दुबई में सनपाल का रिमोट: जबलपुर में गुरुमुख का नेटवर्क; अब ईडी की बारी कब
KHULASA FIRST
संवाददाता

एलओसी के बाद भी चली जमीन की फाइल; सट्टे से संपत्ति तक पहुंची कहानी
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सतीश सनपाल की कहानी अब सिर्फ ऑनलाइन सट्टे तक सीमित नहीं रह गई। लंदन में बैठकर संचालन, जबलपुर में स्थानीय नेटवर्क, पुलिस की अलग-अलग कार्रवाई और इसके बीच सामने आई शहपुरा की जमीन नामांतरण प्रक्रिया ने जांच के दायरे को कहीं बड़ा कर दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की भूमिका को लेकर उठ रहा है कि यदि इस नेटवर्क के पीछे बड़े आर्थिक लेनदेन और संपत्तियों की कड़ियां सामने आ रही हैं तो उनकी पूरी मनी ट्रेल की जांच आखिर कब होगी?
सनपाल के खिलाफ अगस्त 2022 में लुकआउट सर्कुलर (एलओसी) जारी किए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके करीब तीन साल बाद 4 नवंबर 2025 को शहपुरा की जमीन के नामांतरण के लिए आवेदन सामने आया और बाद में राजस्व रिकॉर्ड में सनपाल का नाम दर्ज होने की बात सामने आई।
एलओसी अपने आप किसी व्यक्ति की संपत्ति के नामांतरण पर रोक नहीं लगाता, लेकिन इस मामले में सवाल प्रक्रिया को लेकर है। आवेदन किसने लगाया? दस्तावेज किसने जमा किए? क्या पॉवर ऑफ अटॉर्नी के जरिये प्रक्रिया आगे बढ़ी?
सनपाल की ओर से अधिकृत व्यक्ति कौन था? दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ और नामांतरण आदेश किस अधिकारी ने पारित किया? यही वे सवाल हैं, जिनके जवाब इस पूरी कहानी की अगली कड़ी खोल सकते हैं।
शहपुरा की जमीन बनी नई कड़ी
4 नवंबर 2025 का नामांतरण आवेदन इस कहानी में सबसे अहम दस्तावेजी कड़ियों में से एक बनकर सामने आया है। विदेश में मौजूद व्यक्ति के नाम जमीन की प्रक्रिया किसने पूरी कराई, यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके जवाब से स्थानीय संपर्कों और अधिकृत प्रतिनिधियों की भूमिका सामने आ सकती है।
अगर जमीन खरीद या नामांतरण में किसी अधिकृत प्रतिनिधि, पॉवर ऑफ अटॉर्नी या अन्य दस्तावेज का इस्तेमाल हुआ है, तो उसकी जांच से यह भी पता चल सकता है कि सनपाल के भारत में संपत्ति संबंधी मामलों को कौन संभाल रहा था।
दुबई गया सनपाल, जबलपुर में कौन संभालता रहा नेटवर्क?
जांच से जुड़े सूत्रों का दावा है कि जबलपुर में ऑनलाइन सट्टे के नेटवर्क की शुरुआत सनपाल ने अपनी बुआ के बेटे गुरुमुख आहूजा के साथ की थी। बाद में सनपाल दुबई चला गया, लेकिन स्थानीय स्तर पर नेटवर्क की कमान गुरुमुख के हाथों में रहने की बात कही जाती है।
आरोप है कि आईपीएल जैसे बड़े क्रिकेट टूर्नामेंट के दौरान कथित नेटवर्क ज्यादा सक्रिय हो जाता था। डिजिटल प्लेटफॉर्म और मास्टर आईडी के जरिये संचालन तथा स्थानीय स्तर पर लोगों को जोड़कर नेटवर्क फैलाने के दावे भी सामने आए हैं।
हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया में होना बाकी है, लेकिन यदि इन दावों में तथ्य निकलते हैं, तो अगला सवाल सीधे पैसे पर आता है- कथित कमाई कहां गई? किसके खाते में पहुंची? किसके नाम पर संपत्तियां खरीदी गईं? क्या रकम जमीन या कारोबार में लगी? और क्या इसका कोई हिस्सा विदेश तक पहुंचा?
तीन थानों की कार्रवाई, फिर भी क्यों बनी रही कथित चेन?
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार कोतवाली, मदन महल और गोरखपुर थाना क्षेत्र में अलग-अलग समय पर सनपाल और उससे जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई। छापे पड़े, गिरफ्तारियां हुईं और कई आरोपी बाद में कानूनी प्रक्रिया के तहत जमानत पर बाहर भी आए।
इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर कथित नेटवर्क की कड़ियां पूरी तरह खत्म नहीं होने के दावे सामने आते रहे। ऐसे में जांच सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उस आर्थिक ढांचे तक पहुंचना है, जिससे कथित नेटवर्क को ताकत मिलती रही।
अब ईडी से सवाल- लेनदेन का हिसाब-किताब कहां है?
यहीं से कहानी पुलिस कार्रवाई से आगे निकलती है। सट्टे के कथित कारोबार से कमाई हुई रकम यदि बैंक खातों, संपत्तियों, कंपनियों या दूसरे कारोबारों तक पहुंची है तो उसका पूरा रास्ता सामने आना जरूरी है। क्या सनपाल से जुड़े मामलों में वित्तीय लेनदेन की स्वतंत्र जांच हुई?
क्या संदिग्ध संपत्तियों की जानकारी ईडी तक पहुंची? क्या बैंक खातों और डिजिटल लेनदेन की मनी ट्रेल खंगाली गई? क्या दुबई और जबलपुर के बीच किसी आर्थिक लेनदेन की जांच हुई? और यदि यह सामग्री जांच एजेंसियों के पास है तो ईडी की कार्रवाई अब तक कहां तक पहुंची?
यही सवाल अब इस मामले को नया एंगल दे रहे हैं। अलग-अलग चर्चाओं में कथित नेटवर्क की रकम को बहुत बड़े आंकड़ों में बताया जाता रहा है। यहां तक कि हजारों करोड़ रुपए के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन 10-20 हजार करोड़ रुपए जैसी रकम की पुष्टि आधिकारिक जांच दस्तावेजों के बिना नहीं की जा सकती। इसलिए फिलहाल रकम के अनुमान से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कथित अवैध कमाई का स्रोत क्या था और वह पैसा आखिर किन रास्तों से होकर कहां पहुंचा।
सट्टे की एफआईआर से आगे जांच पहुंची या नहीं?
पुलिस की कार्रवाई में यदि सट्टे के नेटवर्क, आरोपियों, नकदी, बैंक खातों और संपत्तियों से जुड़े तथ्य सामने आए हैं तो इन सभी को जोड़कर आर्थिक जांच की जरूरत दिखाई देती है, क्योंकि किसी भी बड़े कथित आर्थिक नेटवर्क को खत्म करने का असली रास्ता केवल उसके लोगों तक पहुंचना नहीं, बल्कि उसकी कमाई और निवेश का रास्ता बंद करना होता है।
सनपाल वर्तमान में लंदन में है और गुरुमुख की स्थानीय भूमिका को लेकर जांच में दावे सामने आ रहे हैं। ऐसे में यह भी पता लगाना जरूरी होगा कि कथित नेटवर्क का पैसा कौन संभालता था, किसके जरिये आगे भेजा जाता था और किन संपत्तियों या कारोबार में लगाया गया।
यहीं ईडी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर जांच में मनी लांड्रिंग से जुड़े तथ्य सामने आते हैं तो कार्रवाई का सवाल उठना स्वाभाविक है। और अगर अभी तक ऐसा कोई आधार नहीं मिला है तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पुलिस की अब तक की जांच में सामने आए आर्थिक तथ्यों का आगे क्या हुआ।
एक जमीन की फाइल ने खड़े किए कई सवाल
शहपुरा की जमीन का नामांतरण आवेदन भले एक राजस्व प्रक्रिया हो, लेकिन एलओसी, विदेश में मौजूद व्यक्ति, स्थानीय नेटवर्क और कथित आर्थिक गतिविधियों के संदर्भ में यह जांच की एक अहम कड़ी बन गया है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि सनपाल कहां है और गुरुमुख क्या कर रहा था। सवाल यह है कि कथित नेटवर्क से पैसा कितना आया, कहां गया, किसके नाम पर संपत्ति बनी और उस पैसे की आखिरी मंजिल क्या थी?
पुलिस अपनी जांच कर रही है। राजस्व रिकॉर्ड अपनी कहानी बता रहे हैं। अब नजर ईडी पर है। क्या वह इन बिखरी कड़ियों को जोड़कर पूरी आर्थिक तस्वीर सामने लाएगी या सनपाल का कथित साम्राज्य सिर्फ एफआईआर और गिरफ्तारी की कार्रवाई तक ही सीमित रहेगा?
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