सरकारी जमीन पर डाका: फर्जी दस्तावेजों के खेल का खुलासा; मिलीभगत से 35 एकड़ भूमि निजी हाथों में
KHULASA FIRST
संवाददाता

1958 में कृषि सहकारी संस्था को आवंटित जमीन की कथित अवैध बिक्री, पीड़ितों ने लगाए जान से मारने की धमकी के आरोप
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सरकारी जमीन के संरक्षण पर सवाल खड़े करते एक गंभीर मामले का खुलासा हुआ है, जहां 1958 में कृषि सहकारी संस्था को दी गई लगभग 35 एकड़ शासकीय भूमि को कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों और अधिकारियों की मिलीभगत से निजी हाथों में बेच दिया गया। पीड़ितों द्वारा पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग वर्ष 2016 से की जा रही है।
पीड़ित कल्याण सिंह पिता मादू सिंह निवासी असरावद बुजुर्ग और सीताराम पिता कुंवर निवासी अंबामोलिया के अनुसार वर्ष 1958 में 13 लोगों की एक कृषि सहकारी संस्था बनाई गई थी। इसके नाम पर ही खसरा नंबर दर्ज किए गए थे और किसी व्यक्तिगत सदस्य का नाम रिकॉर्ड में शामिल नहीं था। बताया गया कि उस समय संस्था अध्यक्ष अंबाराम को नियुक्त किया गया था और पूरी जमीन संस्था के माध्यम से खेती के लिए आवंटित की गई थी।
खसरा नंबर पर विवाद- विवादित जमीन के खसरा नंबर 271, 272, 263 और 363 बताए गए हैं, जिन्हें पीड़ितों के अनुसार शासकीय भूमि घोषित किया गया था और उसी आधार पर उन्हें खेती के लिए कब्जा दिया गया था। पीड़ितों का कहना है कि वर्ष 1958 से लेकर 1990-91 तक राजस्व रिकॉर्ड में भी जमीन का उल्लेख कृषि समिति के नाम से ही दर्ज रहा है।
फर्जी दस्तावेजों से बदले गए नाम- आरोप है कि संस्था के 13 सदस्यों में से 10 लोगों ने कूटरचित (फर्जी) दस्तावेजों के माध्यम से अन्य तीन सदस्यों, जिनमें कल्याण सिंह के पिता भी शामिल थे, के नाम रिकॉर्ड से हटवा दिए। इसके बाद उन्हीं 10 लोगों ने अधिकारियों के साथ कथित साठगांठ कर जमीन को निजी संपत्ति के रूप में दर्शाया और बाद में उसे बेच दिया।
खरीदार पर गंभीर आरोप- पीड़ितों ने आरोप लगाया है कि उक्त जमीन को प्रकाश उद्योग उर्फ अनूप कुमार जैन (साउथ तुकोगंज) द्वारा खरीदा गया है और उन्हें खेती करने से रोका जा रहा है और जान से मारने की धमकियां भी दी जा रही हैं।
शिकायत के बावजूद कार्रवाई अधूरी
पीड़ितों के अनुसार वर्ष 2016 में इस मामले की शिकायत की गई थी, जिसके बाद पटवारी द्वारा 21/11/2017 को प्रस्तुत रिपोर्ट में जमीन को शासकीय बताया गया था। इसके विपरीत, तत्कालीन एसडीएम द्वारा जमीन को 1925 से निजी बताया गया, जिसके आधार पर कथित रूप से आगे की खरीदी-बिक्री को वैध ठहराया गया।
दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई की मांग
पीड़ितों ने अपने दावे के समर्थन में कई दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं, जिनमें उपायुक्त सहकारिता द्वारा जारी 13 सदस्यों की सूची, राजस्व रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतिलिपि, रजिस्ट्रार ऑफिस में दर्ज आपत्ति, 10 सदस्यों द्वारा दिए गए शपथ पत्र, पटवारी रिपोर्ट (2017) शामिल हैं।
वास्तविक हकदारों को कब्जा दिलाया जाए
पीड़ितों कल्याण सिंह ने प्रशासन से मांग की है कि विवादित जमीन को पुनः शासकीय घोषित किया जाए, वास्तविक हकदारों को कब्जा दिलाया जाए, फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों और खरीदार के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जाए।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
पूरे मामले में प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं कि एक ही जमीन को अलग-अलग समय पर सरकारी और निजी कैसे घोषित किया गया। यह मामला न केवल राजस्व विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा पर भी गंभीर चिंता पैदा करता है।
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