मालवा मिल शराब दुकान शिफ्टिंग में अड़ंगा: रहवासियों की आड़ में निजी स्वार्थ का खेल
KHULASA FIRST
संवाददाता

24 करोड़ का ठेका, दुकान नहीं खुलने से ठेकेदार को रोज लाखों का नुकसान
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर के मालवा मिल क्षेत्र स्थित शराब दुकान की शिफ्टिंग को लेकर विवाद अब सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह निजी स्वार्थ, दबाव की राजनीति और आर्थिक नुकसान से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। एक तरफ प्रशासनिक स्तर पर दुकान
को नियमानुसार शिफ्ट करने की प्रक्रिया चल रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग शिफ्टिंग रुकवाने की कोशिश कर रहे हैं। इस शराब दुकान के लिए ठेकेदार ने इस साल करीब 24 करोड़ रुपए में ठेका लिया है, लेकिन शिफ्टिंग को लेकर चल रहे विवाद के चलते ठेकेदार को हर दिन लाखों रुपए का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
जानकारी के मुताबिक इस शराब दुकान को नियमानुसार न्यू देवास रोड पर शिफ्ट किए जाने की प्रक्रिया चल रही है। संबंधित विभागीय औपचारिकताएं भी पूरी की जा रही है और पुलिस-प्रशासन भी इस मामले में लगातार नजर बनाए हुए है।
लेकिन शिफ्टिंग की हर कोशिश के साथ वहां अचानक विरोध, नारेबाजी, धरना-प्रदर्शन और माहौल बिगाड़ने की कवायद शुरू हो जाती है।
सवाल यह है कि यदि दुकान शिफ्टिंग की प्रक्रिया कानूनी और प्रशासनिक रूप से की जा रही है, तो फिर इसे रोकने की इतनी आक्रामक कोशिशें क्यों हो रही हैं? सूत्रों का कहना है कि कुछ लोग खुद को रहवासी हितैषी बताकर सामने आ रहे हैं, जबकि वास्तव में उनके निजी स्वार्थ और क्षेत्रीय दबदबे की राजनीति काम कर रही है। यही वजह है कि मामला अब सामान्य आपत्ति से आगे बढ़कर संगठित विरोध का रूप ले रहा है।
रहवासियों का विरोध या स्वार्थ की साजिश?
इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि कुछ लोग इसे रहवासियों की भावना का रूप देने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अंदरूनी जानकारी रखने वालों का कहना है कि वास्तविक रहवासी जितने मुखर नहीं हैं, उससे कहीं ज्यादा कुछ बाहरी और असामाजिक तत्व इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं।
बताया जा रहा है कि दुकान शिफ्टिंग के विरोध में जो माहौल बनाया जा रहा है, उसमें कुछ स्थानीय व्यापारी और दबंग प्रवृत्ति के लोग भी सक्रिय हैं। इनका उद्देश्य सिर्फ सामाजिक हित नहीं, बल्कि निजी हितों और क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखना है।
प्रीमियम लोकेशन वाली दुकान
इस बार इंदौर में शराब ठेकों से रिकॉर्ड स्तर पर राजस्व आने की बात सामने आई है। खासतौर पर मालवा मिल क्षेत्र की यह दुकान काफी प्रीमियम लोकेशन और उच्च राजस्व क्षमता वाली मानी जा रही है। सूत्रों के अनुसार इस दुकान का ठेका इस वर्ष करीब 24 करोड़ रुपए में गया है।
इतनी बड़ी राशि का भुगतान करने के बाद भी यदि ठेकेदार अपनी दुकान संचालित नहीं कर पा रहा तो यह नीतिगत और प्रशासनिक चुनौती है। शराब ठेकेदार के करीबियों का कहना है कि हर दिन लाखों रुपए के नुकसान के चलते किराया, स्टाफ, लॉजिस्टिक, सुरक्षा, परिवहन और लाइसेंसिंग से जुड़े खर्च ही नहीं, बल्कि पूरे निवेश पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
कानून चलेगा या भीड़तंत्र?
विवाद बड़े सवाल को जन्म दे रहा है- क्या किसी भी वैध और लाइसेंस प्राप्त दुकान को सिर्फ भीड़ व दबाव के जरिये रोका जा सकता है? यदि कोई सरकार को करोड़ों रुपए देकर कानूनी व्यवसाय कर रहा है, तो उसे सुरक्षा और संचालन का अधिकार भी मिलना चाहिए।
विरोध यदि है, तो उसका समाधान प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि सड़क पर दबाव बनाकर। फिलहाल सबसे ज्यादा नुकसान उसी व्यक्ति को हो रहा है, जिसने नियमों के तहत सबसे बड़ी आर्थिक जिम्मेदारी उठाई है। ऐसे में अब निगाहें प्रशासन और पुलिस की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं कि वे इस शिफ्टिंग को कैसे और कब तक पूरा कराते हैं।
इंदौर से इस बार सबसे ज्यादा राजस्व- गौरतलब है इस बार शराब ठेकों से सबसे अधिक राजस्व लाने वाले शहरों में इंदौर प्रमुख रूप से सामने आया है। सरकार के लिए यह सेक्टर राजस्व का एक बड़ा स्रोत है। ऐसे में यदि करोड़ों रुपए का ठेका लेने वाला व्यापारी ही दुकान संचालन नहीं कर पाए, तो इसका असर सिर्फ उस पर नहीं, बल्कि राजस्व प्रणाली और बाजार व्यवस्था पर भी पड़ता है।
ठेकेदार बना सबसे बड़ा पीड़ित- इस पूरे घटनाक्रम में यदि किसी एक पक्ष को सबसे अधिक सीधा नुकसान हो रहा है, तो वह शराब ठेकेदार है। उसने सरकार को करोड़ों का राजस्व देने वाली बोली लगाई, नियमानुसार प्रक्रिया में भाग लिया, भारी निवेश किया और अब दुकान खोल ही नहीं पा रहा।
यानी सरकार को राजस्व देने वाला व्यापारी खुद आज व्यवस्था और विरोध के बीच पिस रहा है। करीबी सूत्र बताते हैं कि ठेकेदार ने दुकान लेने के साथ ही शिफ्टिंग, लोकेशन, स्टॉक, कर्मचारियों और अन्य व्यवस्थाओं में भी भारी निवेश किया है। ऐसे में हर दिन की देरी करोड़ों के बिजनेस मॉडल पर चोट है।
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