महावीर जयंती पर विशेष: 'स्व' से 'सर्व' तक की यात्रा; केवल 'जियो' नहीं, 'जीने दो' का वैश्विक आह्वान
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, हेमंत उपाध्याय।
"क्या धर्म केवल पंचांग की तिथियों और मंदिरों की आरती तक सीमित है? या धर्म वह 'अंकुश' है जो हमारे भीतर बढ़ते हुए अंतहीन लोभ और क्रोध को रोकता है? ढाई हजार साल पहले जब दुनिया युद्ध और हिंसा के धुएँ में घिरी थी, तब एक राजकुमार ने महलों का त्याग कर 'अहिंसा' की वह मशाल जलाई, जिसकी लौ आज के इस तनावपूर्ण युग में और भी अधिक चमकदार नजर आती है। 31 मार्च को जब हम भगवान महावीर का जन्म कल्याणक मनाएंगे तो हमारे लिए यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि खुद के भीतर 'महावीर' को खोजने की एक यात्रा होगी।" यह दिन संपूर्ण विश्व में 'करुणा और अहिंसा' के महापर्व के रूप में मनाया जाएगा।
महावीर होने से कल्याण होगा
राष्ट्रसंत आचार्य विद्यासागर महाराज के अनुसार- "महावीर को केवल पूजने से कल्याण नहीं होगा, महावीर होने से कल्याण होगा। महावीर जयंती मनाने का अर्थ है-अपने भीतर के क्रोध, मोह और लोभ को जीतना। जब तक हृदय में दूसरों के लिए दया नहीं जागती, तब तक अहिंसा का मार्ग शुरू ही नहीं होता।"
केवल इंसानों के लिए नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि के लिए
वहीं अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्य महाश्रमण के अनुसार- "महावीर का 'जियो और जीने दो' केवल इंसानों के लिए नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि के लिए है। अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा साहस है। यदि हम अपने विचारों में पवित्रता और व्यवहार में नैतिकता ले आएँ, तो हर दिन महावीर जयंती है।"
मंदिरों में नहीं, अपने आचरण में खोजो
निश्चित ही भगवान महावीर का 'जियो और जीने दो' केवल एक नारा नहीं है, यह एक 'अनुभव' है। जब तक आप दूसरे के दुःख को अपना दुःख नहीं समझेंगे, तब तक आप अहिंसक नहीं हो सकते। भगवान महावीर को मंदिरों में नहीं, अपने आचरण में खोजो। यदि तुम्हारा हृदय करुणा से खाली है, तो अभिषेक और पूजन केवल एक क्रिया मात्र है।
प्रासंगिक और जरूरी मरहम
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहाँ हर व्यक्ति एक-दूसरे को कुचलकर आगे निकलने की अंधी दौड़ में शामिल है, ढाई हजार साल पहले गूंजा एक स्वर आज सबसे प्रासंगिक और जरूरी मरहम बन गया है- "मित्ती मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झं न केणइ" (मेरा संसार के समस्त जीवों से मैत्री भाव है, किसी से मेरा वैर नहीं है)।
राजसी वैभव का परित्याग
एक राजकुमार, जिसके पास सत्ता, संपत्ति और समस्त सांसारिक सुखों का अंबार था, जो चाहते तो एक चक्रवर्ती सम्राट बन सकते थे, उन्होंने 30 वर्ष की भरी युवावस्था में सब कुछ क्यों त्याग दिया? यह प्रश्न आज के 'उपभोक्तावाद' के दौर में एक बहुत बड़ी सीख है। वर्धमान ने पहचान लिया था कि बाहरी सुख केवल क्षणिक प्यास बुझाते हैं, आत्मा की तृप्ति नहीं करते। उन्होंने सत्य की खोज में 12 वर्षों तक कठिन मौन साधना की। सोचिए, आज के दौर में जहाँ हम 12 मिनट भी बिना स्मार्टफोन या बातचीत के बैचेन हो जाते हैं, वहां 12 साल का आत्म-मंथन! यह मौन हारने के लिए नहीं, बल्कि खुद के भीतर के शोर को शांत कर 'स्वयं' को जीतने के लिए था।
अनेकांतवाद - आज के 'ध्रुवीकरण' का एकमात्र समाधान
महावीर स्वामी का सबसे अद्भुत और आधुनिक दर्शन है- 'अनेकांतवाद'। सरल शब्दों में कहें तो, "किसी भी सत्य के अनंत पहलू हो सकते हैं।" आज जब सोशल मीडिया पर हम अपनी बात को ही 'परम सत्य' मानकर दूसरों पर कीचड़ उछालते हैं, तब महावीर हमें ठहरकर सोचने की प्रेरणा देते हैं। वे कहते हैं कि दूसरा व्यक्ति भी अपनी जगह सही हो सकता है, बस उसका दृष्टिकोण अलग है। यदि हम इस विचार को आत्मसात कर लें, तो दुनिया के आधे वैचारिक युद्ध, सांप्रदायिक तनाव और घरों के झगड़े कल ही समाप्त हो जाएं। यह दर्शन हमें सहिष्णुता और सम्मान सिखाता है।
अपरिग्रह- सामान की भीड़ में खोता इंसान
आज हम वस्तुओं को इकट्ठा करने की अंधी होड़ में लगे हैं। घर सामान से भर रहे हैं, लेकिन मन खाली होता जा रहा है। महावीर ने 'अपरिग्रह' (जरूरत से ज्यादा संचय न करना) का मंत्र दिया। यह सिद्धांत आज के 'अल्पवाद' और 'सतत जीवनशैली' का मूल आधार है। प्रकृति को उतना ही कष्ट दें जितना अनिवार्य हो, और उससे उतना ही लें जितनी आवश्यकता हो। संचय की प्रवृत्ति ही भ्रष्टाचार और पर्यावरण विनाश की जड़ है। भगवान महावीर के संदेश हमें सिखाते हैं कि "चीजों के मालिक बनो, उनके गुलाम नहीं।"
अहिंसा- केवल शस्त्र न उठाना ही काफी नहीं
भगवान महावीर की अहिंसा केवल 'किसी को न मारना' तक सीमित नहीं है। उनकी अहिंसा में सूक्ष्म संवेदना है। किसी का मन दुखाना 'मानसिक हिंसा' है, किसी के बारे में बुरा सोचना 'वैचारिक हिंसा' है। आज जब दुनिया युद्धों और नफरत के साये में जी रही है, तब 'जियो और जीने दो' का नारा एक वैश्विक जिम्मेदारी बन जाता है। यह सिद्धांत हमें सिखाता है कि चींटी से लेकर हाथी तक और दुश्मन से लेकर मित्र तक, सबके भीतर वही चेतना है जो हमारे भीतर है।
अपने भीतर 'विवेक' का दीया भी जलाना आवश्यक
महावीर जयंती पर इस बार भी जैन समाज भव्य पालकी यात्राएं और प्रभात फेरियां निकालेगा, लेकिन जैन संतों का कहना है कि मंदिर में दीया जलाने के साथ-साथ, अपने भीतर 'विवेक' का दीया भी जलाना आवश्यक है।
सच्ची क्षमावाणी ऐसी होनी चाहिये
वाट्सएप पर फॉरवर्ड किए गए मैसेज के बजाय, उस व्यक्ति को कॉल करें जिससे आपका मनमुटाव है। अभिमान को त्याग कर 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहें।
जीव दया का संकल्प: अपने घर के बाहर मूक पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी का प्रबंध करना ही महावीर की सच्ची पूजा है।
सादगी का प्रयोग: संकल्प लें कि इस दिन हम दिखावे, फिजूलखर्ची और प्रदूषण से दूर रहकर सादगीपूर्ण जीवन जिएंगे।
महावीर कोई ऐसे ईश्वर नहीं हैं जो केवल सिंहासन पर बैठकर हमारी पूजा चाहते हैं। वे एक 'तीर्थंकर' हैं-यानी वह 'तीर्थ' या 'सेतु' जो हमें संसार की अशांति, तनाव और ईर्ष्या के किनारे से उठाकर आत्मिक शांति और आनंद के किनारे तक ले जाता है।
'जियो और जीने दो' का मंत्र हमें याद दिलाता है कि हमारी खुशियाँ दूसरों की खुशियों में समाहित हैं। आइए, इस महावीर जयंती पर हम संकल्प लें कि हम अपने आचरण से दुनिया को थोड़ा और सुंदर और करुणामय बनाएंगे।
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