सहारा सिटी खंडहरों में तब्दील हो रहे करोड़ों रुपए के आशियाने: मूलभूत सुविधाओं के नाम पर शून्य; नियमों को दरकिनार कर चल रहा तानाशाही का खेल
KHULASA FIRST
संवाददाता

प्रशासनिक लापरवाही ने 150 परिवारों को ‘नरक’ में झोंका
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
बिचौली मर्दाना स्थित सहारा सिटी होम्स आज अपनी बदहाली और कुप्रबंधन की ऐसी कहानी बयां कर रहा है, जिसे देखकर कोई भी सिहर जाए। कभी आलीशान जीवन का सपना दिखाकर बसाए गए इस प्रोजेक्ट में अब कई बिल्डिंग अधूरी पड़ी हैं और खंडहर में तब्दील हो रही हैं।
इन लावारिस इमारतों के चारों ओर कंटीली झाड़ियों का साम्राज्य है, जो न केवल सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक हैं, बल्कि जहरीले जीवों का डेरा भी बन चुकी हैं। रखरखाव (मेंटेनेंस) के नाम पर यहां व्यवस्थाएं पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी हैं।
आलम यह है कि कॉलोनी का कचरा उठाने तक की नियमित व्यवस्था नहीं है, थक-हारकर अब रहवासी अपने निजी व्यय पर सफाई कर्मियों से कचरा हटवाने और स्वच्छता बनाए रखने को मजबूर हैं। संपन्न परिवारों का यह समूह आज अपनी ही गाढ़ी कमाई के घर में मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।
मामला केवल सुविधाओं के अभाव का नहीं, बल्कि संस्था के संचालन में बरती जा रही भारी वैधानिक धांधली का भी है। सरकारी रिकॉर्ड और सहकारिता विभाग के दस्तावेजों में जो संस्था ‘गुडमेंस डिलाइट वेलफेयर सोसाइटी’ के नाम से पंजीकृत है, उसके कर्ता-धर्ता एजीएम और अन्य नोटिसों में ‘निवासी कल्याण संघ’ जैसे अनधिकृत नामों का उपयोग कर रहे हैं।
यह सीधे तौर पर सहकारिता नियमों का उल्लंघन है, क्योंकि कोई भी संस्था अपने पंजीकृत नाम और नियमावली से बाहर जाकर वैधानिक कार्य नहीं कर सकती। नाम का यह हेरफेर भविष्य में रहवासियों के लिए बड़ा कानूनी संकट खड़ा कर सकता है, क्योंकि सरकारी विभाग और न्यायालय केवल पंजीकृत दस्तावेजों को ही मान्यता देते हैं।
भीषण गर्मी के इस दौर में मात्र 4 लोगों के रसूख के आगे 150 परिवार पानी की बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद प्रबंधन द्वारा जानबूझकर ‘मोटर जलने’ या ‘फंड की कमी’ जैसे बहाने बनाकर कृत्रिम जल संकट पैदा किया जा रहा है।
इसी बीच एक रहवासी महिला ने नाम न छापने की शर्त पर सहारा सिटी प्रबंधन की मनमानी का खुलासा करते हुए कई गंभीर आरोप लगाए हैं। महिला का कहना है कि प्रबंधन द्वारा जानबूझकर लोगों की आवाज दबाई जाती है और शिकायतों पर सुनवाई के बजाय निवासियों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।
हद तो तब हो गई, जब अपनी समस्या का निजी समाधान करने के लिए यदि कोई निवासी खुद के खर्च पर बोरिंग कराना चाहता है या नया कनेक्शन लेना चाहता है, तो यही तत्व उस पर भी बेबुनियाद आपत्ति जताकर अड़ंगा डाल रहे हैं।
संस्था के पदों के गठन और अधिकारों के इस्तेमाल में भी पारदर्शिता का अभाव है। वार्षिक साधारण सभा बुलाने की प्रक्रिया और नोटिस की अवधि में नियमों को ताक पर रख दिया गया है। जानकारों का कहना है कि यदि भविष्य में कोई नई एजेंसी या सरकारी तंत्र प्रबंधन संभालता है, तो वह इन अवैध कागजी कार्यवाहियों को सिरे से खारिज कर देगा, जिसका सीधा खामियाजा आम रहवासियों को भुगतना होगा।
रसूखदारों द्वारा सरेआम पानी की लाइनें तोड़ना और निवासियों के निजी प्रयासों में बाधा डालना यह दर्शाता है कि यहां कानून का खौफ खत्म हो चुका है। अब देखना यह है कि सहकारिता विभाग और जिला प्रशासन इस गंभीर प्रशासनिक, कानूनी और सामाजिक ओर मूलभूत सुविधाओ की अनियमितता पर कब संज्ञान लेता है और कब इन परिवारों को इस नारकीय स्थिति से निजात दिलाता है।
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