रत्तीभर दिक्कत मंजूर नहीं: संकटकाल में हिंदुस्तानियों का नागरिक बोध कब होगा जाग्रत; युद्धकाल में नागरिकों का कोई कर्त्तव्य नहीं, सब सरकारें ही करेंगी
KHULASA FIRST
संवाददाता

जरा-सा संकट आया नहीं कि हो गए शुरू, हाय... अब क्या होगा? अब तो ‘बड़े' हो जाओ
बातें बड़ी-बड़ी करवा लो, वक्त आने पर दम तोड़ देती है सब बहादुरी, जरा-सी परेशानी झेल नहीं सकते?
भारत में तो युद्ध है ही नहीं, अगर मुल्क युद्धग्रस्त हो गया तो यहां के नागरिक क्या हाल करेंगे देश का?
एकाएक सबके घरों में गैस टंकी हो गई खत्म..! लगा दी लंबी लाइन, शुरू हो गए सरकार को कोसने, वाह रे भारतीयों...!
‘आदिमयुग' की आदतों से अब तो बाज आ जाओ रे देशवासियो, थोड़ा तो धैर्य रखो
संकटकाल में तो देश की हुकूमत व हुक्मरानों पर भरोसा करो, सड़क से संसद तक मचा दिया कोहराम
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कुछ तो सीखो हिंदुस्तानियो, एक देश के नाते देशवासियों का क्या कर्त्तव्य होता है? वह भी संकटकाल में? कुछ नहीं तो मध्य-पूर्व के उन देशों से ही सीख लो, जहां बम, बंदूक, बारूद, तोप-गोले, मिसाइलें बरस रही हैं। खाए-पीए-अघाए अरब देशों से नहीं, मिडिल-ईस्ट के उन देशों से सीखिए, जो पहले से ही अभावों में जी रहे हैं।
युद्ध की विभीषिका के बीच भी वहां के नागरिकों का हौसला-हिम्मत-जज्बा देखने लायक है। सामने बाहुबली अमेरिका व इजराइल जैसे देश हैं। तमाम आधुनिक अस्त्र-शस्त्र से लैस ये बाहुबली मनमानी पर आमादा हैं, लेकिन मजाल है, इन छोटे-छोटे मुल्कों और वहां के बाशिंदों की हिम्मत तोड़ पाए।
तमाम प्रतिकूलता के बावजूद वहां जंग के बीच जिंदगी हार नहीं मान रही है। वहां रमजान भी चल रहा है। रोजे भी हो रहे हैं। सेहरी-इफ्तारी के साथ इबादत भी हो रही है। नागरिकों की ये जिजीविषा ही एक मुल्क की सबसे बड़ी ताकत होती है और ये ही ताकत निरंकुश ताकतों को अंततोगत्वा परास्त करती है। ...और हम हिंदुस्तानी क्या कर रहे हैं?
ह म हिंदुस्तानी रसोई गैस की टंकी लेकर लाइन में लगे हैं। पेट्रोल की टंकी फुल करवा रहे हैं। सिलेंडर की कालाबाजारी कर रहे हैं। गैस भट्ठी व इंडक्शन चूल्हे के दाम मनमर्जी से अनाप-शनाप बढ़ा रहे हैं। एक की जगह चार-छह सिलेंडर का स्टॉक कर रहे हैं। सरकारों को कोस रहे हैं। सड़क पर चूल्हे जला रहे हैं।
संसद ठप कर रहे हैं। संसद के द्वार पर गैस की टंकी लेकर बैठ रहे हैं। सुबह से शाम तक गैस एजेंसियों के सामने लगी कतारें दिखा रहे हैं। मुल्क में एक तरह की घबराहट पैदा कर रहे हैं। वह भी बिना युद्ध के। क्या ऐसा होता है एआई के दौर का कोई मुल्क, उसके बाशिंदे और वहां की राजनीति?
हम हिंदुस्तानी क्या उस नागरिक-बोध का पालन कर रहे हैं, जो संकटकाल में देश के हर नागरिक का कर्त्तव्य होना चाहिए। हम अपने अधिकारों के लिए तो सड़कों पर आ गए, लेकिन कर्त्तव्यों का कुछ भी भान क्यों नहीं? अधिकार के आप अधिकारी हैं तो कुछ कर्त्तव्य भी आपके हैं इस देश के प्रति।
युद्धग्रस्त दुनियावी माहौल में भी हम अपने कर्त्तव्यों का पालन न करेंगे तो कब करेंगे? आखिर हम कब ‘बड़े' होंगे? बातें तो हम सब बड़ी-बड़ी करते हैं कि भारत को ये कर देना चाहिए, वो कर लेना चाहिए, लेकिन जरा-सी दिक्कत आई नहीं कि हो गए शुरू- हाय, मेरा क्या होगा? मेरे परिवार का क्या होगा? मेरे काम-धंधे, मुनाफे का क्या होगा?
क्या देश के नागरिक का संकटकाल में भी चिंतन-मंथन सिर्फ स्वयं की सुख-सुविधा व ‘लक्जरी' के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहेगा? जबकि अभी युद्ध तो हमारे मुल्क में है ही नहीं? हम तो अभी रंगों वाली होली मना रहे थे और सड़कों पर क्रिकेटिया जीत का जश्न। अब गणगौर मनाएंगे और फिर चैत्र नवरात्र।
बावजूद इसके एकदम-से देश में ऐसा हल्ला मच गया, मानों मध्य-पूर्व देश का युद्ध हिंदुस्तान के मुहाने पर आ गया हो। अगर सच में भारत किसी बड़े व लंबे युद्ध में उतर या फंस गया तो फिर क्या हाल होगा हमारे देश का? सोचकर ही दुःख होता है, बेहद शर्म भी आती है।
ऐसे भयभीत समाज के साथ कोई भी राष्ट्र जगतगुरु नहीं बनता। उसके लिए जीवटता वाला नागरिक समाज जरूरी होता है। सिर्फ सोशल मीडिया पर या भाषणों में गाल बजाने से कोई देश दुनिया का सिरमौर राष्ट्र नहीं बनता। ये तो सर्वविदित था कि खाड़ी देश में युद्ध छिड़ा है तो देर-सवेर एलपीजी व पेट्रोल-डीजल का संकट गहराएगा।
पूर्व में भी जब-जब मिडिल-ईस्ट के देशों में जंग छिड़ी, असर हमारी रसोई व पेट्रोल पंप पर आया ही है। अब नए दौर का नया भारत है न? तो फिर रंग-ढंग वही पुरातन क्यों? वही ‘आदिमयुग' की सोच क्यों कि बस मैं और मेरा घर सुरक्षित, शेष जाएं चूल्हे में?
मैं झट-से टंकी भरवा लूं। एक भरी है तो दूसरी-तीसरी भी भरवाकर रख लूं, क्या पता बाद में मिले न मिले? दोपहिया-चार पहिया की टंकी भी फुल करवा लूं। ये सब सिर्फ इस अंदेशे में कि कल मिले न मिले?
जब कल का ही जीवन तय नहीं तो फिर इतनी हायतौबा, हल्ला-होहल्ला क्यों? एक-दो सिलेंडर भर जाने से, पेट्रोल टंकी फुल हो जाने से शेष जीवन कट जाएगा?
फिर जरूरत ही नहीं पड़ेगी गैस या पेट्रोल-डीजल की? ऐसा नहीं न? तो फिर क्यों मुल्क में घबराहट-पैनिक पैदा करना। कुछ भरोसा देश पर नहीं तो अपने ईष्ट पर भी तो किया जा सकता है न कि ईश्वर सब जल्द ठीक कर देंगे..! है कि नहीं?
धिक्कार है आपदा में दाम बढ़ाने वालों पर.. दुःख है राजनीति करने वालों पर
धिक्कार है उस बाजार पर, जो आपदा में मुनाफे व कालाबाजारी का अवसर तलाश रहा है। थू है उस कारोबारी पर, जो ऐसे संकट के समय में कचोरी-समोसा-पोहे का दाम बढ़ा रहा है, जो इंडक्शन चूल्हे व गैस भट्ठी के दाम बढ़ा रहा है, जो एजेंसी गोदाम भरा होने के बाद भी गैस सिलेंडर का कृत्रिम अभाव पैदा कर रही है।
धिक्कार तो उन्हें भी है, जो एक-दो नहीं, पांच-दस सिलेंडरों का स्टॉक कर बैठे हैं या उसकी जुगत में जुटे हैं। लानत तो उन्हें भी, जो सड़क से लेकर संसद तक एकदम से हल्ला मचाने लग गए हैं। गैस संकट का हवाला देकर पूर्ववर्ती आंदोलन का उदाहरण दे धरने-प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे तत्व, संगठन, दल व नेताओं को सोचना चाहिए कि ये युद्धकाल है।
भले ही मुल्क इसमें शामिल नहीं, लेकिन युद्ध के प्रभाव से अछूता भी नहीं। सामान्य हालातों में गैस संकट या दाम बढ़ने के मामले को वर्तमान के युद्ध संकट से जोड़कर जो राजनीति शुरू करना भी दुःखद है। ये वक्त सड़क पर चूल्हा जलाने व संसद के द्वार पर गैस की टंकी लेकर बैठ जाने का नहीं, मोदी सरकार से हिसाब-किताब करने के अभी अनेक अवसर आएंगे।
संसद से सड़क तक कोहराम मचाकर आपदा में तो अवसर न तलाशें। एक मुल्क के नाते, एक नागरिक के नाते, एक लोकतांत्रिक देश के नाते...!
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