मरीजों की सेहत से खिलवाड़: सरकारी अस्पतालों के पानी में मिले ई-कोलाई और कॉलिफॉर्म; मानव-जानवर मल के बैक्टीरिया,कई अस्पतालों के सैंपल फेल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर के सरकारी अस्पतालों में मरीजों और उनके परिजन को उपलब्ध कराए जा रहे पीने के पानी की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। 9 सरकारी अस्पतालों के पेयजल का हेल्थ ऑडिट कराने पर कई अस्पतालों के पानी में ई-कोलाई और टोटल कॉलिफॉर्म जैसे बैक्टीरिया मिले हैं। ये वही प्रकार के कीटाणु हैं, जो मलजनित प्रदूषण से जुड़े होते हैं।
मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में जांच कराई गई
पेयजल के सैंपल लेकर NABL मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में जांच कराई गई। जांच में एमवाय अस्पताल, सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल, पीसी सेठी अस्पताल और चाचा नेहरू अस्पताल के पानी में ई-कोलाई और टोटल कॉलिफॉर्म मिले।
पानी में भी टोटल कॉलिफॉर्म पाया गया
मानसिक चिकित्सालय के पानी में भी टोटल कॉलिफॉर्म पाया गया। जिला अस्पताल के पानी में अन्य रोगजनक कीटाणु मिले। वहीं एमटीएच, बाणगंगा और एमआरटीबी अस्पताल के पानी को जांच में पीने योग्य पाया गया।
क्या है ई-कोलाई और कितना गंभीर खतरा?
ई-कोलाई ऐसा बैक्टीरिया है, जो सामान्य तौर पर इंसानों और जानवरों की आंतों में पाया जाता है। पेयजल में इसकी मौजूदगी मलजनित प्रदूषण का संकेत मानी जाती है। वहीं कॉलिफॉर्म बैक्टीरिया का एक समूह है।
विशेषज्ञों के मुताबिक कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीजों, आईसीयू में भर्ती लोगों, नवजातों और ऑपरेशन के बाद इलाज करा रहे मरीजों में ऐसे दूषित पानी से संक्रमण का खतरा अधिक हो सकता है।
एमवाय और पीसी सेठी अस्पताल
दोनों अस्पतालों में पेयजल व्यवस्था की जिम्मेदारी संवेदना एनजीओ के पास है। यहां करीब 1000 लीटर क्षमता के आरओ प्लांट लगाए गए हैं। इसके बावजूद दोनों अस्पतालों के पानी के नमूनों में ई-कोलाई और टोटल कॉलिफॉर्म पाए गए।
पीसी सेठी अस्पताल में वाटर कूलर के आसपास गंदगी मिली, जबकि एमवाय अस्पताल की कैजुअल्टी में वाटर कूलर ज्यादातर बंद रहने की बात सामने आई।
मानसिक चिकित्सालय में मटके के पानी में मिला बैक्टीरिया
मानसिक चिकित्सालय में आरओ का पानी सीधे मटकों में भरकर मरीजों को दिया जा रहा है। अस्पताल का वाटर कूलर लंबे समय से खराब बताया गया है। ओपीडी में भी मरीजों के लिए मटकों में पानी रखा जाता है। जांच में मटके के पानी में टोटल कॉलिफॉर्म मिला।
चाचा नेहरू में बच्चों को मिलने वाले पानी में भी ई-कोलाई
चाचा नेहरू अस्पताल में नवजात और बच्चों का इलाज होता है। यहां लिए गए पानी के सैंपल में भी ई-कोलाई और टोटल कॉलिफॉर्म पाए गए। वाटर कूलर के आसपास सफाई की स्थिति भी संतोषजनक नहीं मिली।
सुपर स्पेशिएलिटी में आरओ बंद, कैंटीन के पानी में बैक्टीरिया
सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल में मरीजों और परिजन को सातवीं मंजिल या कैंटीन के आरओ से पानी लेना पड़ता है। सातवीं मंजिल का आरओ बंद मिला। कैंटीन से लिए गए पानी के सैंपल में ई-कोलाई और टोटल कॉलिफॉर्म पाए गए।
जिला अस्पताल में नियमित पेयजल व्यवस्था तक नहीं
नए जिला अस्पताल में मरीजों के लिए नियमित पेयजल व्यवस्था नहीं होने की बात सामने आई। ओपीडी के समय एक सामाजिक संस्था द्वारा लोटों से पानी वितरित किया जाता है। यहां लिए गए पानी के नमूने में अन्य रोगजनक कीटाणु पाए गए।
बाणगंगा और एमटीएच-एमआरटीबी का पानी मिला ठीक
बाणगंगा अस्पताल के पानी में कोई कीटाणु नहीं मिला, लेकिन यहां आरओ प्लांट अक्सर बंद रहने और वाटर कूलर के आसपास कचरा व गंदगी होने की बात सामने आई। एमटीएच और एमआरटीबी अस्पताल के पानी के नमूने भी जांच में पीने योग्य पाए गए।
अस्पताल प्रबंधन का दावा- नियमित जांच होती है
एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नोडल अधिकारी एचआईसीसी डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव ने बताया कि अस्पतालों में हॉस्पिटल इंफेक्शन कंट्रोल कमेटी (एचआईसीसी) की बैठक होती है। पेयजल के नमूनों की जांच कराई जाती है। जहां कमी सामने आती है, वहां अस्पताल अधीक्षक को सूचित करते हैं। अस्पतालों की इंफेक्शन कंट्रोल कमेटी के अध्यक्ष वहां के अधीक्षक ही होते हैं।
अब सवाल यह है कि जब अस्पतालों में पहले से पानी की गुणवत्ता की निगरानी की व्यवस्था है, तो मरीजों और उनके परिजन को उपलब्ध कराए जा रहे पानी में मलजनित प्रदूषण के संकेत देने वाले बैक्टीरिया कैसे पहुंच रहे हैं?
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