कैलाश के ‘वेश’ पर जनता का क्लेश: बजरबट्टू सम्मेलन में क्या इस बार ‘यमराज’ बनेंगे विजयवर्गीय
KHULASA FIRST
संवाददाता

सियासत के बजरबट्टू जलते घरों की राख पर ठिठोली का रंग
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
होली का हुल्लड़, मालवी ठिठोली और इंदौर का विश्व प्रसिद्ध ‘बजरबट्टू सम्मेलन’। परंपरा तो हंसने-हंसाने की है, लेकिन इस बार इंदौर की आबोहवा में गुलाल से ज्यादा सवाल उड़ रहे हैं। जैसे-जैसे रंगों का त्योहार नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे भागीरथपुरा कांड को लेकर सत्ता के गलियारों में सवाल उठने लगे हैं।
शहर के चौराहों से लेकर सोशल मीडिया के अखाड़ों तक एक ही चर्चा आम है कि जिस इंदौर ने अभी-अभी 30 से ज्यादा घरों के चिराग बुझते देखे, क्या उसी शहर के बीचोबीच ‘विकास के नायक’ कहे जाने वाले कैलाश विजयवर्गीय हंसी के फव्वारे छोड़ेंगे? विपक्ष और आम जनता अब सीधे हमले पर उतर आए हैं।
सवाल सीधा और चुभने वाला है वेश बदलने में माहिर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय क्या इस बार मंच पर ‘यमराज’ का रूप धरकर उतरेंगे? यह सवाल महज एक व्यंग्य नहीं, बल्कि उन पीड़ित परिवारों का आक्रोश है, जिनके अपनों की बलि व्यवस्थागत विफलताओं की भेंट चढ़ गई।
सोशल मीडिया पर पोस्टरबाजी का दौर शुरू... सियासी गलियारों में चर्चा है कि ‘चांदू का चंदा’ इस बार फिर चमकने को बेताब है, लेकिन भागीरथपुरा की उन गलियों में पसरा मातम इस चमक को फीका कर रहा है। सोशल मीडिया पर पोस्टरबाजी का जो दौर शुरू हुआ है, उसने सत्ता पक्ष की नींद उड़ा दी है।
लोग पूछ रहे हैं कि जिस विभाग की जिम्मेदारी माननीय के कंधों पर है उसी के अंतर्गत हुई चूकों ने जब दर्जनों परिवारों को उम्र भर का रोना दे दिया तो फिर मंच से ठहाके लगाने का नैतिक अधिकार कहां से आता है? व्यंग्य की धार इतनी पैनी है कि अब जनता को कैलाशजी का कोई रूप नहीं, बल्कि उन मौतों का जवाब चाहिए।
लोग कह रहे हैं कि अभिनय करना और वेशभूषा बदलना कैलाशजी की पुरानी कला है, लेकिन इस बार का अभिनय जनता की दुखती रग पर नमक छिड़कने जैसा होगा। क्या मंच से उछाले गए चुटकुले उन मांओं के आंसुओं को पोंछ पाएंगे जिन्होंने अपने जवान बेटों को खोया है?
संवेदनशील शासन की गुहार लगा रही जनता... इंदौर की जनता अब रूप और रंग नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन की गुहार लगा रही है। भागीरथपुरा के घाव अभी ताजे हैं। ऐसे में बजरबट्टू सम्मेलन की तैयारियों को लेकर जो उत्साह सत्ता पक्ष दिखा रहा है, उसे लोग ‘संवेदनहीनता का शिखर’ बता रहे हैं।
सत्ता के रसूख और मंच की चकाचौंध के बीच ये सवाल रंगों की तरह हवा में तैर रहे हैं कि क्या भागीरथपुरा की त्रासदी भी किसी पुराने भाषण या किसी नए लतीफे में धुल जाएगी? क्या सत्ता पक्ष में इतनी हिम्मत है कि वो हंसी-मजाक के उस मंच से अपनी नाकामियों को स्वीकार करे?
यह होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि कैलाश विजयवर्गीय और सत्तासीन सरकार की जवाबदेही की अग्निपरीक्षा भी है। शहर अब केवल तमाशा नहीं देखना चाहता, उसे ठोस इंसाफ और जिम्मेदारी का अहसास चाहिए, न कि यमराज या किसी और वेश में केवल मनोरंजन। -बुरा न मानो होली है।
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