‘मनी लांड्रिंग‘ का उत्तम ठिया: धीरेंद्र ब्रह्मचारी, चंद्रास्वामी से चला सिलसिला उत्तम स्वामी तक आया
KHULASA FIRST
संवाददाता

‘ऊपरी कमाई' खपाने में सत्ता-सरकार को रास आते संत-महंत
नेता-अफ़सर-बिल्डर्स और सरकारों के गठजोड़ से बनते संत-महंत क्या सनातन का भला कर रहें?
'काली कमाई' को सफ़ेद बनाने के काम आ रहे हैं क्या मठ-मंदिर-आश्रम-ट्रस्ट, जांच का विषय
उत्तम स्वामी के अनुयायियों में इंदौर के भी कई भाजपा नेता, प्राधिकरण की कुर्सी के लिए भी बनवाया था दबाव
असली भक्तों को अब भी स्वामी पर भरोसा, 'नकली भक्तों' ने आरोप लगते ही किनारा किया
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सत्ता के साकेत में सुख पाने और फिर उसी सत्ता के हाथों सब कुछ गंवाने वाले कथित संतों-महंतों का सिलसिला चार-पांच दशक से देश में बरकरार है। ये सिलसिला धीरेंद्र ब्रह्मचारी, चंद्रास्वामी से होता हुआ उत्तम स्वामी तक आ गया। अपने-अपने समय में इनके दरबार में सत्ता व सरकारें दंडवत करती रहीं, लेकिन बाद में वे इसी सत्ता के शिकार होकर हाशिये पर चले गए।
कभी आसाराम की भी तूती बोलती थी। फिर देश ने देखा कि उनकी कैसे बोलती बंद हुई। उत्तम स्वामी भी आसाराम की तरह ‘त्रिया चरित्र' का शिकार हो गए, लेकिन अनुयायियों के मामले में आसाराम जैसे भाग्यशाली नहीं रहे। आसाराम के भक्तों की आज भी एक बड़ी संख्या उनकी पेशी पर जुटती है और अपने संत को बेदाग मानती है।
उत्तम स्वामी से लाभ लेने वाले अनुयायी तो बेहद डरपोक निकले। सप्ताहभर होने को आया, सबकी बोलती बंद है। साथ आना तो दूर, इन अनुयायियों ने इस बात में दिन-रात एक कर दिए कि कहीं महाराज से हमारी नजदीकी का खुलासा न हो। डीपी व सोशल मीडिया से स्वामीजी के साथ की तस्वीरें ही नहीं हटी, बल्कि दुकानों पर लगे फोटो भी तुरत-फुरत हट गए। इंदौर का एक मशहूर कुल्फी-गजक वाला इसमें अव्वल रहा।
क्या उत्तम स्वामी का वजूद, रसूख, व्यक्तित्व व साम्राज्य ‘मनी लांड्रिंग' का ‘उत्तम' ठिया-ठिकाना था? क्या इसलिए ही अफसर, बिल्डर, डिजाइनर, नेता, मंत्री, विधायक और यहां तक कि मुख्यमंत्री भी उनके मुरीद थे? मामला सिर्फ दुष्कर्म की जांच तक ही सीमित रहेगा या जांच के दायरे में काली कमाई को सफेद करने के ‘धार्मिक गठजोड़' को भी जांचा जाएगा? उत्तम स्वामी के भूमिगत होते ही ये सवाल सामने आया है कि जांच के दायरे में स्वामी का सिर्फ निजी आचरण ही नहीं, सार्वजनिक क्रियाकलाप भी हो।
स्वामी से ‘आहत' तबके का कहना है कि अगर ऐसा हुआ तो कालेधन को सफेद करने के एक बड़े खेल का खुलासा होने के आसार हैं। इस खेल में इंदौर के नेताओं के भी शामिल होने की अब चर्चा आम है। दुष्कर्म मामला आने के बाद स्वामी की शुरुआती गर्मी अब नरम हो गई और वे स्वयं भूमिगत हो गए हैं।
कानून की भाषा में इसे फरार होना मुकर्रर किया गया है। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्री, विधायकों के गुरु व कथावाचक की मुश्किलें बढ़ गई हैं। दुष्कर्म के आरोपों के बाद स्वामी के खिलाफ़ नई दिल्ली के एक थाने में कार्रवाई शुरू हो गई है। एक महिला जांच अधिकारी पीड़िता के बयान दर्ज कर रही हैं।
उधर, उत्तम स्वामी के हाईप्रोफाइल कनेक्शन और अनुयायियों से प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से मिल रही धमकी की शिकायत के बाद दिल्ली पुलिस ने पीड़िता को सुरक्षा प्रदान की है। दरअसल, राजस्थान निवासी पीड़िता ने स्वामी पर धर्म की आड़ में कई बार दुष्कर्म करने के गंभीर आरोप लगाए थे।
पीड़िता ने 12 फरवरी को दिल्ली पुलिस कमिश्नर को ई-मेल भेजकर उसे व परिवार को 24 घंटे पुलिस सुरक्षा देने की मांग की थी। पीड़िता ने बताया था कि खुद को आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रचारित करता है स्वामी और उसके बड़ी संख्या में अनुयायी हैं। आरोप है कि जैसे ही स्वामी को भनक लगी कि पीड़िता एफआईआर करवा सकती है, तो धमकियां दी गईं।
मुख्यमंत्री के प्रति महाराज की नाराजगी और व्यवहार चर्चा में
स्वामी पर मनी लांड्रिंग के आरोप के अलावा जिस बात की मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा चर्चा है, वह है स्वामीजी का व्यवहार। सवाल ये उठ रहा है कि आखिर स्वामीजी में ऐसा क्या था कि वे सीएम तक को सार्वजनिक फटकार लगा देते हैं? किसका सपोर्ट उन्हें सीएम को डपटने की ताकत दे रहा था?
किसी सूबे के मुखिया के साथ ऐसा व्यवहार तो आज तक कहीं देखने-सुनने में नहीं आया। साधु, संतो, महंतों और महामंडलेश्वर जमात के मुखिया स्वयं जूना पीठाधीश्वर अपने विनम्र स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। वे उत्तम स्वामी से कई गुना ज्यादा राजनीतिक लोगों के साथ समागमों का हिस्सा होते हैं, लेकिन कहीं से भी आज तक उनकी इस तरह की नाराजगी सामने नहीं आती।
सिवाय फर्जी शंकराचार्यों के ‘साधु बेला' को जीते संत कहीं सार्वजनिक रोष जाहिर करते नजर नहीं आते। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के प्रति उत्तम स्वामी का आक्रोश आखिर किसकी शह पर था? स्वयं की सिद्धि के बल पर या सत्ता समीकरणों के दम पर? इंदौर में भी महाराज के मुरीद भाजपा के कई स्थापित व उभरते नेता हैं। इंदौर विकास प्राधिकरण की कुर्सी के लिए भी स्वामी का दबाव सरकार पर था।
मजहबी कट्टरपंथी किरदारों के साथ स्वामी की मित्रता हैरतभरी
अब सब कुछ ‘दिल्ली' की नीयत पर निर्भर है। वह अगर ‘हस्तक्षेप' न करेगी तो धर्म की दुनिया के अंदर चल रहे इस तरह के खेल का पूरा खुलासा हो पाएगा। मामला अब सिर्फ ‘चोर को खांसी और संत को दासी' तक सीमित नहीं है। अब इसमें महाराज के संपर्क में निरंतर बने हुए रसूखदारों पर नजर है।
खासकर नवधनाढ्य व अवैध कमाई वाले लोग। इसमें अफसर, नेता सब शामिल हैं। महाराज का नाम अफसरों की मनमाफिक पोस्टिंग व ट्रांसफर से भी जुड़ा हुआ है। स्वामी कांड के बाद इंदौर के एक बड़े अधिकारी की मनोनुकूल तैनाती के किस्से अब यत्र-तत्र चर्चा में हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा का विषय स्वामी का मजहबी कट्टरपंथी रसूखदार के साथ उठने-बैठने का है। इस बात की पड़ताल अब भगवा ब्रिगेड में भी हो रही है कि आखिर स्वामी की ऐसे लोगों से अभिन्नता क्यों रही? वह भी तब, जब भगवा वाहिनी की एक इकाई का ऐसे तत्वों से आमना-सामना हो चुका है।
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