अब आने वाला है सावन माह ....: भक्ति, महाकाल की महिमा और प्रकृति का नवशृंगार
KHULASA FIRST
संवाददाता

अवंतिका के नाथ और सावन की रिमझिम: जब अवनि पर उतरते हैं भगवान शिव
नीलकंठ की अनुकंपा और कुदरत की हरी चुनरी: मन और माटी को भिगोता श्रावण
शाही सवारी की शान, शिप्रा का तट : महाकाल की नगरी में होगा सावन का स्वागत
चार सोमवार, सिद्ध योग और 12 राशियों का लेखा-जोखा: इस सावन ऐसे बरसेगी शिव कृपा
“नमः शिवाय साम्बाय सगणाय सरातये। श्रावणे पूजितायेति सर्वकामप्रदायिने॥”
अर्थात- भगवती पार्वती, अपने गणों और शक्ति के साथ विराजमान भगवान शिव को नमस्कार है। श्रावण माह में जो भी व्यक्ति विधि-विधान से शिवजी की पूजा करता है, वे उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
भारतीय संस्कृति में सावन (श्रावण) केवल एक महीना नहीं, बल्कि शिव भक्ति और प्राकृतिक सौंदर्य का महापर्व है। ग्रीष्म ऋतु की तपन के बाद जब सावन की पहली फुहारें धरती पर पड़ती हैं, तो समूची प्रकृति नवजीवन पाकर खिल उठती है। एक ओर जहां चारों ओर हरियाली का सुंदर विस्तार होता है, वहीं दूसरी ओर ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से वातावरण गुंजायमान हो उठता है।
सनातन कालखंड में श्रावण यानी सावन मास केवल पंचांग का एक पन्ना मात्र नहीं है। यह भक्ति, आत्म-संयम, साधना और प्रकृति के नवश्रृंगार का वह अनुपम पर्व है, जिसकी प्रतीक्षा हर शिवभक्त वर्षभर करता है। जेठ और आषाढ़ की भीषण तपन के बाद सावन की पहली फुहारें सूखी धरती का आलिंगन करती हैं, तो न केवल प्रकृति हरी चुनरी ओढ़ लेती है, बल्कि संपूर्ण मानव चेतना शिवमय होकर थिरकने लगती है।
वर्षा की रिमझिम बूंदों के साथ शिवालयों में गूंजता ‘हर-हर महादेव’ और ‘जय महाकाल’ का उद्घोष वातावरण में एक अद्भुत आध्यात्मिक स्पंदन भर देता है। इस वर्ष सावन का पावन महीना 30 जुलाई (गुरुवार) से आरंभ होकर 28 अगस्त (शुक्रवार) तक रहेगा। पंचांग के अनुसार यह हिंदू वर्ष का पांचवां महीना है, जो पूर्ण रूप से देवाधिदेव महादेव की साधना, कांवड़ यात्रा और उज्जैन की दिव्य परंपराओं को समर्पित है।
पौराणिक ग्रंथों और शास्त्रों में सावन की महिमा...सावन मास की आध्यात्मिक गरिमा का वर्णन किसी एक ग्रंथ तक सीमित नहीं है। शिव पुराण, स्कंद पुराण के ‘श्रावण माहात्म्य’ खंड और पद्म पुराण में इस महीने की महिमा का अत्यंत काव्यात्मक और गूढ़ उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण में स्पष्ट लिखा है- ‘न श्रावण समो मासो न देवः केशवात्परः’ अर्थात् कालचक्र में सावन के समान कोई पवित्र महीना नहीं है और न ही सृष्टि में भगवान शिव से बड़ा कोई देव।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से विषैला ‘हलाहल’ प्रकट हुआ, तो उसकी ज्वाला से संपूर्ण ब्रह्मांड को बचाने के लिए भगवान शिव ने उसे अपने कण्ठ में धारण कर लिया। विष के अत्यंत तीव्र ताप को शांत करने के लिए सभी देवताओं ने उन पर निरंतर जल की धारा अर्पित की थी। मान्यता है कि तभी से सावन के महीने में भगवान शिव पर जलाभिषेक करने की यह अविरल परंपरा चली आ रही है। इसके अतिरिक्त, इसी मास में माता पार्वती ने अपनी कठोर तपस्या और निष्ठा से भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। यही कारण है कि सावन को मनोकामना पूर्ति और अक्षय पुण्य प्राप्ति का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है।
उज्जैन के राजाधिराज महाकाल और सावन सोमवार की भव्य सवारी... सावन के महीने में मध्य प्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन का वैभव और अध्यात्म शिखर पर होता है। अवंतिकानाथ भगवान महाकालेश्वर को इस सृष्टि का राजा माना गया है। मान्यता है कि सावन के महीने में विशेषकर हर सोमवार को भगवान महाकाल अपनी प्रजा का हाल जानने और उन्हें दर्शन देने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं।
सावन सोमवार को निकलने वाली यह ‘महाकाल की सवारी’ केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भक्ति का विशाल समंदर होती है। रजत पालकी में अलग-अलग रूप में विराजमान होकर जब बाबा महाकाल मंदिर के गर्भगृह से बाहर आते हैं, तो पूरा उज्जैन ‘जय श्री महाकाल’ के जयकारों से गूंज उठता है। पुलिस बैंड की सुमधुर धुनों, सशस्त्र बल की सलामी और लाखों श्रद्धालुओं द्वारा की जाने वाली पुष्पवर्षा के बीच यह सवारी मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के रामघाट पहुंचती है। वहां जल स्नान और उत्तर पूजा के बाद राजाधिराज पुनः अपने राजप्रासाद लौटते हैं। सावन के अलग-अलग सोमवार को बाबा महाकाल के विभिन्न मुखारविंदों के दर्शन करने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अवंतिकापुरी खिंचे चले आते हैं।
चार सावन सोमवार का योग और प्रमुख पर्वों की शृंखला...
पंचांग की गणना के अनुसार इस वर्ष सावन में चार मुख्य सोमवार पड़ रहे हैं, जिन पर व्रत रखने और शिव पूजन का विशेष विधान है- प्रथम सावन सोमवार: 3 अगस्त द्वितीय सावन सोमवार: 10 अगस्त
तृतीय सावन सोमवार: 17 अगस्त (इस दिन नाग पंचमी का अद्भुत संयोग भी बन रहा है) चतुर्थ सावन सोमवार: 24 अगस्त {सनातन संस्कृति के कई बड़े त्योहारों की लड़ी भी... सावन का महीना केवल शिव पूजा तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सनातन संस्कृति के कई बड़े त्योहारों की लड़ी पिरोता है। इस मास में 11 अगस्त (मंगलवार) को सावन शिवरात्रि का महानिशीथ काल पूजन होगा।
15 अगस्त (शनिवार) को सुहागिनों का प्रिय पर्व हरियाली तीज मनाया जाएगा। 17 अगस्त को तीसरे सोमवार के ही दिन नाग पंचमी का योग बन रहा है, जो सर्प देवता और शिव आराधना का दुर्लभ संगम है। वहीं, 28 अगस्त को रक्षाबंधन और श्रावणी पूर्णिमा के साथ इस उत्सव धर्मिता का विश्राम होगा।
{शास्त्रसम्मत शिव आराधना: विधि और सहज भाव... भगवान शिव को ‘आशुतोष’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है जो अत्यंत अल्प प्रयास और निष्कपट भाव से प्रसन्न हो जाएं। सावन में उनकी पूजा किसी कठिन कर्मकांड की मोहताज नहीं है। प्रातःकाल स्नान के बाद तांबे के पात्र से शिवलिंग पर केवल जल की धारा अर्पित करने मात्र से महादेव प्रसन्न होते हैं। पूजा के दौरान ‘ऊं नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करते हुए त्रिदल यानी तीन पत्तियों वाला अखंडित बेलपत्र चढ़ाना चाहिए। बेलपत्र का चिकना भाग शिवलिंग की ओर होना चाहिए। इसके साथ ही शमीपत्र, धतूरा, भांग, मंदार और आक के पुष्प अर्पित करने से मानसिक व्याधियों का नाश होता है।
जो श्रद्धालु किसी विशेष मनोकामना, रोग-मुक्ति या गृह शांति की कामना रखते हैं, वे सावन में विद्वान आचार्यों के मार्गदर्शन में नमक-चमक पाठ ( नमक-चमक या नमकं-चमकं यजुर्वेद से लिया गया भगवान शिव की आराधना का एक अत्यंत पवित्र, प्राचीन और शक्तिशाली रुद्र पाठ है। इसे आमतौर पर ‘श्रीरुद्रम्’ या ‘रुद्राष्टाध्यायी’ के नाम से जाना जाता है) के सस्वर पाठ के साथ दूध, दही, घी, मधु और शर्करा के पंचामृत से रुद्राभिषेक संपन्न कराते हैं।
{ऋतु परिवर्तन, आयुर्वेद और खान-पान का वैज्ञानिक पक्ष... सावन केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि यह आयुर्वेद और स्वास्थ्य-विज्ञान की दृष्टि से शरीर को संतुलित करने का संधिकाल है। आषाढ़ के बाद वर्षा ऋतु के पूर्ण आगमन से शरीर में ‘पित्त’ का संचय होने लगता है और जठराग्नि यानी पाचन शक्ति मंद पड़ जाती है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने सावन में खान-पान के विशेष नियम बनाए थे।
सावन में पूर्णतः सात्विक जीवनशैली अपनाने की सलाह दी जाती है। इस दौरान लहसुन, प्याज, मांसाहार और गरिष्ठ भोजन का त्याग अनिवार्य माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार, सावन के महीने में हरी पत्तेदार सब्जियों के सेवन से बचना चाहिए, क्योंकि वर्षा के कारण उनमें सूक्ष्म जीवाणुओं और कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है। इसी तरह, इस मौसम में कच्चा दूध या बासी दुग्ध उत्पादों का सेवन भी वर्जित है, क्योंकि पशुओं के चारे में आए बदलाव से दूध में वात दोष बढ़ने की संभावना रहती है। सावन में फलाहार या हल्का सुपाच्य भोजन करना शरीर को स्वस्थ और रोगमुक्त रखता है।
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