिंह की ओर से स्पष्ट किया गया था उनके पिता का अभियुक्तों से कभी कोई संबंध नहीं रहा।

यह भी बताया वे 2009 से मार्च 2012 तक विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट सीबीआई इंदौर रह चुकी हैं और उस दौरान भी अभियुक्तों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर चुकी हैं। इन सबके बावजूद, केस ट्रांसफर की कोशिश हुई। हालांकि पीडीजे की अदालत ने वाधवानी का स्थानांतरण आवेदन खारिज कर दिया था।

बाद में एडीजे अशोक भारद्वाज की नियुक्ति के बाद केस प्रशासनिक स्तर पर नई अदालत में ट्रांसफर हुआ यानी जिसे आरोपी पक्ष पहले आवेदन के जरिए हासिल नहीं कर पाया, वह अंततः प्रशासनिक पुनर्वितरण के जरिए हो गया। यही बिंदु अब कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय है।

सह आरोपी को बचाने की कोशिश- पूरा नेटवर्क बचाने की रणनीति?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार आरोप तय होने से ठीक पहले ऐसे आवेदन दाखिल करना अक्सर ‘राहत’ पाने की कोशिश नहीं होता, बल्कि पूरे केस की संरचना को कमजोर करने की रणनीति भी हो सकती है। इस तरह के आवेदन से ये संभावित फायदे आरोपी पक्ष को मिल सकते हैं- केस को लंबा खींचना। हर नया आवेदन बहस मांगता है, जवाब मांगता है और नई तारीखें पैदा करता है। यानी जहां केस आरोप तय होने की दिशा में बढ़ रहा था, वहां उसे फिर बहसों और तकनीकी बिंदुओं में उलझा दिया गया है।

केस टालने की शातिर रणनीति
इस केस को देखने वाले कई कानूनी पर्यवेक्षक मानते हैं कि आरोपी पक्ष की पूरी रणनीति फिलहाल एक ही धुरी पर घूमती दिख रही है समय खरीदो, संरचना बचाओ, और नेटवर्क की जिम्मेदारी बिखेर दो। इस रणनीति के संकेत कई जगह दिखते हैं जैसे कोर्ट बदलवाने की कोशिश, सह आरोपी को बचाने का आवेदन, आरोप तय होने से पहले नए विवाद खड़े करना, तकनीकी और प्रक्रियात्मक बिंदुओं को उछालना, मुख्य आरोपों से बहस को हटाकर ‘फंसाए जाने’ की लाइन बनाना।

लेकिन यहां एक बुनियादी बात आरोपी पक्ष के लिए समस्या है कि दस्तावेज झूठ नहीं बोलते, अगर जांच में टिक जाएं। अगर किसी एक अहम सह आरोपी को केस से बाहर कराया जाता है, तो अभियोजन पक्ष के लिए पूरे नेटवर्क की ‘साजिश’ या ‘सामूहिक भूमिका’ साबित करना मुश्किल हो सकता है।

बाद में मुख्य आरोपी यह तर्क भी दे सकता है जब सह आरोपी की भूमिका ही संदिग्ध नहीं रही, तो पूरा कथित षड्यंत्र कैसे माना जाए?यानी यह आवेदन सिर्फ पंकज मजेपुरिया के लिए राहत की कोशिश नहीं, बल्कि पूरे आर्थिक तंत्र की कानूनी ढाल तैयार करने का प्रयास भी हो सकता है।

फर्जी विज्ञापनों से दिखाई करोड़ों की कमाई

आरोपी किशोर पर फर्जी विज्ञापन लेने का आरोप है उसने कई ऐसे विज्ञापन दिखाए गए जो वास्तव में कभी प्रकाशित ही नहीं हुए लेकिन उनके नाम पर बिल बनाए गए, एंट्री पास की गई,आय दिखाई गईऔर काले धन को वैध कमाई का रूप देने की कोशिश की गई। यानी कोई विज्ञापन अखबार में छपा ही नहीं, लेकिन उसके नाम पर बिल बना, भुगतान दिखा, आय दर्ज हुई तो यह सिर्फ हिसाब की गड़बड़ी नहीं, बल्कि दस्तावेजी धोखाधड़ी का सुनियोजित पैटर्न है और यही वह बिंदु है जहां यह मामला एक सामान्य कारोबारी विवाद से निकलकर आर्थिक अपराध की श्रेणी में प्रवेश करता है। प्रवर्तन निदेशालय ( ईडी) की जांच के अनुसार वर्ष 2017-18 से 2019-20 के बीच करीब 11.66 करोड़ रुपए की कथित मनी लॉन्ड्रिंग की गई। मनी लॉन्ड्रिंग का मतलब सिर्फ पैसा इधर-उधर करना नहीं बल्कि अवैध या संदिग्ध स्रोत से आए धन को वैध कारोबार की कमाई के रूप में पेश करना भी होता है। ईडी के मुताबिक अखबार की करीब 2.80 करोड़ प्रतियों की बिक्री दिखाई गई और प्रति कॉपी दो रुपए के हिसाब से आय दर्शाई गई।

नई कोर्ट, पुराना सवाल: आरोप कब तय होंगे?
अब यह मामला एडीजे अशोक भारद्वाज की अदालत में है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सुनवाई जल्द फिर पटरी पर लौटेगी? या आरोपी पक्ष यहां भी नए आवेदन, नई आपत्तियां और नई कानूनी दीवारें खड़ी करेगा? लंबित आवेदनों पर सुनवाई,सह आरोपी की भूमिका पर बहस और सबसे अहम आरोप तय करने की प्रक्रिया।

अगर अदालत आरोपी पक्ष की आपत्तियों को खारिज कर देती है, तो यह आरोपी किशोर वाधवानी और उसके नेटवर्क के लिए बड़ा झटका होगा क्योंकि उसके बाद केस सीधे उस मुकाम पर पहुंच जाएगा जहां सबूतों, दस्तावेजों और भूमिकाओं की कानूनी जांच शुरू होगी। अगर आरोपी पक्ष को किसी भी स्तर पर राहत मिलती है, तो यह अभियोजन के लिए चुनौती पैदा कर सकता है।

आरोपी किशोर वाधवानी पर लगे आरोप सिर्फ वित्तीय अपराध तक सीमित नहीं हैं। एक और बड़े प्रश्न को जन्म देता है क्या मीडिया संस्थान की विश्वसनीयता का इस्तेमाल कथित आर्थिक खेल के लिए किया गया? अगर अखबार की आड़ में फर्जी सर्कुलेशन दिखा, फर्जी विज्ञापनों से फर्जी आय दर्शाई गई और टैक्स व मनी ट्रेल को मोड़ा गया तो यह सिर्फ कारोबारी अपराध नहीं, बल्कि जनविश्वास के साथ भी धोखा है। यही कारण है केस आम टैक्स मामलों से कहीं ज्यादा गंभीर माना जा रहा है। फिलहाल इतना साफ है कोर्ट बदल गई है, लेकिन आरोपी किशोर वाधवानी पर लगे आरोप नहीं।

सुनवाई टली, लेकिन शक और गहरा गया
अपर लोक अभियोजक योगेश जायसवाल के मुताबिक नई अदालत में केस आने के कारण कल सुनवाई नहीं हो सकी। वे भले ही तकनीकी रूप से इसे सामान्य प्रक्रिया बता रहे हैं लेकिन इस संदर्भ में इसे महज तकनीकी बदलाव मान लेना जल्दबाजी होगी। आरोप तय होने से पहले आरोपी पक्ष ने नया कानूनी दांव चल दिया था।

आरोपी किशोर वाधवानी ने अपने ही नेटवर्क से जुड़े सह-आरोपी पंकज मजेपुरिया को बचाने के लिए अदालत में एक आवेदन पेश किया था, जिसमें कहा गया उसे गलत तरीके से फंसाया गया है और उसके खिलाफ कोई ठोस आधार नहीं है। यह आवेदन सामान्य नहीं था क्योंकि जब पूरा केस एक कथित आर्थिक नेटवर्क, फर्जी दस्तावेज, फर्जी सर्कुलेशन, फर्जी विज्ञापन और टैक्स चोरी के आरोपों पर टिका हो, तब उसी नेटवर्क के एक आरोपी को ‘निर्दोष’ साबित करने की कोशिश कई नए सवाल उठाती है।

बड़ा सवाल यही कि पंकज मजेपुरिया की कोई भूमिका नहीं थी तो फिर जांच एजेंसियों ने उसे नेटवर्क का हिस्सा क्यों माना? और थी तो आरोपी पक्ष उसे अलग निकालने की इतनी जल्दबाजी में क्यों है?

अखबार की आड़ में ‘कागजी साम्राज्य’ खड़ा करने का आरोप
जांच एजेंसियों के मुताबिक किशोर वाधवानी और उससे जुड़ा नेटवर्क ‘दबंग दुनिया’ अखबार को सिर्फ मीडिया प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि एक कथित वित्तीय संरचना की तरह इस्तेमाल कर रहा था। आरोप है अखबार का वास्तविक सर्कुलेशन बेहद कम था, लेकिन दस्तावेजों में इसे कई गुना ज्यादा दिखाया गया।

जहां जमीन पर 5 से 8 हजार प्रतियां बिकने की बात सामने आई, वहीं कागजों में 60 हजार से 1 लाख प्रतियां तक का सर्कुलेशन दिखाया गया। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अखबार कितना बिका। सवाल है दस्तावेजों में लाखों प्रतियां दिखाकर आखिर किस चीज को वैध ठहराया जा रहा था?

क्योंकि सर्कुलेशन बढ़ाकर दिखाने का सीधा फायदा होता है। विज्ञापन दरें बढ़ाई जा सकती हैं। अधिक बिक्री दिखाकर नकद प्रवाह को वैध बनाया जा सकता है। कारोबार की ‘विश्वसनीयता’ बढ़ाई जा सकती है। टैक्स, आय और लेखा-जोखा का ऐसा ढांचा खड़ा किया जा सकता है जो असलियत से बिल्कुल अलग हो।

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