मुहाने पर आई आईडीए की लड़ाई: अध्यक्ष के लिए विधायकों के दो गुट बने; अंतिम मुहर सीएम की
KHULASA FIRST
संवाददाता

निगम-मंडल-प्राधिकरण में राजनीतिक नियुक्तियों की हलचल फिर हुई तेज
मुख्यमंत्री के साथ-साथ प्रदेश अध्यक्ष की इंदौर में रुचि, विजयवर्गीय भी अड़े
सुदर्शन, मुकेश, हरिनारायण, कमलेश, डागोर के नाम चर्चा में, तटस्थ नाम की अटकलें भी तेज
हमेशा की तरह शिवराज, नरेंद्रसिंह तोमर भी दिखा रहे इंदौर में रुचि, महिला विधायक जुटा रही मदद
‘जयपाल प्रयोग’ से बचने के लिए इंदौरी नेता फूंक-फूंककर बना रहे रणनीति
पुराने अफसरों की विदाई के बाद इंदौर विकास प्राधिकरण का मौजूदा सेटअप मांग रहा अनुभवी अध्यक्ष
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश की मोहन सरकार में एक बार फिर निगम-मंडल-प्राधिकरण में राजनीतिक नियुक्तियों की हलचलें तेज हुई हैं। इन हलचलों के बढ़ने से उन नेताओं की धुकधुकी तेज हो गई है। लाभ के इन पदों की दौड़ में ये तमाम नेता तब से दौड़ रहे हैं, जब से डॉ. मोहन यादव सरकार की ताजपोशी राज्य में हुई।
लेकिन दौड़ अब तक मुकम्मल नहीं हुई है। हर बार लगता है कि ये रेस बस थमने वाली है और नीली-पीली बत्ती को लालायित नेताओं को पद मिलने जा रहा है, लेकिन ‘लब तक आते-आते हाथों से दामन छूट जाता है…' की तर्ज पर सबकुछ धरा रह जाता है। सरकार भी चतुर-सुजान है।
वह इतनी जल्दी में भी नहीं कि लाभ के पद झटपट बांट दे। ऐसा कर गुजरी सरकार तो फिर महत्वाकांक्षी नेताओं की ‘सरकारी परिक्रमा’ जो थम जाएगी। सरकार का इकबाल तब तक ही बुलंद रहता है, जब तक वह कुछ देने की स्थिति में रहती है। लेकिन अब इंतजार ज्यादा लंबा खिंच गया और सरकार का कार्यकाल दो-ढाई बरस में सिमट गया। नतीजतन एक बार फिर सूबे में लाभ के पदों पर राजनीतिक नियुक्तियों की कवायद तेज हुई है।
इं दौर भी नियुक्तियों की कतार में खड़ा है। सबसे अहम तो यहां इंदौर विकास प्राधिकरण की कमाई वाली कुर्सी है। इस कुर्सी का किस्सा इस बार भी लंबा खिंचता जा रहा है। इंदौर विकास प्राधिकरण के अलावा प्रदेश के अन्य निगम मंडल में जाने को आतुर नेताओं की भी कमी नहीं।
प्राधिकरण नहीं तो किसी भी निगम मंडल में एडजस्ट होने की होड़ भी मची है, ताकि राजनीति चलती रहे। इस होड़ में नौनिहाल नेताओं से लेकर बुजुर्गियत की कतार में जाकर खड़े हो गए नेता भी लगे हुए हैं। इनमें चुनाव हारे हुए नेता भी हैं तो वे बेचारे भी, जिन्हें हर बार मुहाने पर आकर कुछ नहीं मिल पाता। ऐसे बेचारे फिर किसी न किसी कुर्सी के सहारे अपने राजनीतिक उदय की आस में भोपाल की तरफ टकटकी लगाए हुए हैं।
अपने-अपने राजनीतिक आकाओं के जरिये चुनावी मैदान में हारे हुए नेता हैं कि हार नहीं मान रहे। अनेकानेक पदों का लुत्फ लेने के बाद ऐसे नेताओं की कमी नहीं, जो आईडीए ही नहीं, अन्य निगम मंडल में जाने को आतुर हैं। जैसे ये नेता बिना पद के कालकवलित ही हो जाएंगे।
सब इन्हें ही दे दो, शेष को रहने दो की तर्ज पर ऐसे नेता बड़ी बेशर्मी से स्वाभाविक दावेदारों की राह में एक बार फिर रोड़ा बने हुए हैं। ऐसे नेताओं के आका वे बड़े नेता बने हैं, जिनके जिम्मे पार्टी में नूतन नेतृत्व खड़ा करने, गढ़ने की जिम्मेदारी है, न कि चले हुए-चुके हुए कारतूसों को पुनः दुनाली में ठूंसने के..!
फिलहाल मुख्य लड़ाई आईडीए अध्यक्ष की कुर्सी की है। सूत्रों की मानें तो ये लड़ाई अब मुहाने पर आ गई है। किसी भी वक्त प्राधिकरण अध्यक्ष की घोषणा के दावे भाजपाई राजनीति में गूंज रहे हैं। सोमवार रात तो एक पूर्व विधायक के नाम लेटर जारी होने की खबरें भी तेजी से जुड़ीं, लेकिन ये महज अफवाह ही साबित हुई।
इंदौर की इस लड़ाई में प्रदेश स्तर के नेताओं में भी घमासान है, तो स्थानीय स्तर पर भी बड़े नेताओं में तलवारें खिंची हुई हैं। इस लड़ाई में सरकार के मुखिया से लेकर प्रदेश संगठन व मंत्रियों से लेकर विधायक भी दिन-रात एक किए हुए हैं। मध्य प्रदेश की राजनीति से दूर कर दिए गए नेता भी लाभ के पदों पर अपने समर्थकों को लाने में जुटे हुए हैं। ऐसे में आईडीए की कुर्सी का किस्सा दिलचस्प हो गया है।
इंदौर में तीन-तीन विधायकों के दो गुट बने
आईडीए अध्यक्ष को लेकर इंदौर भाजपा में दो गुट बन गए हैं। हालांकि ये गुट यूं भी इंदौर भाजपा की राजनीति में बने हुए हैं, लेकिन इस बार ‘खुल्ला खेल फर्रुखाबादी’ की तर्ज पर सतह पर से ही नजर आ रहा है।
एक तरफ मंत्री, मेयर, नगर अध्यक्ष व विधायक हैं, तो दूसरी तरफ प्रदेश संगठन के द्वितीय वरीयता वाले नेता की अगुआई में महिला विधायक समर्थन जुटा रही हैं।
बताते हैं महिला विधायक अपने सहित शहर के दो अन्य विधायकों का समर्थन भी जुटा चुकी हैं। यानी तीन-तीन विधायकों के दो गुट आईडीए की लड़ाई में शामिल हो गए हैं।
‘जयपाल प्रयोग' से भयभीत भी हैं दावेदार नेता
पद के दावेदारों में सुदर्शन गुप्ता, गोपीकृष्ण नेमा, मुकेश राजावत जैसे हमेशा की तरह चिरदावेदार फिर सामने हैं। नए दावेदारों में हरिनारायण यादव के अलावा कमलेश शर्मा, वीरेंद्र व्यास व मुकेश डामोर के चौंकाने वाले नाम भी हैं। इससे हटकर तटस्थ व चौंकाने वाले नाम की अटकलें भी हैं।
दावेदार की तरफ से लड़ रहे नेता ‘जयपाल प्रयोग’ से भी भयभीत हैं कि ऐसा न हो कि आपस की लड़ाई में कोई बाहर का नेता इंदौर में थोप दिया जाए। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ऐसा कर गुजरे हैं। लिहाजा इंदौर की लड़ाई इंदौर से ही लड़ने के मन के साथ फिलहाल भाजपा में घमासान मचा हुआ है।
मुख्यमंत्री को दिल्ली से मिला हुआ है फ्री-हैंड
लाभ के पद की इस लड़ाई में अंतिम फैसला मुख्यमंत्री के हाथों में ही रहना है और सूत्र बताते हैं कि वे तय कर चुके हैं कि आईडीए किसके हाथ में देना है। वैसे भी निगम मंडल व प्राधिकरण की नियुक्तियों पर सीएम का एकाधिकार रहता आया है।
इस बार तो इस मामले में मुख्यमंत्री को दिल्ली से फ्री-हैंड भी मिला है कि कोई जरूरी नहीं एक निश्चित टाइम लाइन में ही मनोनयन करें। मनोनुकूल व मुफीद माहौल होने तक वे इंदौर का फैसला टाल भी सकते हैं।
इस मुद्दे पर सीएम व कैलाश विजयवर्गीय के बीच भी तालमेल बनने की खबरें आ रही हैं। इस काम में आरएसएस के एक बड़े नेता की भूमिका बताई जा रही है।
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