आदेश कागजों में ’खेल’ बाजार में तय: कॉपी-किताब माफिया पर प्रशासन की सख्ती; फिर भी मोनोपॉली का खेल जारी
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट ने मामले को प्रमुखता से किया था प्रकाशित
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
स्कूलों की कॉपी-किताब और यूनिफॉर्म के नाम पर चल रही खुली लूट पर जिला प्रशासन ने शिकंजा कसा है, लेकिन बड़ा सवाल यह है, जब पहले से तय है कि कौन-सा डीलर किस पब्लिशर का माल बेचेगा और वही सामान कहीं और मिलेगा ही नहीं, तो मोनोपॉली खत्म कैसे होगी? आदेश जारी हो गए, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी वैसी ही है।
कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी शिवम वर्मा ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 163 के तहत सख्त प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए हैं।
इनका मकसद निजी स्कूलों द्वारा कॉपी-किताब, यूनिफॉर्म और अन्य सामग्री की खरीद में जबरन थोपे जा रहे एकाधिकार को खत्म करना बताया गया है।
स्कूलों पर सख्ती... अब नहीं चलेगी मनमानी... प्रत्येक स्कूल को परीक्षा परिणाम से पहले ही पुस्तकों की सूची वेबसाइट पर अपलोड करनी होगी।
स्कूल परिसर में भी सूची सार्वजनिक रूप से चस्पा करना अनिवार्य है। किसी एक दुकान या विक्रेता से शिक्षण सामग्री खरीदने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा।
कम से कम 3 विक्रेताओं के नाम पहले से घोषित करना जरूरी। अभिभावकों को पहले से खरीद के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। 15 जून 2026 तक उपलब्धता के अनुसार किताबें खरीदी जा सकेंगी।
एनसीईआरटी से बाहर किताबें बैन, निजी पब्लिशर्स पर लगाम... केवल मान्यता प्राप्त बोर्ड (सीबीएसई, आईसीएसई, एमपी बोर्ड) के पाठ्यक्रम की किताबें ही लागू होंगी।
एनसीईआरटी और अधिकृत एजेंसियों की पुस्तकों के अलावा अन्य किताबें प्रतिबंधित हैं। नैतिक शिक्षा, जीके, कंप्यूटर जैसे विषयों में भी जबरन निजी किताबें नहीं थोप सकेंगे स्कूल।
पूरी किट खरीदना जरूरी नहीं... किसी भी प्रकाशक या विक्रेता को स्कूल के अंदर प्रचार-प्रसार की अनुमति नहीं। पीटीएम के दौरान भी किसी प्रकार की बिक्री या दबाव नहीं चलेगा।
विक्रेता अब पूरा सेट खरीदने की बाध्यता नहीं रख सकेंगे। जरूरत के अनुसार अलग-अलग किताबें उपलब्ध कराना होंगी। पुरानी किताबें होने पर अभिभावक केवल जरूरत अनुसार नई किताबें खरीद सकेंगे।
कॉपी-यूनिफॉर्म में भी सख्ती... कॉपी पर ग्रेड, साइज, पेज और कीमत स्पष्ट लिखना अनिवार्य। स्कूल का नाम कॉपी/किताब या कवर पर प्रिंट नहीं किया जाएगा। 2 से ज्यादा यूनिफॉर्म नहीं और कम से कम 3 साल तक बदलाव नहीं।
उल्लंघन पर प्राचार्य व डायरेक्टर होंगे जिम्मेदार...आदेश का उल्लंघन करने पर भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 223 के तहत संबंधित पर कार्रवाई की जाएगी। सिर्फ प्राचार्य ही नहीं, पूरा मैनेजमेंट बोर्ड जिम्मेदार होगा।
बड़ा सवाल- क्या सच में टूटेगी मोनोपॉली?... आदेशों की सूची लंबी और नियम सख्त हैं, पर जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। हर साल की तरह इस साल भी डीलर-पब्लिशर की सेटिंग पहले से तय है। ऐसे में अभिभावकों को राहत मिलना अभी भी दूर की कौड़ी नजर आ रहा है।
निजी स्कूलों की ‘दुकानदारी’, एमआरपी मिटाकर मनमानी वसूली का आरोप
शहर में शिक्षा के नाम पर हो रही कथित लूट के खिलाफ अब आवाज तेज होने लगी है। एक वायरल वीडियो ने निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें युवा नेता लवेश देवेंद्र सिंह यादव ने खुलकर आरोप लगाए हैं कि शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि मुनाफे का जरिया बन चुकी है।
वीडियो में यादव ने दावा किया कि कई निजी स्कूल प्रबंधन यूनिफॉर्म और किताबों पर छपी कीमत (एमआरपी) को हटाकर अभिभावकों से मनमाने दाम वसूल रहे हैं। उनका कहना है कि स्कूलों ने अभिभावकों को एक तय दुकानों से ही सामान खरीदने के लिए मजबूर कर रखा है, जिससे प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई है और कीमतें आसमान छू रही हैं।
नर्सरी की किताबें 12 हजार, ड्रेस ब्रांडेड से भी महंगी... यादव ने तीखा हमला करते हुए कहा कि आज हालात यह हैं कि नर्सरी कक्षा की किताबें 10 से 12 हजार रुपये तक बेची जा रही हैं, जबकि स्कूल यूनिफॉर्म की कीमतें अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स को भी टक्कर दे रही हैं।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ‘बुक स्टोर्स अब चाय की टपरी से बड़े आलीशान शोरूम बन गए हैं, और इसका पूरा बोझ आम माता-पिता की जेब पर पड़ रहा है।‘
कमीशनखोरी के खेल का आरोप... युवा नेता ने आरोप लगाया कि स्कूल प्रबंधन और बुक स्टोर्स के बीच कमीशनखोरी का बड़ा खेल चल रहा है। उन्होंने कहा कि अभिभावकों से वसूले जा रहे पैसे का एक हिस्सा सीधे स्कूल प्रबंधन तक पहुंच रहा है, जिससे शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
जल्द होगा नामों का खुलासा... यादव ने चेतावनी देते हुए कहा कि इस पूरे मामले में शामिल लोगों के नाम जल्द ही सार्वजनिक किए जाएंगे। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि इस मुद्दे की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
पालकों में बढ़ रहा आक्रोश... इस वीडियो के वायरल होने के बाद अभिभावकों में भी नाराजगी देखी जा रही है। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर अपनी आपबीती साझा करते हुए कहा कि हर साल किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर भारी आर्थिक बोझ झेलना पड़ता है।
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