सरकारी जमीन पर कब्जे के सिंडिकेट का खुलासा!: ‘तिकोना गार्डन’ मामले ने खोली प्रशासनिक मिलीभगत की परतें, अब अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

निगम ने पहले दी अनुमति, खुलासा होते ही पलटी, करोड़ों की शासकीय जमीन पर अवैध निर्माण का खेल
खुलासा फर्स्ट...इंदौर।
छत्रीबाग स्थित बहुचर्चित ‘तिकोना गार्डन’ विवाद अब केवल अवैध निर्माण का मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसने सरकारी जमीनों पर कब्जे, फर्जी दस्तावेजों और प्रशासनिक संरक्षण के पूरे खेल का खुलासा किया है।
नगर पालिका निगम इंदौर ने खुद स्वीकार किया है कि जिस जमीन पर भवन अनुज्ञा जारी की गई थी, वह राजस्व रिकॉर्ड में शासकीय भूमि दर्ज है। इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो गया है कि आखिर सरकारी बगीचे की जमीन पर भवन अनुमति जारी कैसे हुई?
फर्जी दस्तावेजों के दम पर सरकारी जमीन पर निर्माण: जनसुनवाई में शिकायत पहुंचने के बाद निगम हरकत में आया। दस्तावेजों के अनुसार भूखंड क्रमांक 72 पर 14 अगस्त 2025 को भवन अनुमति जारी की गई थी, जिसके बाद मौके पर निर्माण शुरू हुआ।
आरोप है कि संबंधित भूमि शासकीय बगीचे की है, जिस पर निजी निर्माण की अनुमति नहीं दी जा सकती। शिकायत के साथ वर्ष 1982 की कब्जा रसीद, 1962 का स्वीकृत अभिन्यास और हाई कोर्ट में शासन द्वारा प्रस्तुत जवाब भी लगाया गया था, जिसमें जमीन को सरकारी बताया गया था। इसके बावजूद न तो निर्माण रोका गया और न ही अनुमति निरस्त की गई।
राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी जमीन, फिर किसके इशारे पर मिली अनुमति?
अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) मल्हारगंज की रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख किया गया कि संबंधित निर्माण शासकीय भूमि सर्वे क्रमांक 911 एवं 912 पर पाया गया। सीमांकन में ‘तिकोना बगीचा’ भूमि पर निर्माण की पुष्टि हुई। इसके बाद निगम ने स्वीकार किया कि कथित कूटरचित दस्तावेजों और तथ्य छुपाकर भवन अनुमति हासिल की गई। अब सवाल यह उठ रहा है कि भवन अनुमति जारी करने से पहले निगम के जिम्मेदार अधिकारियों ने भूमि रिकॉर्ड की जांच क्यों नहीं की? यदि जमीन सरकारी थी तो अनुमति देना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित मिलीभगत का संकेत माना जा रहा है।
क्या शहर में चल रहा है सरकारी जमीनों का बड़ा खेल?: मामले ने यह आशंका भी गहरा दी है कि शहर में ऐसे कई प्रकरण हो सकते हैं, जहां सरकारी जमीनों को निजी बताकर बेचा गया या उन पर व्यावसायिक निर्माण कर करोड़ों रुपए का खेल किया गया। आरोप है कि फर्जी दस्तावेज तैयार कर शासकीय संपत्तियों पर कब्जा करने और फिर किराया वसूली करने का संगठित नेटवर्क सक्रिय है। अब मांग उठ रही है कि केवल भवन अनुमति निरस्त करना पर्याप्त नहीं है। फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों, जमीन के सौदों में शामिल लोगों और अनुमति जारी करने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी विस्तृत जांच होनी चाहिए।
शिकायतकर्ता बोले- ‘जब निर्माण अवैध है तो कारोबार कैसे वैध?’ स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जिस निर्माण को स्वयं निगम ने अवैध माना है, वहां संचालित दुकानों और व्यावसायिक गतिविधियों को तत्काल बंद कर सील किया जाना चाहिए। साथ ही भूसारी कार्यालय से संचालित कथित जमीन संबंधी अवैध गतिविधियों पर भी रोक लगाने की मांग उठ रही है। लोगों का आरोप है कि वर्षों तक सरकारी जमीन पर निर्माण होता रहा, किराया वसूला जाता रहा और प्रशासनिक विभाग आंखें मूंदे बैठे रहे। अब मामला सार्वजनिक होने के बाद कार्रवाई केवल नोटिसों तक सीमित दिखाई दे रही है।
तहसील के आदेशों की खुली अवहेलना, संरक्षण देने वालों पर उठ रहे सवाल
नगर निगम के नोटिस में उल्लेख है कि तहसील मल्हारगंज द्वारा 9 अप्रैल 2026 को निर्माण तत्काल बंद करने के आदेश दिए गए थे, लेकिन निर्माण जारी रहा। इससे यह सवाल और गहरा गया है कि आखिर किसके संरक्षण में सरकारी भूमि पर निर्माण कार्य चलता रहा?
शिकायत नहीं होती तो क्या वर्षों तक चलता रहता अवैध निर्माण?
नगर निगम ने अब म.प्र. भूमि विकास नियम 2012 के नियम 25 के तहत भवन अनुमति निरस्त करते हुए 15 दिन के भीतर अवैध निर्माण हटाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही चेतावनी दी गई है कि निर्माण नहीं हटाने पर सीलिंग और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जाएगी। लेकिन पूरे घटनाक्रम ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। शहर में अब यह चर्चा तेज है कि यदि शिकायत नहीं होती तो क्या यह निर्माण वर्षों तक वैध मानकर चलता रहता? क्या बिना प्रशासनिक संरक्षण के सरकारी जमीन पर निर्माण, व्यवसाय और किराया वसूली संभव थी? मांग उठ रही है कि कब्जाधारियों पर कार्रवाई के साथ ही भवन अनुमति जारी करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय हो।
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