अदालत में नहीं टिक पाए नीमा परिवार पर लगे आरोप: अब सवाल आखिर हत्यारा कौन; पुलिसकर्मी, तहसीलदार, डॉक्टर हुए पक्षद्रोही
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
चर्चित ड्राइवर अपहरण और हत्याकांड में जिला अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए हेमंत नीमा, उनके बेटे पीयूष और अन्य 10 आरोपियों को बरी कर दिया। स्पष्ट किया फैसला इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि अभियोजन पक्ष आरोपों को प्रमाणित नहीं कर सका, हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि अपराध हुआ।
फैसले में अदालत ने विशेष टिप्पणी की कई अहम गवाह, जिनमें पुलिसकर्मी, तहसीलदार और डॉक्टर शामिल हैं, ट्रायल के दौरान पक्षद्रोही हो गए। अदालत ने संकेत दिया गवाहों की भूमिका ने केस की दिशा बदल दी और इसी वजह से अभियोजन पक्ष अपने दावे को कानूनी तौर पर साबित नहीं कर पाया।
पुलिस कमिश्नर को गवाहों की जांच का निर्देश
अदालत ने पुलिस कमिश्नर को निर्देशित किया है एएसआई भागीरथ जाट, तहसीलदार रितेश जोशी, डॉ. संजय वाधवानी, डॉ. नीरज गुप्ता और डॉ. जिनेंद्रकुमार सेठिया जैसे पक्षद्रोही गवाहों की भूमिका की जांच की जाए। जांच में यह देखा जाए ये गवाह स्वाभाविक रूप से पक्षद्रोही हुए या किसी लाभ, दबाव या प्रभाव के कारण।
अदालत की यह टिप्पणी दर्शाती है केस केवल आरोपियों की बरी होने की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे न्यायिक और जांच तंत्र की मजबूती और विश्वसनीयता पर भी सवाल है।
यह है मामला
घटना 10 मार्च 2020 की है। प्रमोद मतकर, जो कभी नीमा परिवार का ड्राइवर था, संदिग्ध परिस्थिति में लापता हुआ। बाद में उसका शव भेरूघाट जंगल में बरामद हुआ। पोस्टमॉर्टम में हत्या की पुष्टि हुई और शरीर पर क्रूरतापूर्वक मारपीट के निशान पाए गए।
विवेचना में पता चला प्रमोद कभी हेमंत नीमा के यहां ड्राइवर था। पुलिस का दावा था हेमंत नीमा के बेटे पीयूष के साथ उसके संबंध थे। इस विवाद के चलते उसे निशाना बनाया गया और उनका अपहरण कर बंगले पर लाकर क्रिकेट बैट से मारपीट की गई।
हत्या कर शव जंगल में फेंक दिया गया था। इस केस ने शहर में चर्चा का विषय इसलिए बनाया क्योंकि इसमें एक रसूखदार कारोबारी परिवार का नाम सामने आया। पुलिस ने पूर्वनियोजित हत्या का केस बताया और प्रारंभिक चार्जशीट में सभी आरोपियों को शामिल किया।
आगे क्या हो सकता है- अदालत ने गवाहों की भूमिका की जांच के निर्देश दिए हैं, जिससे केस में नई संभावना खुली है। यदि जांच में सामने आता है गवाहों ने किसी लाभ, दबाव या प्रभाव के चलते बयान बदले, तो यह नया कानूनी अध्याय खोल सकता है। फैसले से नीमा परिवार को कानूनी राहत जरूर मिली है, लेकिन अदालत की टिप्पणी संकेत देती है कहानी अभी भी सवालों के घेरे में है। अदालत ने पुन: स्पष्ट किया है साक्ष्य और गवाहों की विश्वसनीयता ही कानून की अंतिम कसौटी हैं।
बरी हुए ये आरोपी
अदालत ने हेमंत नीमा, पीयूष नीमा, जगदीश, रितेश, राहुल, हरीश, सुरेंद्र सिंह, शेखर, लोकेश, मोहन, व्यापक और कुणाल को बरी कर दिया। सभी की पैरवी सीनियर एडवोकेट अविनाश सिरपुरकर ने की। हालांकि, स्पष्ट किया बरी होने का मतलब यह नहीं कि आरोप झूठे थे, बल्कि दर्शाता है साक्ष्य पर्याप्त नहीं थे। अदालत की यह टिप्पणी कानून और जांच व्यवस्था पर गंभीर सवाल है, दिखाती है कई हाई-प्रोफाइल मामले गवाहों और जांच एजेंसियों के प्रदर्शन पर निर्भर हैं।
अदालत की टिप्पणी का असर
अदालत ने फैसले में साफ किया यह केवल साक्ष्य और गवाहों के आधार पर दिया गया निर्णय है। गवाहों ने अपने पुराने बयानों से पलट कर अभियोजन की कहानी कमजोर कर दी। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है इस मामले ने साबित किया अदालत में सनसनी या आरोप नहीं चलते, बल्कि सबूत और गवाहों की विश्वसनीयता सबसे अहम है।
गवाहों का पलटना, चाहे अनजाने में हो या दबाव के कारण, पूरे केस की दिशा बदल देता है। अब सवाल है अगर नीमा परिवार ने हत्या नहीं की है तो हत्यारा कौन है ?
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