लाइसेंसी शराब दुकानों पर रेट लिस्ट हुई ‘गायब’: आबकारी अमले की मिलीभगत से रद्दी हुए सरकारी दाम के बोर्ड
KHULASA FIRST
संवाददाता

नीमच में कानून बना ‘अमौली’ का गुलाम, लूट की मलाई में साहब भी हिस्सेदार
जनता की जेब पर सरेआम डकैती, आबकारी विभाग ने माफिया को दी कानून कुचलने की खुली छूट
खुलासा फर्स्ट, नीमच।
जिले में आबकारी विभाग ने नैतिकता, कानून और अपने कर्त्तव्य का सरेआम गला घोंटकर खुद को शराब माफिया अशोक और अरुल अरोरा के ‘अमौली ग्रुप’ के चरणों में समर्पित कर दिया है। खाकी की गरिमा और विभाग की बची-खुुची साख को रसूखदारों के पास गिरवी रख दिया गया है।
आज नीमच की गलियों में चर्चा आम है कि यहां संविधान का कानून नहीं, बल्कि माफिया का सिक्का चलता है। ‘अमौली ग्रुप’ द्वारा संचालित लाइसेंसी शराब दुकानों पर जिस तरह सरेआम लूट और अवैध ओवर रेटिंग का नंगा नाच चल रहा है, उसे देखकर ऐसा लगता है कि प्रशासन ने अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर माफिया को जनता की जेब काटने का गुप्त लाइसेंस बांट दिया है।
आबकारी अधिनियम की धज्जियां उड़ाते हुए दुकानों से रेट लिस्ट गायब कर दी गई है। नियमानुसार हर दुकान के मुख्य द्वार पर सरकारी रेट लिस्ट चस्पा होना अनिवार्य है, ताकि ग्राहक ठगी का शिकार न हो, लेकिन नीमच का आबकारी अमला इतना अक्षम और कर्तव्यविमुख साबित हो रहा है कि वह इन रसूखदार ठेकेदारों से एक बोर्ड तक नहीं लगवा पा रहा। यह चुप्पी विभाग की लाचारी नहीं, बल्कि उस साठगांठ और मलाई में हिस्सेदारी का पुख्ता प्रमाण है जिसने पूरे सरकारी तंत्र को माफिया का दरबान बना दिया है।
प्रशासनिक शिथिलता का आलम यह है कि स्टिंग ऑपरेशनों में ओवर रेटिंग के वीडियो और पुख्ता सबूत सामने आने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। हर बोतल पर 35 से 100 रुपये की अतिरिक्त अवैध वसूली की जा रही है, और विरोध करने पर अमौली ग्रुप के लठैत ग्राहकों को धमकाते हैं। यह हिम्मतहीन कार्यप्रणाली शासन की मंशा और विभाग की निष्ठा पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करती है।
सरकारी कुर्सी पर बैठकर माफिया के प्रति दिखाई जा रही यह वफादारी सीधे नौकरी से नमकहरामी है। जब रक्षक ही रसूखदारों के घर की दासी बन जाएं और नियमों की मर्यादा को माफिया के पैरों तले रौंदने दिया जाए, तो नीमच की आम जनता इंसाफ की गुहार लेकर कहां जाएगी?
सरकारी तंत्र की यह शर्मनाक लाचारी शहर के चौक-चौराहों पर चर्चा का विषय बनी हुई है कि आखिर एक शराब कारोबारी के रसूख के आगे पूरा प्रशासनिक अमला इतना बौना, लाचार और बेबस कैसे नजर आ रहा है? क्या इन साहबों का जमीर माफिया के रसूख के नीचे दबकर दम तोड़ चुका है?
हैरानी और शर्म की बात तो यह है कि जो काम आबकारी विभाग को अपनी जिम्मेदारी समझकर करना चाहिए, वह काम अब पुलिस को करना पड़ रहा है। पिछले महीने अमौली ग्रुप के गुर्गों के अवैध शराब ठिकानों पर पुलिस की जो छापेमार कार्रवाई हुई, वह आबकारी विभाग के मुंह पर एक करारा तमाचा था।
सवाल है कि जब विभाग के पास खुफिया टीम, उड़नदस्ता और सशस्त्र बल है, तो माफिया के साम्राज्य पर चोट करने की हिम्मत क्यों नहीं जुटाई गई? क्या वह कार्रवाई भी महज जनता की आंखों में धूल झोंकने की एक सोची-समझी नूराकुश्ती थी?
जब विभाग के कारिंदे ही माफिया को संरक्षण देने में मशगूल हों और उनकी मनमानी पर पर्दा डालते हों, तो फिर निष्पक्ष छापेमारी की उम्मीद करना ही बेमानी है। आबकारी विभाग की इस ढुलमुल और माफिया-परस्त नीति ने अपराधियों के दुस्साहस को चरम पर पहुंचा दिया है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि नीमच में अब लोकतंत्र नहीं, बल्कि शराब सिंडिकेट का अपना समानांतर प्रशासन चल रहा है।
नियमों को ठेंगे पर रखकर जनता को दोनों हाथों से लूट रहे
अधिकारी केवल एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठकर फाइलों का पेट भर रहे हैं और ऊपर तक हिस्सा पहुंचाने के खेल में मशगूल हैं, जबकि धरातल पर अमौली ग्रुप सरकारी नियमों को ठेंगे पर रखकर जनता को दोनों हाथों से लूट रहा है। यह पूरी कार्यप्रणाली प्रदेश सरकार की जीरो टॉलरेंस और सुशासन के दावों को सरेआम चुनौती दे रही है।
जनहित और शासन हित की मांग है कि प्रशासन तत्काल कुंभकर्णी नींद से जागे, इन दुकानों पर भारी-भरकम आर्थिक दंड अधिरोहित करे और नियमों का खुला उल्लंघन करने वाले शराब लायसेंसों को सस्पेंड करने जैसी सख्त दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करे।
जब तक इन दुकानों के लायसेंस निरस्त करने की प्रक्रिया शुरू नहीं होगी, माफिया का हौसला नहीं टूटेगा। यदि सरकार ने इन लुटेरी दुकानों के खिलाफ कठोर कानूनी कदम नहीं उठाए, तो यह पूरी तरह साफ हो जाएगा कि नीमच में आबकारी विभाग का अस्तित्व अब केवल और केवल शराब माफिया के अवैध हितों को संरक्षण देने और उनकी दलाली करने के लिए ही बचा है।
जनता की चुप्पी को उनकी कमजोरी समझने की भूल प्रशासन को महंगी पड़ेगी, क्योंकि जब रक्षक ही भक्षक का साथ देने लगें, तो व्यवस्था के खिलाफ जन-आक्रोश का फूट पड़ना तय है। अब सवाल अधिकारियों की नीयत पर है वे संविधान की शपथ का मान रखेंगे या माफिया की गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहेंगे?
लूट की खुली छूट... दुकानों पर रेट लिस्ट नहीं होना ही विभाग की नमकहरामी का सबूत है, जहां माफिया के रसूख के आगे सरकारी नियम बौने साबित हो रहे हैं।
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