रेवंत रेड्डी धिक्कार है: कर दिया भगवान का बंटवारा
KHULASA FIRST
संवाददाता

आस्था का भूगोल भी तय करने पर उतर आई कांग्रेस, शर्मनाक
तेलंगाना के सीएम ने दिया विवादास्पद बयान
मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के ‘राम बनाम शिव’ और ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ वाले बयान ने छेड़ी नई बहस
क्या कांग्रेस अब आस्था का भूगोल और राजनीतिक सरहदें भी तय करेगी? क्या देवों का भी बंटवारा संभव है?
सनातन परंपरा के एकात्म भाव पर सियासी प्रहार या महज चुनावी नैरेटिव की छटपटाहट? मचा बवाल
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारतीय राजनीति में चुनावी बिसात बिछाने के लिए प्रतीकों और बयानों का सहारा लेना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब राजनीति के गलियारों से निकलकर बयान सीधे गर्भगृह तक पहुंच जाएं, तो वे समाज के सांस्कृतिक ताने-बाने को झकझोर देते हैं।
नई दिल्ली के एक मंच से तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी द्वारा दिया गया ताजा बयान कुछ ऐसा ही है। उन्होंने न केवल भगवान राम और भगवान शिव के स्वरूपों को ‘अमीर और गरीब’ के खांचे में बांट दिया, बल्कि इसके बहाने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक काल्पनिक सांस्कृतिक विभाजन (आर्यन बनाम द्रविड़) रेखा खींचने की भी कोशिश की है।
लोकतांत्रिक राजनीति में किसी दल की नीतियों पर प्रहार करना स्वीकार्य है, परंतु क्या राजनीतिक लाभ-हानि के लिए करोड़ों लोगों की साझी आस्था के आधार-स्तंभों का इस तरह वर्गीकरण करना उचित है?
लोकतंत्र में हर दल को अपनी विचारधारा के प्रचार और चुनावी रणनीति बनाने का अधिकार है। भगवान शिव और श्रीराम के बीच कोई कृत्रिम द्वंद्व खड़ा करना न तो तार्किक है और न ही नैतिक।
सत्ता आती-जाती रहती है, चुनावी नैरेटिव बनते और बिगड़ते रहते हैं, लेकिन जो आस्था इस देश को कन्याकुमारी से कश्मीर तक एक रखती है, उसे सियासी कुल्हाड़ी से नहीं काटा जाना चाहिए। राजनेताओं को यह समझना होगा कि वे जिस डाल पर बैठे हैं, वह देश की सांस्कृतिक एकता की ही डाल है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी द्वारा नई दिल्ली में एक मीडिया कॉन्क्लेव के दौरान भगवान राम और भगवान शिव को लेकर दी गई टिप्पणी पर राजनीति गरमा गई है।
उन्होंने दक्षिण भारतीयों को द्रविड़ व शिवभक्त और उत्तर भारतीयों को आर्यन व रामभक्त बताते हुए भगवान शिव को ‘गरीबों का देवता’ और भगवान राम को ‘अमीरों का देवता’ करार दिया है। इस पर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। हालांकि उनके दावे दक्षिण की भौगोलिक धार्मिक स्थिति के सामने टिक नहीं पाते।
मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का तर्क था कि उत्तर भारत में भाजपा ने भगवान राम को एक राजनीतिक प्रतीक में तब्दील कर दिया है और कांग्रेस को उत्तर में इसी कारण चुनावी संघर्ष करना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि दक्षिण के लोग भगवान शिव के उपासक हैं, जो वैरागी और गरीबों के देवता हैं, जबकि भगवान राम शासक और अमीरों के देवता हैं।
कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने इस बयान का बचाव करते हुए कहा कि यह टिप्पणी केवल भगवान के परिधानों और बाह्य स्वरूप के भौतिक चित्रण पर आधारित थी और निशाना भाजपा की राजनीति पर था, लेकिन यह स्पष्टीकरण उस बड़ी लकीर को मिटाने में नाकामी साबित होता है, जो अनजाने में या सोची-समझी रणनीति के तहत खींच दी गई है।
इस बयान के आते ही भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने तीखा मोर्चा खोल दिया है। केंद्रीय मंत्रियों और स्थानीय नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन खिसकते देख देश में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर उतर आई है।
आलोचकों का कहना है कि आगामी स्थानीय चुनावों और उपचुनावों को देखते हुए क्षेत्रीय और धार्मिक ध्रुवीकरण का यह एक सुनियोजित प्रयास है, ताकि एक खास वोट बैंक को साधा जा सके।
सांस्कृतिक एकता व ‘हरिहर’ का अभेद्य संबंध... ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो भारत की सनातनी मनीषा ने कभी भी राम और शिव को एक-दूसरे के विपरीत नहीं, बल्कि एक-दूसरे का पूरक माना है।
रामचरितमानस में स्वयं भगवान राम कहते हैं- ‘शिव द्रोही मम दास कहावा, सो नर मोहि सपनेहु नहि भावा।’ यानी शिव से द्रोह करने वाला मुझे स्वप्न में भी प्रिय नहीं हो सकता। वहीं भगवान शिव निरंतर राम-नाम का जाप करते हैं।
यदि मुख्यमंत्री रेड्डी के दावों को भौगोलिक कसौटी पर भी कसा जाए, तो वे पूरी तरह ध्वस्त हो जाते हैं। दक्षिण की ‘अयोध्या’ और उत्तर की ‘काशी’ तेलंगाना में ही ‘भद्राचलम’ स्थित है, जिसे दक्षिण की अयोध्या कहा जाता है, वहीं वेमुलावाड़ा को दक्षिण की काशी के रूप में पूजा जाता है।
दक्षिण भारत के सबसे छोर पर स्थित रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग की स्थापना स्वयं भगवान राम ने लंका विजय से पूर्व शिव आराधना के लिए की थी। उत्तर भारत में अमरनाथ, केदारनाथ और काशी विश्वनाथ जैसे महान शिव धाम करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र हैं।
ऐसे में देवों को भौगोलिक सीमाओं (उत्तर बनाम दक्षिण) या आर्थिक वर्गों (अमीर बनाम गरीब) में विभाजित करना भारत की उस अनवरत सांस्कृतिक चेतना का अपमान है, जो आदि शंकराचार्य के समय से चारों कोनों को एक सूत्र में पिरोती आई है।
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