कानून से भी खतरनाक निकला राजकुमार उर्फ बाबू खतुरिया: ग्रीन बेल्ट निगलकर बसाया विदुर नगर
KHULASA FIRST
संवाददाता

1000 करोड़ की शासकीय जमीन पर कब्जा, फर्जी प्लॉटिंग, सहकारिता घोटाला और प्रशासन की चुप्पी-अहिरखेड़ी में खुला बड़ा भू-माफिया नेटवर्क
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अहिरखेड़ी क्षेत्र में ग्रीन बेल्ट की हजारों करोड़ की शासकीय जमीन को निजी बताकर बेचने का ऐसा संगठित खेल का खुलासा हुआ है, जिसने कानून व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। राजकुमार उर्फ बाबू खतुरिया और उसके साथियों पर आरोप है कि उन्होंने सहकारी संस्थाओं की आड़ में न केवल सरकारी जमीन को हड़प लिया, बल्कि हजारों लोगों को फर्जी प्लॉट बेचकर करोड़ों का घोटाला कर डाला।
हैरानी है कि जांच के आदेश के बावजूद जिम्मेदार चुप हैं। अहिरखेड़ी के सिरपुर तालाब से सटी सर्वे नंबर 525 की 443 एकड़ जमीन, जो वर्ष 1962-63 तक राजस्व रिकॉर्ड में शासकीय थी, उस पर अवैध कब्जों का खेल शुरू हुआ। 1964 में इस जमीन पर अचानक निजी नाम दर्ज कर दिए गए और धीरे-धीरे यहां विदुर नगर, प्रजापत नगर जैसी कॉलोनियां खड़ी हो गईं।
करीब 200 एकड़ में फैली विदुर नगर कॉलोनी में 1000 प्लॉट और 24 बगीचों का प्रावधान था, लेकिन आज बगीचों की जमीन तक को प्लॉटिंग में बदल दिया गया। ग्रीन बेल्ट, स्कूल और सार्वजनिक जमीन को भी नहीं छोड़ा गया।
सहकारी संस्था के नाम पर बड़ा खेल... 1970 में खरीदी गई जमीन पर 1971 में ‘नाइटेंगल’ संस्था का पंजीयन हुआ, जिसे 1975 में बदलकर विदुर नगर सहकारी संस्था कर दिया गया। इसके बाद संस्था के पदाधिकारियों राकेश शुक्ला और प्रदीप शुक्ला ने बड़े पैमाने पर नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए सदस्य बनाए और प्लॉट बांटे। एक ही परिवार के पति-पत्नी को दो-दो प्लॉट, कई लोगों को तीन-तीन प्लॉट तक दे दिए गए। सहकारिता अधिनियम की खुलेआम अनदेखी की गई।
135 एकड़ जमीन का षड्यंत्रपूर्वक सौदा... 1995 में संस्था के पदाधिकारियों ने खुद को ही वारिस बताकर 135 एकड़ जमीन मोहनदास रामरख्यानी को बेच दी। इसके बाद राजकुमार खतुरिया, मोहनदास और नारायणदास ने मिलकर इस जमीन पर कब्जा जमा लिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि 1975 से 1995 के बीच जिन 835 लोगों को प्लॉट आवंटित किए थे, उनका क्या हुआ? उनके अधिकार कहां गायब हो गए?
फर्जी संस्थाएं बनाकर खेल... 1998 में राजकुमार खतुरिया और उसके साथियों ने संस्था पर कब्जा जमाकर झूलेलाल गृह निर्माण संस्था नाम से डमी संस्था बनाई। इसके जरिए 28 एकड़ जमीन को आपस में ही रजिस्ट्री करवा लिया गया।
नक्शे में हेरफेर कर बगीचों, स्कूल और अन्य आरक्षित जमीन को गायब कर दिया गया और वहां प्लॉट काटकर बेच दिए गए। आज 24 में से सिर्फ 8 बगीचे ही बचे हैं।
हजारों फर्जी प्लॉट, एक ही जमीन कई बार बिकी...आरोप है कि 135 एकड़ जमीन पर 5000 से ज्यादा फर्जी प्लॉट बेचे गए। वहीं 28.33 एकड़ जमीन को कृषि भूमि बताकर बेच दिया गया। फर्जी शपथ पत्र, अपात्र सदस्यों का पंजीयन, एक ही जमीन की कई रजिस्ट्रियां, हर स्तर पर नियमों को कुचला गया। इससे शासन को भारी राजस्व का नुकसान हुआ।
1000 करोड़ से ज्यादा का घोटाला... पूरे मामले में करीब 1000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की ग्रीन बेल्ट शासकीय जमीन को निजी बताकर बेचने का आरोप है। हजारों लोगों को आज तक वैध दस्तावेज नहीं मिले, जिससे वे ठगी का शिकार बने।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल... मामले की जांच क्षेत्रीय एसडीएम और सहकारिता विभाग को सौंपी गई है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इतने बड़े घोटाले में प्रशासनिक मिलीभगत भी है?
अहिरखेड़ी का यह मामला सिर्फ जमीन घोटाला नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी और भू-माफिया के हौसलों की कहानी है। जब कानून के रखवाले ही खामोश हों तो राजकुमार उर्फ बाबू खतुरिया जैसे लोग कानून से भी खतरनाक साबित होते हैं।
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