महीनों से सफाई को तरस रहे हैं पब्लिक टॉयलेट: अस्वच्छता का प्रमाण दे रहे सार्वजनिक शौचालय
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देशभर में स्वच्छता का सरताज कहे जाने वाला इंदौर इन दिनों अपने सार्वजनिक शौचालयों की बदहाली को लेकर सवालों के घेरे में है। एक ओर शहर लगातार स्वच्छ सर्वेक्षण में शीर्ष स्थान हासिल कर रहा है, वहीं दूसरी ओर आम नागरिकों के लिए बनाई गए सार्वजनिक शौचालय गंदगी, दुर्गंध और अव्यवस्था का शिकार बने हुए हैं।
आम जनता मूलभूत सुविधाएं से वंचित: स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कई सार्वजनिक शौचालय महीनों से नियमित सफाई का इंतजार कर रहे हैं। जगह-जगह गंदगी का अंबार, टूटे हुई टॉयलेट सीट और अस्वच्छ वातावरण लोगों को उपयोग करने से रोक रहे हैं। लोगों का आरोप है कि नगर निगम और जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं में आम जनता की मूलभूत सुविधाएं कहीं पीछे छूट गई हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर हो सकती है किरकिरी: चिंता का विषय यह है कि इन दिनों इंदौर में ब्रिक्स से जुड़े कार्यक्रमों के तहत विभिन्न देशों के राजनयिक प्रतिनिधि और मेहमान मौजूद हैं।
शहर को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वच्छता मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन सार्वजनिक शौचालयों की वास्तविक स्थिति इस दावे पर प्रश्नचिह्न खड़े करती दिखाई दे रही है।
स्थानीय लोगों का आरोप
रहवासियों के अनुसार यह किसी एक व्यक्ति या क्षेत्र की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे शहर की सार्वजनिक सुविधाओं के रखरखाव से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। वर्षा के दौरान हालात और अधिक खराब हो जाते हैं, जलभराव, दुर्गंध और संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। इसके बाद भी जनप्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों द्वारा नियमित निरीक्षण और प्रभावी कार्रवाई देखने को नहीं मिल रही है।
मोदी की ‘मन की बात’ का नहीं हो रहा पालन... गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात' कार्यक्रम सहित विभिन्न मंचों पर सार्वजनिक शौचालयों की स्वच्छता और रखरखाव पर लगातार जोर दिया है।
स्वच्छ भारत अभियान का प्रमुख उद्देश्य केवल शौचालयों का निर्माण नहीं, बल्कि उनकी नियमित सफाई और बेहतर संचालन भी है। ऐसे में इंदौर के सार्वजनिक शौचालयों की वर्तमान स्थिति स्वच्छता अभियान की जमीनी हकीकत पर कई सवाल खड़े कर रही है।
नागरिकों की निगम से मांग... नागरिकों ने निगम प्रशासन से मांग की है कि सार्वजनिक शौचालयों की नियमित सफाई, निगरानी और रखरखाव सुनिश्चित किया जाए, ताकि शहर की स्वच्छता की पहचान केवल कागजो तक सीमित न रहकर ‘वास्तविकता के मरुस्थल' में भी दिखाई दे।
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