रोस्टर निरीक्षण बना औपचारिकता का खेल: संभागायुक्त की ‘संतुष्टि’ के पीछे प्रशासनिक ढिलाई की परतें
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर संभाग में रोस्टर निरीक्षण की कवायद एक बार फिर सवालों के घेरे में है। लगभग पांच पूर्व संभागायुक्तों ने जिन विभागों में जाकर कमियों की परतें उधेड़ी थीं, इस बार वही विभाग ‘अछूते’ रह गए। वर्तमान संभागायुक्त डॉ. सुदाम खाड़े का निरीक्षण सीमित दायरे में सिमटकर औपचारिकता पूरी करता नजर आया। जबकि नियम साफ कहते हैं कि रोस्टर निरीक्षण से एक माह पूर्व टीम प्रकरणों की गहन पड़ताल कर कमियों की सूची तैयार करती है। शायद की भी गई हो।
डॉ. सुदाम खाड़े ने प्रशासनिक संकुल स्थित राजस्व न्यायालयों का निरीक्षण किया। दो तहसील, दो अनुविभाग और दो अपर कलेक्टर न्यायालयों की फाइलें देखी गईं। एडीएम रोशन राय और रिंकेश वैश्य के न्यायालयों का निरीक्षण हुआ, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ न्यायालय कक्षों का दौरा ही रोस्टर निरीक्षण है?
खनिज विभाग, आबकारी विभाग और आदिम जाति कल्याण जैसे विभाग, जिन्हें पूर्व संभागायुक्तों ने गंभीर अनियमितताओं का अड्डा बताया था, इस बार निरीक्षण सूची में क्यों नहीं दिखे? क्या कमियां खत्म हो गईं, या देखने की इच्छा ही समाप्त हो गई?
जूनी इंदौर में गड़बड़ियां, लेकिन निरीक्षण में ‘संतोष’
जूनी इंदौर क्षेत्र में लंबे समय से बड़े प्रकरण लंबित हैं। आरोप हैं कि एसडीएम नियमित रूप से कार्यालय में उपलब्ध नहीं रहते, जबकि कॉलोनी सेल का प्रभार भी उन्हीं के पास है। इसके बावजूद निरीक्षण के दौरान इन गंभीर मुद्दों पर कोई ठोस कार्रवाई का खुलासा नहीं हुआ। सिर्फ समय पर कार्यालय आने और गुणवत्तापूर्ण निराकरण के निर्देश देकर क्या प्रशासन अपनी जिम्मेदारी पूरी मान सकता है?
कलेक्टर कार्यालय का निरीक्षण, पर अधीनस्थ कार्यालयों पर चुप्पी
कलेक्टर कार्यालय का निरीक्षण तो हुआ, लेकिन उसी परिसर में संचालित दो एसडीएम कार्यालयों की समीक्षा तक नहीं की गई। यह चूक है या जानबूझकर नजरअंदाज? जबकि रोस्टर निरीक्षण का उद्देश्य ही अधीनस्थ अमले की जवाबदेही तय करना होता है।
जिला पंचायत में संतुष्टि, पर जमीनी सच्चाई कुछ और
जिला पंचायत इंदौर में ग्रामीण विकास और स्वच्छता कार्यों की समीक्षा के बाद संतोष व्यक्त किया गया। संभागायुक्त ने नगर निगम सीमा से लगी पंचायतों- बांक, नावदापंथ, देवगुराड़िया, मांगलिया, कैलोदहाला, भांग्या, बारोली, रंगवासा, नैनोद और बुढ़ानिया- की सफाई व्यवस्था नगर निगम को सौंपने का प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए, लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि जब नगर निगम शहरी क्षेत्रों में ही स्वच्छता बनाए रखने में संघर्ष कर रहा है, तो ग्रामीण क्षेत्रों की अतिरिक्त जिम्मेदारी देकर क्या हालात सुधरेंगे या और बिगड़ेंगे?
रोस्टर निरीक्षण का असली उद्देश्य क्या रह गया?
नियमों के अनुसार रोस्टर निरीक्षण में विभिन्न जिलों से फाइलें निकलती हैं, कमी-पेशी का लेखा-जोखा तैयार होता है और संभागायुक्त स्वयं गंभीर प्रकरणों की समीक्षा करते हैं। इस बार यह प्रक्रिया कितनी गहराई से हुई, इस पर सवाल हैं। अभी तक सिर्फ एक एडीएम द्वारा तहसील कार्यालयों का निरीक्षण किया गया है। व्यापक स्तर पर विभागीय फाइलों की पड़ताल और अनियमितताओं की जांच का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला।
‘संकल्प से समाधान’ या ‘संतोष से समापन’?
निरीक्षण के दौरान संकल्प से समाधान अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन के निर्देश दिए गए। सीएम हेल्पलाइन, लोक सेवा गारंटी और समयसीमा प्रकरणों की समीक्षा भी की गई। लेकिन सवाल यह है कि जब जमीनी स्तर पर फाइलें लंबित हैं, अधिकारी क्षेत्र भ्रमण में सक्रिय नहीं हैं और कई विभागों में पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न हैं—तो क्या केवल निर्देश देने से समाधान संभव है?
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