लाखों कर्मचारियों के प्रमोशन पर फिर लगा ब्रेक: फैसला आने से पहले जजों का ट्रांसफर; नई भर्तियां भी होंगी प्रभावित
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्य प्रदेश में करीब दो लाख अधिकारियों और कर्मचारियों के लंबे समय से लंबित प्रमोशन का मामला एक बार फिर अटक गया है। हाईकोर्ट में पदोन्नति में आरक्षण से जुड़े मामले पर फैसला आने से पहले ही सुनवाई कर रही खंडपीठ के दोनों जजों का तबादला हो गया, जिससे अब पूरे मामले की सुनवाई नई बेंच के सामने होगी।
40 से अधिक याचिकाएं दायर थीं
दरअसल, राज्य सरकार द्वारा जून 2025 में लागू किए गए लोक सेवा पदोन्नति नियमों को चुनौती देते हुए 40 से अधिक याचिकाएं दायर की गई थीं। इन याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने विस्तृत सुनवाई की थी। 17 फरवरी को बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था और कर्मचारी वर्ग को जल्द निर्णय की उम्मीद थी।
फैसला आने से पहले बदल गई बेंच
इस बीच मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा को सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त कर दिया गया, जबकि जस्टिस विनय सराफ का तबादला इंदौर खंडपीठ कर दिया गया। दोनों न्यायाधीशों के स्थानांतरण के बाद अब नियमानुसार नई बेंच गठित होगी, जिसे मामले की दोबारा सुनवाई करनी पड़ सकती है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि इससे प्रमोशन में आरक्षण को लेकर फैसले में और देरी हो सकती है।
प्रमोशन प्रक्रिया रुकने से उच्च पद खाली नहीं हो पा रहे
प्रमोशन प्रक्रिया रुकी रहने से विभागों में उच्च पद खाली नहीं हो पा रहे हैं। इसका सीधा असर सरकारी भर्ती प्रक्रिया पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार जब तक कर्मचारियों को पदोन्नति नहीं मिलेगी, तब तक रिक्त पदों की संख्या नहीं बढ़ेगी और नई नियुक्तियों की गति भी प्रभावित होगी।
अब तक 78 हजार से अधिक पदों पर भर्ती
राज्य सरकार ने वर्ष 2028 तक दो लाख सरकारी पदों पर भर्ती का लक्ष्य तय किया है। अब तक 78 हजार से अधिक पदों पर भर्ती हो चुकी है, लेकिन आरक्षण से जुड़े विभिन्न मामलों के कारण हजारों पद अभी भी अटके हुए हैं।
2016 से रुकी है प्रमोशन प्रक्रिया
प्रदेश में अधिकारियों और कर्मचारियों की नियमित पदोन्नति वर्ष 2016 से प्रभावित है। तत्कालीन सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर किए जाने के बाद प्रमोशन प्रक्रिया ठप हो गई थी। बाद में वर्तमान सरकार ने नए नियम बनाकर प्रमोशन शुरू करने की कोशिश की, लेकिन इन नियमों को भी अदालत में चुनौती दे दी गई नतीजतन करीब एक दशक बाद भी लाखों कर्मचारी पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं।
90 दिन में फैसला सुनाने का है निर्देश
सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सामान्य परिस्थितियों में सुरक्षित रखे गए फैसले 90 दिनों के भीतर सुनाए जाने चाहिए। इसी आधार पर कर्मचारियों को उम्मीद थी कि जून के पहले सप्ताह में निर्णय आ जाएगा, लेकिन बेंच में बदलाव के कारण मामला फिर अनिश्चितता में फंस गया है।
केवल प्रभार, नहीं मिला आर्थिक लाभ
पदोन्नति नहीं होने से प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित न हो, इसके लिए सरकार ने कई अधिकारियों को उच्च पदों का प्रभार दिया है। हालांकि, प्रभार मिलने के बावजूद कर्मचारियों को पदोन्नति से मिलने वाले वेतन और अन्य वित्तीय लाभ नहीं मिल रहे हैं।
याचिकाकर्ता पक्ष ने उठाए सवाल
सामान्य और पिछड़ा वर्ग के पक्षकारों की ओर से पैरवी कर रहे डॉ. केएस तोमर ने कहा कि नई बेंच बनने के बाद कुछ औपचारिक सुनवाई हो सकती है, लेकिन अधिकांश तथ्य पहले ही रिकॉर्ड पर हैं। उन्होंने दावा किया कि फैसला आने में हुई देरी कई सवाल खड़े करती है। हालांकि सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सभी की नजर नई बेंच के गठन पर
अब सभी की नजर नई बेंच के गठन और इस बहुप्रतीक्षित फैसले पर टिकी हुई है, जिसका असर न केवल दो लाख कर्मचारियों के प्रमोशन पर बल्कि आने वाले वर्षों की सरकारी भर्ती प्रक्रिया पर भी पड़ेगा।
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