पुलिस-प्रशासन पंचमी: क्या इंदौर ने पहली बार मनाई रंगपंचमी
KHULASA FIRST
संवाददाता

अब तो अति होती जा रही है, हर वार-त्योहार शहर की उत्सवी तासीर दांव पर
‘साहब बहादुरों' से कोई जवाब तलबी क्यों नहीं हो रही? कोई तो उठाए आवाज? क्या लावारिस हो गई अहिल्यानगरी?
हमारे पर्व-संस्कृति, उल्लास-उत्साह खाकी के रहमोकरम पर, क्या भाजपा पर आंख मूंदकर किए भरोसे का ये परिणाम?
सुबह 9 से शाम 4 बजे तक बिजली गुल, गली-मोहल्लों में बैरिकेडिंग, उत्सव मार्ग की खाने-पीने की दुकानें जबरिया बंद क्यों?
त्योहार मनाते इंदौर को लाठियों के दम पर घर लौटने के लिए मजबूर करने वाला ये कैसा तंत्र इंदौर में लागू हो गया?
रंगपंचमी कब, कैसे और कितनी देर मनाएं, ये पुलिस-प्रशासन तय करने वाला कौन? जनप्रतिनिधि ‘मूक-बधिर' के साथ ‘नाबीना' भी हो गए?
उत्सवप्रेमी शहर पहले दिन में, फिर रात में होता रहा पुलिसिया रुआब का शिकार, लतीयाते रहे इंदौरी, खाते रहे धक्के और सुनते रहे झिड़कियां
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
हम वो नहीं, जो साहब बहादुरों के हर फरमान पर उनके दरबार में मुजरा पेश करें। हम वो भी नहीं कि रात गई-बात गई, अब अगले बरस देखेंगे-सोचेंगे-लिखेंगे-झकझोरेंगे। हम जिंदा लोग हैं। त्योहार निपट गया। रंग में भंग नहीं करते हम। अब इंदौरहित में लगे हाथ हिसाब-किताब करेंगे। आईना दिखाएंगे।
हम जागरूक कलम हैं। हम इंदौर हैं। उस पर भी पक्के इंदौरी। खालिस इंदौरी आवाज। ये आवाज भले ही आपके लिए ‘नक्कारखाने में तूती' हो, लेकिन इस शहर के लिए शंखनाद है। अफसरी ठसक में आप मानें न मानें, लेकिन हम इंदौर की तरफ से सवाल पूछेंगे।
आपके तुगलकी फरमान नजरअंदाज करने वालों में से हम नहीं। न आपकी जी-हुजूरी करने वाले। न ‘दरबारी कलमकार'। हम पक्के इंदौरी हैं। खुलासा फर्स्ट हैं। उस पर खालिस ‘होली के रसिया' भी और ‘हुरियारे' भी।
हद हो गई अब तो। अति हो गई। क्या इंदौर ने पहली बार रंगपंचमी मनाई? क्या इंदौर लाखों की संख्या में पहली मर्तबा सड़क पर रंग खेलने उतरा? क्या परिवार के परिवार, जत्थे के जत्थे पहली पहली बार गेर देखने घर से निकले थे? क्या औसत इंदौरी पहली बार उत्सव मनाने जनता चौक, यानी राजवाड़ा पहुंचा था?
क्या इसके पहले गेर मार्ग पर सूखे-गीले रंग नहीं उड़े थे? क्या दोपहिया-चार पहिया वाहनों से फर्स्ट टाइम लोग जवाहर मार्ग, एमजी रोड पर आए थे? क्या गली-मोहल्लों से हुजूम पहली बार गुजरे थे? क्या इसके पहले रंगपंचमी पर शहर अराजकता में डूब जाता था?
क्या रंग खेलने आने वाले नर-नारी सही-सलामत घर नहीं पहुंच पाते थे? क्या पहली बार उत्सव मार्ग पर खाने-पीने की दुकानें खुली थीं? क्या उत्सव के बाद पहली बार हाथोहाथ राजवाड़ा चौक साफ-सुथरा हो रहा था? क्या गौराकुंड के मुहाने से पहली बार गेर व फागयात्रा गुजरी थीं?
ऐसे एक नहीं, अनेक प्रश्नों के जवाब अगर न में हैं तो फिर रंगपंचमी के दिन इंदौर की सड़कों, खासकर गेर मार्ग पर पुलिस प्रशासन की इतनी जोर-जबरदस्ती क्यों थी? क्यों मुख्य मार्ग तो छोड़ गली-मोहल्लों की भी बैरिकेडिंग की गई थी?
क्यों ऐसे बंदोबस्त किए कि वाहन तो दूर, पैदल चलने वाले भी उत्सव मार्ग तक पहुंच नहीं पाए? किसने बनाए थे ये नियम-कायदे, जो उत्सवी इलाके की खाने-पीने की दुकानों को जबरिया बंद करा रहे थे?
पोहे-कचोरी-जलेबी से सजी दुकानों के शटर किसके कहने से जबरदस्ती बंद कराए गए? सड़क किनारे गन्ने का रस, लस्सी, ज्यूस, छाछ आदि बेचने वालों को जबरिया भगाने की रणनीति कहां बनी थी?
किसने ये मिलकर तय किया था कि पुराने शहर में सुबह 9 से शाम 4 बजे तक बिजली बंद कर दी जाएगी? अब तक ये बिजली गुल का शिकार गेर मार्ग होता था। इस बार पूरे पश्चिमी इंदौर की बत्ती गुल किसके ऑर्डर से और क्यों हुई?
सवाल और भी हैं। किस बैठक में तय हुआ था कि इंदौर के बाशिंदों को रंगपंचमी कितनी देर तक व कैसे मनानी है? ये सामूहिक फैसला किस बैठक में तय हुआ था कि इंदौर के लोग एक जगह खड़े रहकर गेर व फागयात्रा नहीं देख सकते?
उन्हें चलते-चलते ये सब देखना होगा। राजवाड़ा पर कितनी देर तक रुकना है, ये किस मीटिंग में तय हुआ था और तय हुआ था तो इसकी जानकारी इस उत्सवप्रेमी शहर को क्यों नहीं दी गई? दोपहर 2 बजे बाद राजवाड़ा पर आवाजाही पूर्ण रूप से प्रतिबंधित हो जाएगी, ये फरमान किसका था?
कुल्फी चूसते लोग, गन्ने का रस पीते लोग, कचोरी-समोसा खाते परिवारों को भगाने का लिया गया दुस्साहसी फैसला किसके दिमाग की उपज है? कृष्णपुरा की चौड़ी सड़क की गणेश कैप मार्केट वाले हिस्से में बैरिकेडिंग कर संकरा किस रणनीति के तहत किया था?
क्या कोई वीआईपी मूवमेंट था? क्या सीएम राजवाड़ा आ रहे थे? फिर मुख्य उत्सव स्थल राजवाड़ा से सटे गणेश कैप वाले हिस्से में कर्फ्यू क्यों लगा था? इस हिस्से में परिवार सहित रंग-उल्लास जी रहे परिवारों को खाकी खड़ा भी क्यों नहीं होने दे रही थी?
क्या इन ‘साहब बहादुरों' से कोई इस मसले पर सवाल-जवाब नहीं करेगा? मालवा की शान व इंदौर की आन-बान-शान रंगपंचमी की परंपरा हर बरस ऐसे ही दांव पर लगती जाएगी? ये शहर रंगपंचमी कब, कैसे और कितनी देर मनाए, ये पुलिस प्रशासन तय करने वाला कौन?
उसका काम है त्योहार पर व्यवस्था देने का। परंपरा के निर्विघ्न संपन्न होने का बंदोबस्त करने वाले अफसर किसके कहने पर ये भी तय करने लगे कि आप तय समय से ज्यादा सड़क पर नजर नहीं आएंगे?
अब तो ड्रोन है, सीसीटीवी हैं, आरएएफ हैं, जबरदस्त अमला है, तमाम संसाधन हैं और सबसे बढ़कर ‘कमिश्नरी सिस्टम’ है। फिर इतना भय क्यों? त्योहार सोल्लासपूर्ण संपन्न कराने की जगह ‘निपटाने’ की मानसिकता क्यों? पहले तो इससे भी कम अमला व संसाधन थे।
इससे भी ज्यादा जोश व जुनून के साथ लोग सड़कों पर आते थे। जमकर धींगा-मस्ती होती थी। फिर भी निर्विघ्न व निष्कंटक रंगपंचमी मनती थी।
अगर इंदौर और इंदौरी इतने ही अराजक होते तो ये रंगपंचमी का पर्व यूनेस्को में दर्ज होने तक का सफर तय कर पाता? इंदौरियों को पता है अपनी लक्ष्मण रेखा कि उन्हें कहां तक ‘फैलना' है? ज्यादा ‘फैलने' वालों को इस शहर के बाशिंदे ही दायरे में करने का हुनर, हिम्मत व रुतबा रखते हैं। यूं ही 75-77 बरस नहीं हो गए... समझे।
सवाल तो और भी हैं, लेकिन आज का सबसे बड़ा व आखिरी सवाल- क्या ये इंदौर शहर और यहां के बाशिंदों का भाजपा पर आंख मूंदकर किए गए भरोसे का दुष्परिणाम है कि अब खाकी वर्दी व अफसरों के रहमोकरम पर हमारे पर्व, संस्कृति, उल्लास-उत्साह होंगे?
क्या शहर के जनप्रतिनिधिय ‘मूक-बधिर' के साथ-साथ ‘नाबीना' भी हो गए, जो उन्हें ये सब अफसरी अराजकता व सनक नजर नहीं आ रही? या वे इंदौर और इंदौरियों को अपना ‘जरखरीद गुलाम' समझने लग गए हैं? अगर इसका जवाब हां है तो ध्यान रखें, ये इंदौर है प्यारे...!!
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