ओम पर्वत से फिर गायब हुई बर्फ 2016 और 2024 में भी बर्फविहीन हो गया था पर्वत
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, पिथौरागढ़।
ओम पर्वत बर्फविहीन हो गया है। पर्वत के शिखर पर नाममात्र की बर्फ रह गई है। इससे ओम की आकृति गायब हो गई है। पिछले एक दशक से वर्षाकाल के दौरान पर्वत के बर्फविहीन होने से पर्यावरणविद् चिंतित हैं। हिमालय केवल बर्फ से ढंकी पर्वत शृंखलाओं का नाम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार है।
पिथौरागढ़ की व्यास घाटी में करीब 5,900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ओम पर्वत इसी हिमालयी विरासत का एक अनूठा प्रतीक है। पर्वत की ढलान पर प्राकृतिक रूप से बर्फ से उभरने वाली ‘ॐ’ की आकृति इसे धार्मिक आस्था के साथ-साथ देश-दुनिया के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनाती है, लेकिन इस बार फिर बरसात के मौसम में ओम पर्वत से बर्फ का गायब होना केवल एक प्राकृतिक बदलाव नहीं, बल्कि बदलते हिमालय और बढ़ते जलवायु संकट की गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
ओम पर्वत पर इस वर्ष भी बर्फ लगभग नदारद है। इसका सीधा असर उस प्राकृतिक ‘ॐ’ की आकृति पर पड़ रहा है, जिसके दर्शन के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक व्यास घाटी पहुंचते हैं। वर्ष 2024 में भी ओम पर्वत पूरी तरह बर्फविहीन दिखाई दिया था।
अगस्त 2024 में नाभीढांग से ली गई तस्वीरों में पर्वत पर बर्फ के स्थान पर काली चट्टानें नजर आई थीं। हालांकि बाद में हुई बर्फबारी से वहां फिर बर्फ लौट आई थी। विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों ने उस समय कम वर्षा, बिखरे हुए हिमपात, बढ़ते तापमान, वाहनों से होने वाले प्रदूषण और उच्च हिमालय में बढ़ती मानवीय गतिविधियों को प्रमुख चिंताओं में गिना था।
स्थानीय लोगों के अनुभवों में पिछले करीब दो दशकों में उच्च हिमालय के मौसम में बड़ा बदलाव आया है। पहले सर्दियों में लंबे समय तक बर्फबारी होती थी और ऊंची चोटियां लंबे समय तक बर्फ की चादर से ढंकी रहती थीं। अब हिमपात की अवधि और मात्रा में कमी महसूस की जा रही है। सर्दियों में तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहने से जो बर्फ गिरती भी है, उसके लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता कम हो रही है।
पिथौरागढ़ जिला प्रशासन के अनुसार जिले में 3,500 मीटर से अधिक ऊंचाई वाला क्षेत्र अल्पाइन जोन में आता है और यह क्षेत्र सामान्यतः बर्फ से ढंका रहने वाला क्षेत्र है। ऐसे में ऊंची चोटियों का लंबे समय तक बर्फविहीन दिखाई देना हिमालयी पारिस्थितिकी में हो रहे बदलावों की ओर ध्यान खींचता है।
ग्लोबल वार्मिंग का हिमालय पर सीधा असर... ओम पर्वत की बर्फ का तेजी से पिघलना व्यापक वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में समझना होगा। पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि का असर हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अपेक्षाकृत तेजी से दिखाई देता है।
तापमान बढ़ने के साथ हिमपात और बारिश के पैटर्न में बदलाव आता है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ के रूप में गिरने वाला पानी कम हो सकता है और बर्फ के पिघलने की गति बढ़ सकती है।
2024 में ओम पर्वत के बर्फविहीन होने पर विशेषज्ञों ने ऊपरी हिमालय में पिछले वर्षों में कम बारिश और बिखरे हुए हिमपात के साथ ग्लोबल वार्मिंग तथा वाहनों के प्रदूषण को भी संभावित कारणों में शामिल किया था।
इतिहासकार और पर्यावरण के जानकार पद्मश्री शेखर पाठक भी इस पर चिंता जता चुके हैं। उनका कहना है कि वैश्विक तापमान बढ़ोतरी तो एक कारण है ही, मानवीय दखल से भी हिमालय पर खतरा बढ़ रहा है।
सड़क और निर्माण विकास बनाम पर्यावरण... दुर्गम सीमांत क्षेत्रों में सड़क और बुनियादी ढांचे का विकास सुरक्षा, स्थानीय कनेक्टिविटी और पर्यटन के लिहाज से जरूरी है। लेकिन उच्च हिमालय में विकास की अपनी पर्यावरणीय कीमत भी होती है।
सड़क निर्माण के लिए पहाड़ काटने, मलबा निस्तारण, भारी मशीनों के इस्तेमाल और वाहनों की आवाजाही से ढलानों तथा स्थानीय पारिस्थितिकी पर दबाव बढ़ सकता है। स्थानीय लोगों ने पहले भी व्यास और दारमा घाटी में सड़क निर्माण, निर्माण गतिविधियों और बढ़ते वाहनों को लेकर चिंता जताई है।
अब वैज्ञानिक निगरानी की जरूरत... पर्यावरणविदों का कहना है कि ओम पर्वत को केवल धार्मिक या पर्यटन स्थल के रूप में देखने के बजाय इसे हिमालयी जलवायु परिवर्तन के संवेदनशील संकेतक के तौर पर भी देखा जाना चाहिए।
यहां वर्षभर तापमान, हिमपात, बर्फ की मोटाई, बर्फ पिघलने की दर, वर्षा और पर्यटकों की संख्या का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है। नियमित सैटेलाइट मॉनिटरिंग, स्थानीय समुदायों के पारंपरिक मौसम ज्ञान और वैज्ञानिक आंकड़ों को एक साथ रखकर यह समझने की कोशिश होनी चाहिए कि बर्फ में बदलाव केवल किसी एक असामान्य मौसम का परिणाम है या दीर्घकालीन जलवायु परिवर्तन का हिस्सा।
ओम पर्वत का संदेश साफ है- हिमालय बदल रहा है जिस पर्वत की बर्फ से प्राकृतिक रूप से ‘ॐ’ की आकृति बनती है, वहां बर्फ का लगातार कम होना केवल धार्मिक भावनाओं से जुड़ा विषय नहीं है। यह हिमालय के बदलते तापमान, घटते हिमपात, बढ़ती मानवीय गतिविधियों और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र की कहानी भी है।
जरूरत है कि श्रद्धालु और पर्यटक हिमालय को केवल पर्यटन स्थल न समझें। प्लास्टिक और कचरा न फैलाना, अनावश्यक वाहन न ले जाना, निर्धारित मार्गों का इस्तेमाल करना और स्थानीय पर्यावरणीय नियमों का पालन करना हर यात्री की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
प्रशासन को भी पर्यटकों की संख्या, वाहनों और निर्माण गतिविधियों की वैज्ञानिक सीमा तय करनी होगी। क्योंकि अगर हिमालय की बर्फ चली गई, तो केवल ओम पर्वत की ‘ॐ’ आकृति ही नहीं मिटेगी उसके साथ आने वाली पीढ़ियों के पानी, पर्यावरण और पहाड़ी जीवन की सुरक्षा का सवाल भी खड़ा होगा।
तीर्थयात्रा बढ़ी तो दबाव भी बढ़ा
ओम पर्वत और आदि कैलाश क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में तीर्थ पर्यटन तेजी से बढ़ा है। सड़क और परिवहन सुविधाओं के विस्तार से पहले जहां इन दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच सीमित थी, वहीं अब अधिक संख्या में लोग वाहन लेकर ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं।
पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। इससे स्थानीय लोगों को होमस्टे, परिवहन, गाइड, पोर्टर, भोजन और अन्य सेवाओं के माध्यम से रोजगार मिलता है। लेकिन संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में पर्यटन की क्षमता सीमित होती है।
यदि किसी क्षेत्र की carrying capacity से अधिक लोगों, वाहनों और निर्माण गतिविधियों का दबाव पड़ता है तो उसका असर कचरे, वायु प्रदूषण, जल स्रोतों, वनस्पतियों और वन्यजीवों पर पड़ सकता है।
बर्फ सिर्फ सुंदरता नहीं पानी का भंडार भी है
ओम पर्वत की बर्फ का महत्व केवल ‘ॐ’ की आकृति तक सीमित नहीं है। हिमालय में जमी बर्फ और हिमनद लंबे समय तक पानी के प्राकृतिक भंडार की तरह काम करते हैं। सर्दियों में जमा बर्फ गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलती है और नदियों तथा जल स्रोतों के प्रवाह में योगदान देती है।
यदि बर्फबारी कम होती है और पिघलने की प्रक्रिया समय से पहले तेज होती है तो इसका असर भविष्य में जल उपलब्धता के स्वरूप पर पड़ सकता है। दूसरी ओर तापमान बढ़ने से ऊंचे हिमालय में जमी स्थायी बर्फ, हिमनदों पर भी दबाव बढ़ सकता है। उत्तराखंड के एक सरकारी अध्ययन में भी उच्च हिमालय में पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने को ढलानों की अस्थिरता, भूस्खलन और चट्टान गिरने जैसे जोखिमों से जोड़ा गया है।
2016 में भी दिखी थी चिंता की तस्वीर
ओम पर्वत के बर्फविहीन होने की चिंता नई नहीं है। वर्ष 2016 में भी सितंबर के दौरान पर्वत पर नाममात्र की बर्फ रह गई थी। उस समय केवल तीन-चार सफेद धब्बे दिखाई देने की बात सामने आई थी। लेकिन 2024 में पहली बार ओम पर्वत पूरी तरह बर्फविहीन नजर आया।
2024 की घटना को लेकर 20 से अधिक वर्षों से कैलाश-मानसरोवर और आदि कैलाश यात्रा से जुड़े रहे एक अधिकारी ने भी इसे अपने अनुभव में असामान्य बताया था। इसके बाद 2025 में भी ओम पर्वत और पंचाचूली की चोटियों पर बर्फ की कमी की तस्वीरें सामने आईं। स्थानीय लोगों ने दारमा-व्यास क्षेत्र में बढ़ती पर्यटक संख्या, सड़क निर्माण और तापमान में वृद्धि को लेकर चिंता जताई थी।
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