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अब भारत परदेस में भी आतंकियों पर सीधा प्रहार करने को तैयार

KHULASA FIRST

संवाददाता

18 फ़रवरी 2026, 5:18 pm
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अब भारत परदेस में भी आतंकियों पर सीधा प्रहार करने को तैयार

आलोक मेहता वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारत के सामरिक और खुफिया इतिहास में एक दिलचस्प बदलाव पिछले एक दशक में देखा गया है। पहले जहाँ जासूसी और आतंकवाद-रोधी कार्रवाइयां केवल फाइलों और बंद कमरों तक सीमित मानी जाती थीं, वहीं अब वे साहित्य, फिल्मों और सार्वजनिक बहस का विषय बन रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में अनिरुध्य मित्रा की स्पाई-फिक्शन किताब The Delhi Directive: Once You’re Marked, There’s No Escape चर्चा में आई है।

न्यूयॉर्क की संघीय अदालत में अब भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता ने अमेरिकी नागरिक और खालिस्तान समर्थक नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की कथित साजिश से जुड़े आरोपों को स्वीकार किया। अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार उन्होंने हत्या के लिए सुपारी दी और गुप्ता ने साजिश और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे आरोपों में दोष स्वीकार किया।

सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार गुप्ता पर आरोप था कि उन्होंने एक ‘हिटमैन’ को भुगतान करने की कोशिश की, जो वास्तव में अमेरिकी एजेंसियों का अंडरकवर अधिकारी निकला। अमेरिकी अभियोजकों का दावा है कि यह योजना एक भारतीय सरकारी कर्मचारी के निर्देश पर चल रही थी - यह दावा अदालत के दस्तावेज़ों में दर्ज है।

अदालत से सजा मई 2026 में तय होगीं। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ पहली बार अदालत में आरोपी ने साजिश में अपनी भूमिका स्वीकार की है। हालांकि, किसी भी राज्य की आधिकारिक भूमिका पर अंतिम निर्णय कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों के आधार पर ही तय होगा। जबकि भारत सरकार ने अमेरिका या कनाडा में उसके द्वारा ऐसे किसी भी प्रयास के आरोप गलत बताए हैं।

इसके ठीक उलट, कनाडा में खालिस्तान समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के मामले में स्थिति अधिक दिलचस्प और पेंचीदी है। कनाडाई प्रधानमंत्री ट्रुडो ने 2023 में संसद में कहा था कि उनके पास भारतीय एजेंटों से जुड़ी जानकारियां हैं। लेकिन भारत ने आधिकारिक तौर पर इन आरोपों को बकवास बताते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया।

भारत सरकार का स्पष्ट रुख रहा। कनाडा ने कोई ठोस साक्ष्य साझा नहीं किया। भारत का कहना है कि वहां भारत विरोधी आतंकवादी तत्वों को शरण दी जा रही है। कनाडा में सत्ता बदलने और अन्तर्राष्ट्रीय स्थितियां देखकर कनाडा सरकार ने हाल के महीनों में विदेश मंत्री एस जयशंकर और सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल के साथ वार्ताओं में आतंकियों से निपटने में सहयोग का विश्वास दिलाया है।

जहां अमेरिका में अदालत की प्रक्रिया चल रही है और स्वीकारोक्ति सामने आई है, वहीं कनाडा मामले में अभी भी जांच और कूटनीतिक वार्ताएं जारी है। यहीं से फिक्शन और वास्तविकता का दिलचस्प अंतर सामने आता है। इसी पृष्ठभूमि में अनिरुध्य मित्रा की स्पाई-फिक्शन किताब The Delhi Directive: Once You’re Marked, There’s No Escape चर्चा में आई है।

हाल ही में नामी खोजी पत्रकार और फिल्म प्रोडूसर निदेशक अनिरुध्य मित्रा की किताब दिल्ली डायरेक्टिव ( The Delhi Directive ) जैसे उपन्यास एक संपूर्ण कथा देते हैं - मिशन कौन चलाता है, आदेश कहाँ से आता है, ऑपरेशन कैसे अंजाम दिया जाता है। कहानी का नायक विदेशी धरती पर एक मिशन में दिखाई देता है, जहां देशभक्ति, नैतिक दुविधा और शक्ति-राजनीति के बीच संघर्ष चलता है।

सवाल यह है - क्या यह केवल कल्पना है? या क्या यह उस नई सोच का साहित्यिक प्रतिबिंब है, जिसमें भारत अब आतंकवाद को अपनी सीमाओं से बाहर जाकर चुनौती देने की बात कर रहा है? पाठक को पूरी कहानी मिल जाती है। सरकारें सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करतीं। अदालतें वर्षों तक सुनवाई करती हैं। सच्चाई अक्सर दस्तावेज़ों और राजनयिक बयानों के बीच फंस जाती है। इसलिए जासूसी फिक्शन पाठकों को ‘पूरी तस्वीर’ की झलक देता है, जबकि असलियत में तस्वीर रिकार्ड्स में दर्ज रहती है।

दशकों के अनुभवी पत्रकार लेखक अनिरुध्य मित्रा ने पहले राजीव गांधी हत्या कांड पर सम्पूर्ण खोजपूर्ण विवरण निकाल एक किताब लिखी – 90 डेज। इस पर एक धारावाहिक द हंट भी ओटीटी पर आ गया। फिर उत्तर प्रदेश के पूर्व महा निदेशक प्रशांत कुमार के अनुभवों को दिलचस्प ढंग से इंफोर्सेर किताब के जरिये माफियाओं के एनकाउंटर्स की असली बातें लिख दीं।

इस बार रॉ के गोपनीय ऑपेरशन को उपन्यास के रूप में लिख दिया। सही मायने में यह प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह तथा जेम्स बांड कहे जाने वाले पूर्व भारतीय गुप्तचर सेवा प्रमुख और अब सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल की नई रणनीति पाकिस्तान सहित दुनिया में कहीं भी जरुरत पड़ने पर आतंकियों और उनके आकाओं को निपटाने को दर्शाता है।

यही नहीं हाल ही में विवादों में आई जनरल नरवणे की घोषित अघोषित सी किताब के ऑफिसियल सीक्रेट एक्ट के कठोर कानून के उल्लंघन करने वालों के लिए भी सबक है। सेना या रॉ के ऑपरेशंस सरकार की अनुमति के बिना लिखे , बताए नहीं जा सकते। इस अपराध के सिद्ध होने पर दस साल तक की सजा संभव है।

अब सिनेमा भी उस दुनिया को सामने ला रहा है जिसे कभी सिर्फ खुफिया हलकों में ही समझा जाता था। हाल की चर्चित फिल्म धुरंधर इसका बड़ा उदाहरण है - एक ऐसी स्पाई-थ्रिलर जिसमें पाकिस्तान में सक्रिय आतंक नेटवर्क, भारतीय खुफिया एजेंट और सीमा पार ऑपरेशन जैसी थीम खुलकर सामने आती है।

फिल्म का कथानक एक भारतीय अंडरकवर एजेंट पर आधारित है जो पाकिस्तान के आपराधिक और आतंकी नेटवर्क में घुसपैठ करता है। फिल्म बड़े पैमाने पर सफल हुई और अनिरुध्य की दिल्ली डायरेक्टिव बेस्ट सेलर की श्रेणी में आ गई। अमेज़ॉन पर ही सैंकड़ों प्रतियां बिक गई।

खुफिया एजेंसियों की दुनिया हमेशा रहस्य और अस्पष्टता से ढकी रही है। लेकिन समय-समय पर पूर्व अधिकारियों की किताबें इस दुनिया की झलक देती रही हैं। भारत में पूर्व रॉ प्रमुख विक्रम सूद और पूर्व एएस दुलत की किताबें इसी परंपरा का हिस्सा हैं - जहां अनुभव, नीति और रणनीतिक सोच का वर्णन मिलता है, न कि किसी गुप्त ऑपरेशन का सीधा खुलासा।

दूसरी ओर आज की स्पाई-फिक्शन किताबें - जैसे The Delhi Directive - ऐसी दुनिया दिखाती हैं जहां राज्य सीमाओं के बाहर भी अपने दुश्मनों तक पहुंचने की क्षमता रखता है। और यहीं से वह बड़ा सवाल उठता है जो आज वैश्विक राजनीति में सुनाई देने लगा है। क्या भारत भी अब अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दे रहा है कि आतंकवादियों को दुनिया के किसी भी हिस्से में निशाना बनाया जा सकता है?

शीत युद्ध के दौर में सी आईए,केजीबी , एमआई – 5 जैसी गुप्तचर एजेंसियों की कई कार्रवाइयां बाद में दस्तावेज़ों, संसदीय जांचों या संस्मरणों में सामने आईं। सीआईए के कई गुप्त आपरेशन समय सीमा के बाद में सार्वजानिक होने पर दस्तावेज़ों के जरिए स्वीकार किए गए।के जी बी के ऑपरेशन सोवियत संघ के पतन के बाद इतिहास का हिस्सा बने।

ब्रिटेन में संसदीय निगरानी के कारण कई ऐतिहासिक ऑपरेशन सार्वजनिक चर्चा में आए। लेकिन यह स्वीकारोक्ति हमेशा वर्षों बाद हुई -जब ऑपरेशन इतिहास बन चुका था। भारत लंबे समय तक ‘रणनीतिक संयम’ की नीति पर चलता रहा।

परंतु पिछले दशक में यह धारणा मजबूत हुई कि आतंकवाद की योजना अगर विदेश से बने, तो खतरा सीमाओं से बाहर भी माना जाएगा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह सोच नई नहीं है - अमेरिका, रूस, इज़राइल जैसे देश पहले से ऐसी नीतियों पर बहस झेलते रहे हैं।

फर्क सिर्फ इतना है कि अब भारत भी इसी वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन गया है। भारत के पूर्व खुफिया अधिकारियों ने जब भी किताबें लिखीं, वे अधिकतर संस्मरण थीं- नीति, अनुभव और सीमाओं की चर्चा करती हुई। उनमें ऑपरेशन का रोमांच कम और संस्थागत जानकारियां ज्यादा होती हैं।

विक्रम सूद और एएस दुलत जैसे अधिकारी अपने अनुभवों में संस्थागत संयम बरता। फिर भी आई एस आई प्रमुख के साथ की किताब विवाद का विषय भी बनी। आज की दुनिया में फिक्शन तेजी से आगे हैं - वह कहानी तुरंत कह देता है, जिसे इतिहास शायद दशकों बाद बताएगा।

फिक्शन कभी-कभी उस रणनीतिक संदेश को शब्द दे देता है, जो सरकारें खुलकर नहीं कहतीं। भारत की रणनीतिक भाषा बदल रही है या नहीं -इसका अंतिम उत्तर इतिहास और दस्तावेज़ ही देंगे। लेकिन इतना तय है कि आज जासूसी-कथा और वास्तविक राजनीति के बीच की दूरी पहले से बहुत कम हो गई है।

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