जय जगन्नाथ के जयकारों से गूंजा पुरी: भव्य रथयात्रा में उमड़ा आस्था का सैलाब; देश-विदेश के लाखों भक्त हुए शामिल, भाई-बहनों संग रथ पर सवार हुए प्रभु
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, पुरी।
भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा का शुभारंभ गुरुवार, 16 जुलाई 2026 को ओडिशा के पुरी में भक्ति और उल्लास के साथ हुआ। सुबह विशेष पूजा-अर्चना के बाद भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिए रवाना हुए।
देश-विदेश के लाखों भक्त हुए शामिल
इस दौरान लाखों श्रद्धालुओं ने "जय जगन्नाथ" के जयघोष के बीच रथों की रस्सियां खींचकर दर्शन का पुण्य लाभ प्राप्त किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा सात दिनों तक गुंडिचा मंदिर में विराजमान रहते हैं। इसके बाद 'बहुदा यात्रा' के माध्यम से पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। रथयात्रा को हिंदू धर्म के सबसे बड़े और पवित्र धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है।
दुनियाभर से पहुंचे श्रद्धालु
रथयात्रा में भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, नेपाल, बांग्लादेश और ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों से हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। श्रद्धालुओं का मानना है कि भगवान के रथ की रस्सी खींचना या उसका स्पर्श करना अत्यंत शुभ होता है और इससे जीवन के कष्ट दूर होकर भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
विदेशी श्रद्धालुओं ने जताई खुशी
रथयात्रा में शामिल एक विदेशी श्रद्धालु ने बताया कि वह पिछले 10 वर्षों से इस आयोजन में शामिल होने का सपना देख रहे थे। उन्होंने कहा कि वे 126 देशों की यात्रा कर चुके हैं, लेकिन पुरी की रथयात्रा जैसा आध्यात्मिक और भव्य आयोजन कहीं नहीं देखा। उन्होंने भारतीय संस्कृति और श्रद्धालुओं की आस्था की खुलकर सराहना की।
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलती है रथयात्रा
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है। इसके लिए कई महीने पहले तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बसंत पंचमी से विशेष लकड़ी से तीनों रथों का निर्माण शुरू होता है और हर वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं।
क्या है रथयात्रा की धार्मिक मान्यता?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार देवी सुभद्रा ने अपने दोनों भाइयों भगवान जगन्नाथ और बलभद्र से नगर भ्रमण कराने की इच्छा जताई थी। बहन की इच्छा पूरी करने के लिए दोनों भाई अलग-अलग रथों में सवार होकर नगर भ्रमण पर निकले।
तभी से आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने की परंपरा चली आ रही है। भक्ति, आस्था और उत्साह से सराबोर इस ऐतिहासिक आयोजन में लाखों श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ से सुख-समृद्धि, शांति और विश्व कल्याण की कामना की।
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