सत्ता में महिलाओं के प्रभुत्व की तैयारी से विचलित होती पार्टियां और नेता
KHULASA FIRST
संवाददाता

आलोक मेहता वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रणनीति के तहत संसदऔर विधायिकाओं में महिलाओं के प्रभुत्व यानी 33 प्रतिशत अनिवार्य भागेदारी का निर्णायक फैसला पेश कर दिया। संसद से विधान सभाओं तक सीधे न सही कुछ न कुछ बहानों तर्कों क़ानूनी दांव-पेंचों से कुछ राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता नए कानून को पारित कराने और लागू करने में अड़ंगे लगाएंगे।
संसद में मोदी सरकार यानी भाजपा गठबंधन के पास पर्याप्त गठबंधन है। अप्रैल में संसद से पारित होने के बाद भाजपा गठबंधन वाले 19 राज्यों की विधान सभाओं में भी उसके पास बहुमत है।
संवैधानिक रूप से 28 राज्यों में से पचास प्रतिशत में पारित होने पर नया कानून लागू हो सकता है। यह विश्व के लोकतांत्रिक इतिहास का नया स्वर्णिम अध्याय होगा। संविधान निर्माण के समय भी यह विचार सामने आया था कि अनुसूचित जाति जनजाति के आरक्षण की तरह विधायिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण हो।
फिर एक महिला स्वतंत्रता सेनानी ने ही इस प्रस्ताव से असहमति व्यक्त इस आधार पर की कि इसका अर्थ यह न हो कि हमने सत्ता के लिए आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया। इस तरह संविधान में प्रावधान नहीं हुआ। लगभग 70 वर्षों तक इस मुद्दे पर चर्चाएं होती रही।
लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है; यह प्रतिनिधित्व की समानता पर आधारित होता है। यदि समाज की आधी आबादी-महिलाएं-निर्णय लेने वाली संस्थाओं में पर्याप्त संख्या में उपस्थित नहीं हैं, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाता है।
आज विश्व स्तर पर संसदों में महिलाओं की भागीदारी लगभग 27% है, यानी लगभग हर चार सांसदों में केवल एक महिला। वास्तविक संख्या में देखें तो दुनिया भर में लगभग 11,500 से अधिक महिलाएं सांसद हैं, जबकि कुल सांसदों की संख्या 40,000 से अधिक है।
में लगभग 4,000 महिलाएं सांसद (11%) थी और 2025 में लगभग 11,500+ महिलाएं सांसद (27%) हो गई। तीन दशकों में संख्या लगभग तीन गुना बढ़ी, लेकिन अभी भी समानता से काफी दूर है। अमेरिका में दोनों सदनों के 535 सदस्यों में लगभगग 150 महिलाएं हैं।
ब्रिटेन के हाउस ऑफ कामन्स और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के कुल 1430 सदस्यों में 455 महिलाएं हैं। यह लगभग 35 प्रतिशत है । फ्रांस की संसद के 925 सदस्यों में 335 महिलाएं हैं। जर्मनी की संसद के 805 सदस्यों में 285 महिलाएं हैं।
दूसरी तरफ आधुनिक होने के बावजूद जापान की संसद के 713 सदस्यों में 105 महिलाएं हैं। इसी तरह भारत की संसद के दोनों सदनों में फिलहाल 788 सदस्यों में करीब 245 महिलाएं हैं।
इस तरह जापान और भारत में केवल 15 प्रतिशत महिलाएं हैं। जबकि देश में महिला मतदाता करीब 50 प्रतिशत है। कम प्रतिनिधित्व का कारण राजनीतिक दलों द्वारा कम टिकट देना , सामाजिक बाधाएं और सुरक्षा और राजनीतिक हिंसा बताया जाता रहा।
लगभग 788 सांसदों में करीब 110 महिलाएं हैं। यह संख्या न केवल वैश्विक औसत से कम है, बल्कि लोकतांत्रिक आदर्शों से भी पीछे है। महिला आरक्षण विधेयक वर्षों तक लंबित रहा। यह विधेयक पहली बार 1996 में संसद में पेश किया गया।
अंततः नए रूप में यह कानून बन पाया 2023 में। यानी यह कानून लगभग 27 वर्षों तक लंबित रहा।यह बिल कुल 6–8 बार संसद में पेश हुआ लेकिन हर बार अटक गया। 1996 में पहली बार पेश, लेकिन लोकसभा भंग होने से समाप्त हुआ।
1998 में दुबारा पेश होकर पास नहीं हुआ। 1999, 2002, 2003 में भी अटकता रहा । 2008 में राज्य सभा में पेश होकर 2010 में राज्यसभा से पास हुआ, लेकिन लोक सभा में पारित नहीं हुआ। कांग्रेस गठबंधन के सहयोगी दलों ने महिला आरक्षण में भी जातीय आधार पर एक हिस्सा रखने का दबाव बनाया।
लालू यादव मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं की पार्टियों ने इस तरह कानून में ब्रेक लगाया। खैर मोदी सरकार आने के बाद 2023 में दोनों सदनों से पास होकर कानून बना, लेकिन लागू करने की समय सीमा जनगणना से जुड़ी होने के कारण लागू नहीं हुआ। इसलिए अब नई जनगणना की प्रतीक्षा न करके 2011 की जनसंख्या के आधार पर 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का निर्णय मोदी सरकार ने ले लिया।
इसका आधार देश की ग्राम पंचायतों में महिला पंचों की सफल भूमिका रही। गुजरात महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में महिलाओं ने ग्रामीण विकास और सुधार कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1992 में संविधान संशोधन करके पंचायतों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था।
फिर 2006 में बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान कर दिया। इसके बाद 20 से अधिक राज्यों ने 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी। केंद्र सरकार अधिक सफल महिला सरपंचों को सम्मानित करने लगी है।
हाल के वर्षों के दौरान गांवों में स्वच्छता अभियान, शौचालय निर्माण, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं आदि में महिलाओं बहुत योगदान दिया है। खासकर आदिवासी इलाकों में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिले हैं।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात से केंद्र की सत्ता में आने पर लगातार महिलाओं के कल्याण, सामाजिक आर्थिक लाभ, सुविधाएं देने के अनेक कार्यक्रम लागू करते रहे और महिलाओं में उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।
यदि सही तरीके से लागू किया गया, तो लोकसभा में महिलाओं की संख्या 74 से बढ़कर 181 हो जाएगी-जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे बड़ा परिवर्तन होगा। महिला आरक्षण कानून के लागू होने के बाद संसद में हर 3 में 1 सांसद महिला होगी। नीति निर्धारण में बदलाव आएगा।
लोकतंत्र तब ही पूर्ण होगा, जब संसद में भी समाज की वास्तविक संरचना दिखे। और जब आधी आबादी को आधा प्रतिनिधित्व मिलेगा, तभी भारत सच्चे अर्थों में समावेशी लोकतंत्र कहला सकेगा। इसी तरह राज्य विधान सभाओं में औसत अनुमान के अनुसार 4,120 सदस्यों में 1360 महिलाएं हो जाएंगी।
लेकिन काँग्रेस और उसके अन्य प्रतिपक्षी दलों को सबसे बड़ी तकलीफ यही है कि महिलाओं के इस क्रांतिकारी कदम का श्रेय उन्हें मिलेगा। उनकी भारतीय जनता पार्टी को 2029 के लोक सभा और बाद में विधान सभाओं में इसका लाभ मिल सकता है। यही नहीं सामंती जातीय कट्टरपंथी विचारों वाले नेताओं को महिलाओं के वर्चस्व पर भी तकलीफ है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
यह विश्व के लोकतांत्रिक इतिहास का नया स्वर्णिम अध्याय होगा। संविधान निर्माण के समय भी यह विचार सामने आया था कि अनुसूचित जाति- जनजाति के आरक्षण की तरह विधायिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण हो।
फिर एक महिला स्वतंत्रता सेनानी ने ही इस प्रस्ताव से असहमति इस आधार पर व्यक्त की कि इसका अर्थ यह न हो कि हमने सत्ता के लिए आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया।
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