नगर निगम को राहत: 8 वर्ष बाद मांगी अनुकंपा नियुक्ति की याचिका खारिज
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति कोई अधिकार या वंशानुगत रोजगार नहीं है, बल्कि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से उबारने के लिए दी जाने वाली एक विशेष राहत है। यदि परिवार लंबे समय तक अपना भरण-पोषण करता रहा है, तो वर्षों बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की एकलपीठ ने अरविंद चावरे बनाम राज्य शासन एवं अन्य (डब्ल्यूपी क्रमांक 19620/2023) मामले में याचिका खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य नियमित रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि आकस्मिक आर्थिक संकट की स्थिति में परिवार को तत्काल सहायता देना है।
इंदौर नगर निगम को मिली कानूनी सफलता
मामले में इंदौर नगर निगम की ओर से अधिवक्ता अमेय बजाज ने पक्ष रखा। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अनुकंपा नियुक्ति को नौकरी पाने के वैकल्पिक माध्यम के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने नगर निगम के प्रमुख तर्कों को स्वीकार करते हुए याचिका निरस्त कर दी।
क्या था मामला?
याचिकाकर्ता अरविंद चावरे के पिता कमल किशोर चावरे का निधन 30 अप्रैल 2015 को हुआ था। इसके बाद उन्होंने 22 जून 2015 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। इंदौर नगर निगम ने 14 जून 2021 को आवेदन अस्वीकार कर दिया।
निगम का कहना था कि आवेदन के समय याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे और उन्होंने कोई पुलिस सत्यापन या चरित्र प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया था। इसके बाद भी याचिकाकर्ता ने लगभग दो वर्ष तक कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की और वर्ष 2023 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
नगर निगम ने रखे ये प्रमुख तर्क
1. आठ साल बाद मांग का कोई औचित्य नहीं
नगर निगम ने अदालत में कहा कि यदि परिवार वास्तव में आर्थिक संकट में होता, तो तत्काल राहत की आवश्यकता होती। कर्मचारी की मृत्यु के करीब आठ वर्ष बाद नौकरी मांगना यह दर्शाता है कि तत्काल आर्थिक संकट की स्थिति समाप्त हो चुकी थी।
2. आपराधिक मामले थे दर्ज
नगर निगम ने बताया कि आवेदन के समय याचिकाकर्ता के खिलाफ दो आपराधिक प्रकरण दर्ज थे। ऐसे में उनकी पात्रता पर प्रश्नचिह्न था। हालांकि बाद में उन्हें राहत मिली, लेकिन आवेदन पर विचार के समय यह तथ्य महत्वपूर्ण था।
3. पुलिस सत्यापन प्रस्तुत नहीं किया गया
निगम ने यह भी तर्क दिया कि आवेदन के साथ कोई पुलिस क्लियरेंस या चरित्र प्रमाण पत्र जमा नहीं किया गया था। अदालत ने इस पहलू को भी महत्वपूर्ण माना।
4. मृत कर्मचारी की सेवा स्थिति भी विवाद का विषय
नगर निगम ने न्यायालय को बताया कि मृत कर्मचारी स्वयं अपनी माता की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति पर नियुक्त हुए थे और परिवीक्षा अवधि पूरी होने से पहले ही उनका निधन हो गया था। शासन की नीति के अनुसार भी ऐसी स्थिति में अनुकंपा नियुक्ति का दावा कमजोर माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान नगर निगम ने कई महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों का उल्लेख किया। इनमें हालिया फैसला केनरा बैंक विरुद्ध अजीत कुमार जीके (2025) भी शामिल था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल तत्काल आर्थिक संकट का समाधान है, न कि रोजगार उपलब्ध कराना।
इसके अलावा आरपी कपूर बनाम यूनियन बैंक और स्टेट बैंक ऑफ मध्यप्रदेश बनाम परवेज खान मामलों का हवाला देते हुए यह तर्क रखा गया कि केवल बरी हो जाना सरकारी नौकरी का स्वतः अधिकार नहीं देता।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति को नियमित भर्ती प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। यह केवल असाधारण परिस्थितियों में दी जाने वाली राहत है और इसका उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है।
फैसले के व्यापक मायने
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि अनुकंपा नियुक्ति को रोजगार का स्थायी अधिकार नहीं माना जा सकता और वर्षों बाद की गई मांगों को केवल सहानुभूति के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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