मौत को दिखाया अंगूठा: दूषित पानी त्रासदी; इतनी मौतों के बीच 72 दिन के संघर्ष के बाद जिंदगी की जीत
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से फैली त्रासदी के बीच एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो उम्मीद और हौसले की मिसाल बन गई है। जहां इस घटना में 36 लोगों की जान चली गई, वहीं 67 वर्षीय पार्वती कोंडला ने 72 दिनों तक मौत से जंग लड़कर जीवन को फिर से हासिल किया।
दुर्लभ और खतरनाक बीमारी से जूझी
पार्वती कोंडला, जो गिलियन-बैरे सिंड्रोम (GBS) जैसी दुर्लभ और खतरनाक बीमारी से जूझ रही थीं, ने असाधारण साहस और इच्छाशक्ति का परिचय दिया। यह बीमारी शरीर के इम्यून सिस्टम को ही नसों पर हमला करने के लिए प्रेरित करती है, जिससे धीरे-धीरे लकवा जैसी स्थिति बन जाती है।
साधारण संक्रमण से शुरू हुई गंभीर स्थिति
27 दिसंबर को पार्वती को उल्टी-दस्त की शिकायत हुई, जिसे शुरुआत में सामान्य संक्रमण समझा गया, लेकिन दूषित पानी में मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया कैम्पीलोबैक्टर जेजुनी ने उनके नर्वस सिस्टम पर हमला कर दिया। हालत बिगड़ने पर उन्हें पहले शैल्बी हॉस्पिटल और फिर गंभीर स्थिति में बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।
हालत हो गई थी गंभीर
कुछ ही दिनों में उनकी स्थिति बेहद गंभीर हो गई। शरीर का बड़ा हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया और किडनियों ने काम करना बंद कर दिया। डॉक्टरों ने परिवार को साफ कह दिया था कि उनके बचने की संभावना महज 3-4% है।
वेंटिलेटर, ICU और जिंदगी की जंग
पार्वती 16 दिन तक वेंटिलेटर पर रहीं और 22 दिन ICU में भर्ती रहीं। जब उनके फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया, तो डॉक्टरों ने ट्रेकियोस्टोमी (गले में छेद कर सांस का रास्ता बनाना) का सहारा लिया। वे लगातार 18 दिनों तक बेहोश रहीं। करीब 72 दिनों के इलाज के दौरान अस्पताल का बिल 19.50 लाख रुपए तक पहुंच गया। इस पूरे इलाज के दौरान प्रशासन भी इस केस पर नजर बनाए हुए था।
धीरे-धीरे लौटती जिंदगी
लंबे इलाज और देखभाल के बाद पार्वती की हालत में सुधार होना शुरू हुआ। 48 दिनों बाद उन्हें ICU से हटाकर HDU में शिफ्ट किया गया। 6 मार्च को उनका ट्रेकियोस्टोमी सिस्टम हटाया गया और उन्हें ट्यूब के जरिए लिक्विड डाइट दी जाने लगी। धीरे-धीरे उन्होंने परिवार के लोगों को पहचानना शुरू किया और प्रतिक्रिया देना भी शुरू किया। आखिरकार 9 मार्च को उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया।
अब घर पर जारी है रिकवरी की दूसरी लड़ाई
अस्पताल से घर लौटने के बाद भी पार्वती की लड़ाई खत्म नहीं हुई है। अब वे घर पर रिकवरी के दूसरे चरण से गुजर रही हैं। उन्हें दिन में कई बार ट्यूब के जरिए लिक्विड डाइट दी जा रही है, जिसमें दूध, प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व शामिल हैं।
अभी लगेगा लंबा समय
परिवार के अनुसार, अब वे हाथ उठाने लगी हैं और परिजनों को पहचान कर प्रतिक्रिया देने की कोशिश करती हैं। हालांकि, पूरी तरह स्वस्थ होने के लिए अभी लंबा समय और लगातार फिजियोथेरेपी की जरूरत है।
परिवार और प्रशासन का सहयोग बना सहारा
पार्वती के बेटे प्रदीप के मुताबिक, डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन उनकी मां की इच्छाशक्ति, डॉक्टरों की मेहनत और परिवार की आस्था ने उन्हें नया जीवन दिया। अब हर महीने इलाज और देखभाल पर 60 से 70 हजार रुपए का खर्च आ रहा है, जिसके लिए परिवार ने शासन से मदद की अपील की है।
जीत सकती है जिंदगी
यह कहानी सिर्फ एक मरीज की रिकवरी नहीं, बल्कि हिम्मत, विश्वास और चिकित्सा प्रयासों के संगम की प्रेरणादायक मिसाल है, जिसने यह साबित कर दिया कि मुश्किल से मुश्किल हालात में भी जिंदगी जीत सकती है।
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