वंदे मातरम् पर सियासी घमासान: शाह बोले; कांग्रेस का सिर्फ दो अंतरे गाने का फैसला तुष्टीकरण, राष्ट्रविरोधी कदम
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, नई दिल्ली।
राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम् ’ को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी विवाद तेज हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को कांग्रेस के उस फैसले पर निशाना साधा।
इसमें पार्टी ने अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल शुरुआती दो अंतरे गाने का निर्णय लिया है। शाह ने इसे तुष्टीकरण की राजनीति और राष्ट्रविरोधी फैसला बताया।
अमित शाह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने 1937 में वंदे मातरम् को लेकर ऐसा फैसला लिया था और अब करीब नौ दशक बाद उसी निर्णय को दोहरा रही है।
उनके मुताबिक, उस समय कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए राष्ट्रगीत के हिस्सों को अलग किया था और इस फैसले ने आगे चलकर देश के विभाजन की राजनीति को मजबूती दी।
शाह बोले- 1937 के फैसले को कांग्रेस फिर लागू कर रही
अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस का केवल दो अंतरे गाने का फैसला वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि देश में अब तुष्टीकरण की राजनीति नहीं चलेगी और भाजपा कांग्रेस के इस फैसले का जनता के बीच तथा विधानसभा स्तर पर विरोध करेगी।
शाह ने दावा किया कि 1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम् को दो हिस्सों में बांटने का फैसला किया था। उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस व्यवस्था को सुधारने का काम किया है।
कांग्रेस ने किया पलटवार
शाह के बयान पर कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा रहा है और कांग्रेस के लिए यह भावनात्मक विषय है। उनके मुताबिक, भाजपा इसे राजनीतिक मुद्दा बना रही है।
कांग्रेस कार्यसमिति ने 19 अगस्त को फैसला किया था कि पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस ने अपने 1937 के रुख का हवाला देते हुए यह निर्णय लिया है।
15 अगस्त के कार्यक्रम के बाद शुरू हुआ विवाद
वंदे मातरम् को लेकर ताजा विवाद 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में हुए स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के बाद तेज हुआ।
भाजपा ने आरोप लगाया कि कार्यक्रम में पूरा वंदे मातरम् गाए जाने के दौरान कांग्रेस नेताओं की ओर से इसे रोकने का प्रयास किया गया।
भाजपा ने कार्यक्रम का वीडियो साझा करते हुए कांग्रेस नेताओं पर सवाल उठाए थे। इसके जवाब में कांग्रेस ने आरोपों को खारिज किया।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा था कि कार्यक्रम में वंदे मातरम पूरा गाया गया और इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं हुई।
कांग्रेस की ओर से यह भी कहा गया कि सोनिया गांधी का इशारा गीत रोकने के लिए नहीं था, बल्कि वह लंबे समय से खड़े कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी की व्यवस्था करने को कह रही थीं।
नितिन नबीन ने कांग्रेस को बताया ‘नई मुस्लिम लीग’
विवाद के बीच भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने कांग्रेस पर तीखा हमला किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति के लिए राष्ट्रीय गीत का अपमान किया है।
उन्होंने कांग्रेस को ‘नई मुस्लिम लीग’ तक करार दिया और कहा कि यह फैसला उन स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान है, जिन्होंने वंदे मातरम् को प्रेरणा के रूप में अपनाया था।
वंदे मातरम् को मिला कानूनी संरक्षण
वंदे मातरम् को लेकर विवाद ऐसे समय में हो रहा है, जब केंद्र सरकार ने इसे कानूनी संरक्षण देने के लिए Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act, 2026 लागू किया है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 11 अगस्त को विधेयक को मंजूरी दी थी। इसके बाद वंदे मातरम् को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान वैधानिक संरक्षण मिला है।
कानून के तहत जानबूझकर वंदे मातरम् के गायन को रोकने या उसके गायन में जुटे समूह में व्यवधान डालने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। हालांकि, कानून का यह प्रावधान केवल गीत के पूरे छह अंतरे न गाने को अपने आप में अपराध नहीं बनाता।
केंद्र ने छह अंतरों वाले आधिकारिक संस्करण को लेकर जारी किए निर्देश
गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी 2026 को वंदे मातरम् के छह अंतरों वाले संस्करण को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके बाद 9 जुलाई को राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान के गायन-बजाने से जुड़े आदेश भी जारी किए गए।
सरकारी कार्यक्रमों में यदि वंदे मातरम् और राष्ट्रगान दोनों प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले वंदे मातरम् और उसके बाद जन गण मन का प्रोटोकॉल है। सरकारी दिशा-निर्देशों में छह अंतरों वाले संस्करण की अवधि करीब 3 मिनट 10 सेकंड बताई गई है।
1875 में लिखा गया था वंदे मातरम्
‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने की थी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार इसे पहली बार 7 नवंबर 1875 को प्रकाशित किया गया था। बाद में यह उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना।
1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे सार्वजनिक रूप से गाया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी गीत बन गया।
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