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चमोली का बैरासकुंड मंदिर: जहां लंकापति रावण ने महादेव को रिझाने के लिए हवन कुंड में सौंप दिए थे अपने नौ सिर

KHULASA FIRST

संवाददाता

03 जुलाई 2026, 8:00 pm
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चमोली का बैरासकुंड मंदिर

दशानन के नाम पर पड़ा गढ़वाल के ‘दशोली’ का नाम! पढ़िए चमोली के सुदूर अंचल में रावण की रोंगटे खड़े करने वाली शिव-साधना

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
बद्रीनाथ मार्ग के पास दशोली विकासखंड में छिपा है वो अलौकिक स्थान, जहां दशानन के घोर हठ और रक्त-तप के आगे डोल गया था भोलेनाथ का आसन; आज भी गवाही देता है वो प्राचीन महाकुंड।महाकाव्य रामायण के खलनायक और लंका के अधिपति रावण को आमतौर पर केवल उसके अहंकार और अधर्म के लिए याद किया जाता है। लेकिन इसके समानांतर, इतिहास उसे एक प्रकांड विद्वान, अद्वितीय ज्योतिषी और भगवान शिव के सबसे बड़े उपासकों में से एक मानता है। जब भी रावण की कठिन तपस्या और शिव-साधना की बात आती है, तो आम जनमानस का ध्यान श्रीलंका के अशोक वाटिका क्षेत्र या दक्षिण भारत के रामेश्वरम के तटीय अंचलों की ओर जाता है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि साक्षात महादेव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने जिस परम पावन और दुर्गम स्थली पर अपने जीवन की सबसे कठिन परीक्षा दी थी, वह सुदूर दक्षिण में नहीं बल्कि देवभूमि उत्तराखंड के गढ़वाल अंचल में स्थित है। चमोली जिले के दशोली विकासखंड के पहाड़ी आंचल में छिपा ‘बैरासकुंड मंदिर’ वह साक्षात गवाह है, जहां लंकापति रावण ने महादेव को रिझाने के लिए यज्ञ करते हुए एक-एक कर अपने नौ सिर काट कर हवन कुंड की अग्नि को सौंप दिए थे।

दशानन से बैरासकुंड का नाता और दशोली की पौराणिक पृष्ठभूमि... चमोली का यह शांत और सुरम्य इलाका पौराणिक काल में रावण के नाम और उसकी उपस्थिति से गहरा संबंध रखता है। यहां के विकासखंड का नाम ‘दशोली’ होना भी रावण के ‘दशानन’ (दस सिर वाले) स्वरूप की ओर ही इशारा करता है। स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित कथाओं और स्थानीय लोक-आख्यानों के अनुसार, त्रेतायुग में रावण ने त्रिलोक विजय का वरदान पाने और भगवान शिव को रिझाकर अजेय होने के लिए हिमालय के इसी निर्जन स्थान को चुना था।

उस काल में इस स्थान की नीरवता और प्राकृतिक ऊर्जा घोर तांत्रिक और आध्यात्मिक साधना के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती थी। रावण ने यहाँ आकर एक विशाल यज्ञशाला का निर्माण किया, जिसमें उसने भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए सहस्र वर्षों का महायज्ञ और कठोर अनुष्ठान प्रारंभ किया।

भक्ति की पराकाष्ठा, नौ सिरों का समर्पण और महादेव का प्रकट होना... महायज्ञ के दौरान जब सैकड़ों वर्ष बीत जाने पर भी आशुतोष भगवान शिव प्रकट नहीं हुए, तो रावण व्याकुल हो उठा। अपनी भक्ति और संकल्प को सिद्ध करने के लिए उसने चरम मार्ग अपनाने का निश्चय किया। यज्ञ की धधकती अग्नि के सामने बैठकर रावण ने घोर गर्जना के साथ अपने पहले सिर को काटा और उसे भगवान शिव के चरणों की आहुति मानकर हवन कुंड में समर्पित कर दिया। इसके बावजूद महादेव की समाधि नहीं टूटी। फिर क्या था, अपनी जिद और निष्ठा की पराकाष्ठा पर पहुंचे रावण ने एक-एक कर, अलग-अलग कड़े अनुष्ठानों के बाद अपने नौ सिर काट कर उस पवित्र अग्नि कुंड में स्वाहा कर दिए।

जब यज्ञशाला पूरी तरह से रक्त और तप की ऊर्जा से भर गई, और रावण अपने अंतिम यानी दसवें सिर की आहुति देने के लिए खड्ग उठाने ही वाला था, तब ब्रह्मांड की इस सबसे कठिन भक्ति को देखकर भोलेनाथ का आसन डोल गया। भगवान शिव ने तुरंत प्रकट होकर रावण का हाथ थाम लिया। महादेव ने रावण की इस अभूतपूर्व और रोंगटे खड़े कर देने वाली साधना से प्रसन्न होकर न केवल उसके कटे हुए सभी नौ सिरों को वापस जोड़कर उसे पुनर्जीवित किया, बल्कि उसे अमोघ शक्तियां, अद्वितीय पराक्रम और सोने की लंका का स्वामी होने का वरदान भी दे दिया।

वर्तमान स्वरूप: आज भी विस्मय जगाता है प्राचीन हवन कुंड और मंदिर... आज के दौर में जब कोई खोजी पर्यटक या आस्थावान श्रद्धालु बद्रीनाथ मार्ग से हटकर पहाड़ों के बीच बसे बैरासकुंड मंदिर पहुंचता है, तो इतिहास की यह अद्भुत घटना उसकी आंखों के सामने जीवंत हो उठती है। मंदिर परिसर में आज भी वह अति प्राचीन और विशाल हवन कुंड (यज्ञवेदी) मौजूद है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसी कुंड में रावण ने अपने सिरों की आहुति दी थी। इस कुंड की बनावट और इसके आस-पास की भूगर्भीय संरचना बेहद प्राचीन है। मंदिर के गर्भगृह में एक अत्यंत प्राचीन शिवलिंग स्थापित है, जिसे ‘बैरासकुंड महादेव’ या ‘रावणेश्वर महादेव’ के नाम से जाना जाता है।

स्थानीय ग्रामीणों और पुजारियों के अनुसार, सदियों से इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालु इस स्थान की असीम ऊर्जा को महसूस करते हैं। विज्ञान और आधुनिक इतिहासकार भले ही दस सिरों के कटने और दोबारा जुड़ने की घटना को एक काव्यात्मक अतिशयोक्ति या पौराणिक रूपक मानते हों, लेकिन देवभूमि उत्तराखंड के इस अनछुए कोने के लिए यह एक अटूट और अकाट्य सत्य है।

यात्रा मार्ग का यह अनसुना पन्ना पाठकों और श्रद्धालुओं को यह सोचने पर मजबूर करता है कि भक्ति और संकल्प की ताकत कितनी असीम हो सकती है, जहां स्वयं भगवान को भी भक्त के हठ के आगे झुकना पड़ता है। बैरासकुंड का यह सफर चार धाम यात्रा पर आने वाले हर जिज्ञासु पाठक के लिए इतिहास के एक महान अध्याय को साक्षात छूने जैसा अनुभव है।

अंतिम आहुति के लिए उठा खड्ग और डोल गया महादेव का आसन: बैरासकुंड के उस ऐतिहासिक महायज्ञ का पूरा सच, बद्रीनाथ मार्ग से हटकर एक विस्मयकारी पड़ाव: क्यों हर शिवभक्त और खोजी पर्यटक के लिए अनिवार्य है ‘रावणेश्वर महादेव’ का यह दर्शन? त्रेतायुग की तपस्या का साक्षात प्रमाण! आज भी चमोली में मौजूद है वो रहस्यमयी हवन कुंड जहां रावण ने लहूलुहान की थी अपनी काया, देवभूमि की ये कंदराएं थीं गवाह! जब प्रकांड पंडित दशानन ने अपने ही हाथों काट डाले थे अपने नौ शीश।

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