फर्जी कर्मचारियों के नाम पर 18 साल तक निकाला वेतन: सड़क परिवहन निगम में वेतन सिंडिकेट का खुलासा
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम में वेतन घोटाले का खुलासा अब एक साधारण वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि संगठित भ्रष्टाचार के विशाल नेटवर्क के रूप में उभर रहा है।
ताजा खुलासों और पुराने रिकॉर्ड के ऑडिट से स्पष्ट हुआ है कि वर्षों तक फर्जी कर्मचारियों के नाम पर सरकारी खजाने से रकम निकाली जाती रही और जिम्मेदार तंत्र या तो आंखें मूंदे रहा या इस खेल में शामिल रहा।
जांच में खुलासा हुआ कि 1998 से 2016 के बीच 12 ऐसे नामों पर वेतन निकाला गया, जो कभी निगम के कर्मचारी थे ही नहीं। इन फर्जी नामों को 512 कर्मचारियों की सूची में जोड़कर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाए गए और हर महीने वेतन ट्रांसफर किया जाता रहा। करीब 18 साल तक चले इस खेल में लगभग 49 लाख 2 हजार 82 रुपए सरकारी खजाने से निकाले गए।
फर्जी दस्तावेज, असली भुगतान
सड़क परिवहन कर्मचारी-अधिकारी उत्थान समिति के अध्यक्ष श्यामसुंदर शर्मा ने इस पूरे प्रकरण को संगठित भ्रष्टाचार करार दिया है। उनके अनुसार यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं, बल्कि पूरा नेटवर्क है, जिसमें निचले से लेकर उच्च स्तर तक के लोग शामिल हो सकते हैं।
यह पूरा खेल फर्जी दस्तावेज और बैंक खातों के जरिये किया जाता रहा। इस घोटाले की जड़ वर्ष 1998 में जाती है, जब कर्मचारियों को महंगाई भत्ता नहीं मिला था। बाद में 2016 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 200 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान कर्मचारियों को किया गया।
यही प्रक्रिया घोटाले का सबसे बड़ा माध्यम बनी। दस्तावेजों के सत्यापन के नाम पर फर्जी नाम जोड़े गए और 2016 से 2022 के बीच बड़ी संख्या में गैर-कर्मचारियों को भुगतान कर दिया गया। अब तक लगभग 18 संदिग्ध मामलों की पहचान हो चुकी है, वहीं शंका जताई जा रही है कि यह संख्या सैकड़ों या हजारों तक भी पहुंच सकती है।
5 साल पहले 25 लाख के फर्जी भुगतान का हुआ था खुलासा
यह पहली बार नहीं है, जब निगम में इस तरह के फर्जीवाड़ा का खुलासा हुआ है। करीब 5 वर्ष पहले 6 मामलों में 25 लाख रुपए के फर्जी भुगतान का खुलासा हुआ था। हालांकि दो मामलों में राशि वापस भी करवाई गई, लेकिन किसी भी जिम्मेदार अधिकारी पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिससे भ्रष्टाचारियों के हौसले बुलंद होते गए।
हाल ही इंदौर संभाग में करीब 48 लाख रुपए के घोटाले का नया खुलासा हुआ है। संभागीय प्रबंधक अशोक तोमर की शिकायत पर इस मामले में एमजी रोड थाने में केस दर्ज किया गया। पुलिस अब 1998 से जुड़े बैंक खातों, दस्तावेजों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कर रही है। थाना प्रभारी के अनुसार पुराने रिकॉर्ड तलब किए हैं और साक्ष्यों के आधार पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
राज्यभर में एक जैसे पैटर्न की आशंका
समिति अध्यक्ष शर्मा ने दावा किया कि यह घोटाला केवल इंदौर तक सीमित नहीं, बल्कि भोपाल मुख्यालय और जबलपुर सहित अन्य संभागों में भी इसी तरह के फर्जी भुगतान के संकेत मिले हैं। यदि यह साबित होता है, तो यह मामला राज्यव्यापी वित्तीय घोटाले का रूप ले सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर 18 साल तक यह घोटाला चलता कैसे रहा? क्या ऑडिट, सत्यापन और निगरानी तंत्र पूरी तरह फेल था या फिर जानबूझकर अनदेखी की गई। जांच की आंच अब उन अधिकारियों तक पहुंच सकती है, जो उस दौरान इंदौर व अन्य संभागों में पदस्थ थे।
दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए: शर्मा
समिति अध्यक्ष ने इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह के घोटालों पर रोक लग सके।
मामले ने जहां सिस्टम की साख पर सवाल खड़े किए हैं, वहीं वर्तमान प्रबंधन के कुछ अधिकारियों की भूमिका सराहनीय भी मानी जा रही है।
प्रबंध निदेशक मनीष सिंह और संभागीय प्रबंधक अशोक तोमर सहित उन अधिकारियों को श्रेय दिया जा रहा है, जिनके प्रयासों से इस बड़े घोटाले का खुलासा हुआ।
अब देखना यह है कि जांच एजेंसियां इस इसकी जड़ों तक पहुंच पाती हैं या अन्य घोटालों की तरह यह भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
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