शिवराज की मूंग दाल मोहन की हांडी में उबाल: दोगुना मूंग खरीदे केंद्र सरकार
KHULASA FIRST
संवाददाता

अब भोपाल बना किसानों का जंतर-मंतर, नहीं चल रहा सरकार का जादू-मंतर
जय जवान के बाद जय किसान। जवान छात्रों का दिल्ली के जंतर-मंतर से आंदोलन खत्म हुआ तो अब भोपाल मूंग दाल खरीदी को लेकर किसानों का जंतर-मंतर बन गया है। सैकड़ों किलोमीटर चलकर किसान शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक पैदल मार्च के रूप में अपनी फरियाद लेकर भोपाल पहुंचे। किसानों की यह यात्रा कई दिन से जारी है और इसकी घोषणा पहले ही कर दी गई थी। किसानों के विभिन्न 19 संगठनों के संयुक्त किसान मोर्चा का यह आंदोलन सरकार के लिए सिरदर्द बन गया है। किसान मुख्यमंत्री आवास को घेरना चाहते हैं, ताकि उनकी मांगें सरकार मान ले।
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट , इंदौर।
किसानों ने साफ कर दिया है कि मांगें पूरी होने तक वे पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने सड़क पर ही हनुमान चालीसा, सुंदरकांड का पाठ करने के साथ ही चूल्हा जलाकर भोजन तैयार किया और आंदोलन को लंबी लड़ाई का रूप दे दिया है।
केंद्र में घबराहट... इस उग्र आंदोलन के बाद राज्य सरकार पूरी तरह डैमेज कंट्रोल मोड में आ गई है। किसानों के भारी दबाव का असर सत्ता के गलियारों में तुरंत दिखाई दिया। आंदोलन के कारण भोपाल में लंबा ट्रैफिक जाम और सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ने से केंद्र सरकार पर भी दबाव बढ़ गया है। किसानों का यह आंदोलन खेतों में पैदा सारा मूंग समर्थन मूल्य पर सरकार खरीदे, इस मांग को लेकर है। साथ ही सीमित मात्रा में यूट्यूब गाना प्रणाली से रासायनिक उर्वरक देने की व्यवस्था को समाप्त करने की मांग भी जुड़ी है।
केंद्र सरकार ने मूंग का समर्थन मूल्य निर्धारित किया, इसलिए मूंग की खरीदी केंद्र के कृषि मंत्रालय द्वारा की जाती है। यह खरीदी राज्य सरकारों के माध्यम से होती है और भंडारण केंद्र सरकार के गोदाम में किया जाता है। इस बार केंद्र सरकार ने किसानों के कुल मूंग उत्पादन का 25% ही खरीदने की घोषणा की थी। यानी एक एकड़ में चार क्विंटल मूंग पैदा होने पर केंद्र सरकार मात्र एक क्विंटल मूंग ही समर्थन मूल्य पर खरीदेगी।
समर्थन मूल्य 8 हजार रुपए प्रति क्विंटल से अधिक है, जबकि खुले बाजार में यह भाव 4 से 5 हजार या अच्छी गुणवत्ता का होने पर 6 हजार प्रति क्विंटल तक बिक जाता है। यही झगड़े की जड़ है कि खुले बाजार के भाव समर्थन मूल्य से लगभग 3 हजार रुपए क्विंटल कम है।
एक क्विंटल के पीछे किसानों को बहुत ज्यादा नुकसान है। इस कारण बाकी मूंग किसान खुले बाजार में बेचेंगे तो उन्हें समर्थन मूल्य के बराबर भाव नहीं मिलेगा। सरकार को बार-बार कहा जा रहा है कि किसान वर्ग की वास्तव में चिंता है, तो सरकार बाजार व मंडी में समर्थन मूल्य पर खरीदी अनिवार्य करने का फैसला करे। सरकार भावांतर का भी मॉडल अपना सकती है, ताकि खरीदी और भंडारण के सिरदर्द और अनावश्यक खर्चे से बची रहे, लेकिन वह ऐसा करना नहीं चाहती।
इस समय हो रहा आंदोलन इतना बड़ा स्वरूप ले लेगा, इसका अंदाजा शायद सरकार को नहीं था। प्रदेश सरकार तो वैसे भी निश्चिंत रही है, क्योंकि मूंग खरीदी से संबंधित फैसला केंद्र सरकार में बैठे कृषिमंत्री शिवराजसिंह चौहान को लेना है। यह बात अलग है कि किसानों के गुस्से और उनके आंदोलन से प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार बदनाम हो रही है। उसके पहले भी भारतीय किसान संघ मूंग को लेकर आंदोलन करता रहा, लेकिन भाजपा के मातृ संगठन का अनुषंगिक संगठन होने के कारण सरकार की लक्ष्मणरेखा से आगे आंदोलन को नहीं बढ़ाया। यह भी संभव है किसान संघ से सरकार बात करके कोई घोषणा कर दे, बजाय आंदोलन कर रहे संयुक्त मोर्चा के किसानों को श्रेय देने के।
किसान संघ आरएसएस का घटक संगठन है, जबकि संयुक्त मोर्चा में वे सारे संगठन हैं, जो अलग-अलग वैचारिक धरातल से आते हैं, लेकिन किसान और देश के मामले में एक साथ आंदोलन करते हैं। दिल्ली में 18 महीने वाला किसान आंदोलन इसी तरह के किसान संगठनों के संयुक्त मोर्चे का आंदोलन था।
केंद्र सरकार ने गेहूं का भी समर्थन मूल्य तय किया, लेकिन पूरी मात्रा में नहीं खरीदा। प्रदेश के 5 लाख से अधिक किसान अभी भी गेहूं बेच नहीं पाए हैं, क्योंकि केंद्र और राज्य सरकार ने उनसे गेहूं नहीं खरीदा। गेहूं के बाद मूंग के समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीदी प्रदेश सरकार के माथे आ गई है। अब इसमें भाजपा के समझदार नेता केंद्रीय कृषिमंत्री शिवराजसिंह चौहान और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बीच चिट्ठी-पत्री के आदान-प्रदान को राजनीतिक वर्चस्व की राजधानी के रूप में देख रहे हैं। राजनीति में कोई भी नेता सत्ता प्राप्त करने के लिए जो फसल बोता है, उसे दूसरा काट ले जाए तो राजनीतिक आंदोलन व घमासान तो होगा ही।
इसी तरह प्रदेश में शिवराज मामा अपनी बोई हुई फसल किसी और को काटते कैसे देख सकते हैं? मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शिवराज की जगह मुख्यमंत्री बनाए गए। कहा गया कि सरकार बनाने के लिए सारे प्रयास शिवराज के थे, लेकिन सत्ता की फसल काट ली डॉ. मोहन यादव ने।
हो सकता है इसी राजनीति के चक्कर में प्रदेश सरकार की छाती पर मूंग दला जा रहा है। यह ऐसा हो ऐसी स्थितियां निर्मित करवाई जाती रही होंगी। यानी किसानों के आंदोलन, आक्रोश, बदनामी, सरकार के लिए परेशानी, कानून व्यवस्था, आलोचना सब कुछ डॉ. मोहन यादव को सहन करना पड़ रही है, जबकि यह पूरा मामला शिवराज के कृषि मंत्रालय से जुड़ा हुआ है। प्रदेश सरकार चाहती होगी कि किसानों का नुकसान नहीं हो, इसके लिए आंदोलन हो तो केंद्र सरकार शायद किसानों के हित में मूंग खरीदी निर्धारित मात्रा से दोगुना खरीदी का फैसला कर ले। इसके लिए मुख्यमंत्री आंदोलन का हलाहल पीते रहते हैं, ताकि किसानों का नुकसान नहीं हो।
मुख्यमंत्री को चाहिए कि इस समय भोपाल की सड़कों पर डटे किसानों से वे सीधे संवाद करें। कल दिनभर प्रदेश सरकार ने किसानों से चर्चा की जगह इसी सोच-विचार में बिता दिया कि केंद्र सरकार को चिट्ठी मुख्यमंत्री लिखें या प्रदेश के कृषिमंत्री। बाद में चर्चा के लिए किसानों को बुलाया गया। कहा गया कि प्रदेश के कृषिमंत्री ने चिट्ठी लिख दी है। केंद्र सरकार को फैसला करना है। स्वाभाविक है ऐसे में आंदोलन और ज्यादा उग्र होगा।
आंदोलन के ये तेवर गवाह हैं कि फौरी तौर पर लिखे गए पत्रों से यह आग शांत होने वाली नहीं। जब तक केंद्र और राज्य सरकार मिलकर इस उपार्जन को लेकर कोई ठोस और व्यावहारिक नीतिगत निर्णय नहीं लेते, तब तक मध्य प्रदेश की सियासत में यह ‘मूंग उबाल’ केंद्रबिंदु बना रहेगा।
प्रदेश की पहल... वर्तमान स्थिति और मांग
राज्य में ग्रीष्मकालीन मूंग खरीदी का मौजूदा निर्धारित लक्ष्य 4.54 लाख मीट्रिक टन है, जिसे बढ़ाकर 8.06 लाख मीट्रिक टन करने का आग्रह किया गया है। प्रदेश के कृषिमंत्री एंदलसिंह कंसाना ने इस संबंध में केंद्रीय कृषिमंत्री शिवराजसिंह चौहान को औपचारिक पत्र लिखा, जिसमें दोगुना खरीदी का लक्ष्य तय करने का आग्रह किया गया है। मूंग की खरीदी में पिछले वर्ष भी यही स्थिति बनी थी। आंदोलन के बाद सरकार ने किसानों की मांग मान ली थी। इसी लालच में किसानों ने भरपूर मूंग की पैदावार कर ली। केंद्र सरकार समर्थन मूल्य के रूप में अनुदान देने की प्रथा को धीरे-धीरे नियंत्रित कर रही है, लेकिन विकल्प नहीं दे रही। इस कारण बार-बार आंदोलन हो रहे हैं। इस मांग का मुख्य कारण राज्य के विभिन्न जिलों में ग्रीष्मकालीन मूंग का बंपर उत्पादन होना है, जिससे किसानों के पास उपज अधिक मात्रा में उपलब्ध है।
आर्थिक पहलू पर विचार करें...पंजीयन बनाम सीमित खरीदी का विरोधाभास
इस साल प्रदेश में करीब 3.47 लाख किसानों ने मूंग उपार्जन के लिए पंजीयन कराया है, लेकिन केंद्र द्वारा तय सीमित कोटे के चलते महज एक छोटे हिस्से की ही खरीदी हो पा रही है। किसान संगठनों का आरोप है कि कुल उपज का केवल 25 फीसदी हिस्सा ही सरकार खरीद रही है, जिससे बाकी फसल औने-पौने दामों पर खुले बाजार में बेचने की मजबूरी बन गई है। किसानों को उनकी उपज का उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर उन्हें खुले बाजार में औने-पौने दामों पर फसल बेचने से बचाया जा सकता है।
यह है इस विवाद की अंतर्धारा
यह पूरा घटनाक्रम केवल एक प्रशासनिक पत्राचार या सामान्य विरोध-प्रदर्शन नहीं, बल्कि यह देश और राज्य की कृषि खरीद नीतियों की बुनियादी खामियों पर एक बड़ा सवालिया निशान है। मूंग की खरीदी के साथ ही किसानों को इस सीजन में रासायनिक उर्वरकों की खरीदी के लिए केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की गई सीमित उर्वरक उपलब्धता और इसके लिए लागू की गई ई-टोकन व्यवस्था भी व्यवहारिक साबित नहीं हो रही है। टोकन के लिए कई दिन तक बार-बार प्रयास करने होते हैं, फिर भी पंजीयन नहीं हो रहा, क्योंकि जितना उर्वरक केंद्र से मिलता है, उतना ही पंजीयन किया जा रहा है। उसके बाद दूसरी खेप आने तक टोकन पंजीयन नहीं होता।
केंद्र ने खेत के राग में और फसल के हिसाब से उर्वरक डालने का फार्मूला तय किया है और इसी फार्मूले के अनुसार हर किसान को सीमित उर्वरक दिया जा रहा है। यह किसानों को मंजूर नहीं, इसलिए यह व्यवस्था खत्म करने की मांग की जा रही है। केंद्र सरकार की मजबूरी है कि रासायनिक उर्वरक विदेश से खरीदना होते हैं, जो बहुत महंगा है और किसानों को बहुत कम कीमत पर अनुदान देते हुए उर्वरक देने होते हैं। केंद्र सरकार रासायनिक उर्वरकों पर भी धीरे-धीरे खेती की निर्भरता एकदम सीमित करना चाहती है, लेकिन कम उर्वरक के उपयोग के फार्मूले से पैदावार प्रभावित नहीं हो, इसके लिए कोई वैकल्पिक मॉडल नहीं होने से किसान आंदोलन कर रहे हैं।
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