सांसों की परीक्षा लेती ऊंचाई पर ‘भस्म विसर्जन’ अमरनाथ मार्ग के जोजीपाल की अनकही कथा
KHULASA FIRST
संवाददाता

विभूति-त्याग की पावन शिलाएं: अमरनाथ मार्ग का ‘जोजीपाल’, जहां शिव ने त्यागा था भौतिक आवरण, पिस्सू टॉप के बाद सांसों का विश्राम: जोजीपाल की बर्फीली चट्टानों में छिपा अमरनाथ यात्रा का गूढ़ रहस्य, अमरनाथ यात्रा का वो अनजाना पड़ाव: ‘जोजीपाल’, जहां सुस्ताते पैरों को मिलता है शिव-भस्म का बल
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
पिस्सू टॉप की प्राणघातक और सीधी चढ़ाई को पार करने के बाद जब श्रद्धालुओं की सांसें फूल रही होती हैं और पैर जवाब देने लगते हैं, तब पथरीली पहाड़ियों के बीच अचानक एक समतल, शांत और बर्फीली हवाओं वाला मैदान दिखाई देता है।
अमरनाथ यात्रा के पारंपरिक पहलगाम मार्ग पर स्थित इस स्थान को ‘जोजीपाल’ कहा जाता है। शेषनाग झील से ठीक पहले पड़ने वाले इस पड़ाव पर यात्री अक्सर केवल सुस्ताने, पानी पीने या खच्चर चालकों को आराम देने के लिए रुकते हैं।
चारों ओर बिखरी विशालकाय चट्टानों और दूर तक फैली बर्फ की चादर के बीच बसे इस पड़ाव को अधिकांश श्रद्धालु केवल एक ‘रेस्टिंग पॉइंट’ समझकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन अमरनाथ यात्रा के आध्यात्मिक और पौराणिक दर्शन में जोजीपाल का महत्व किसी मुख्य तीर्थ से कम नहीं है।
कश्मीरी भाषा में ‘पाल’ का अर्थ और भस्म-त्याग का दर्शन... कश्मीरी भाषा में ‘पाल’ शब्द का अर्थ ‘विशाल पत्थर या शिला’ होता है। कश्मीरी शैव परंपरा और ‘अमरनाथ महात्म्य’ के प्राचीन वृत्तांतों के अनुसार, अमरनाथ गुफा की ओर बढ़ते हुए भगवान शिव का प्रत्येक पड़ाव ‘पूर्ण विरक्ति’ का संदेश देता है।
जब महादेव पिस्सू टॉप की चढ़ाई पार कर इस स्थान पर पहुंचे, तो उन्होंने माता पार्वती को अमरकथा सुनाने से पूर्व अपने भौतिक और सांसारिक आवरणों को और अधिक सीमित करने का निर्णय लिया।
मान्यता है कि शिव जी ने अपनी जटाओं और शरीर पर रमी हुई भस्म (विभूति) को इसी स्थान की विशाल चट्टानों (पाल) पर झाड़कर/त्यागकर स्वयं को पूरी तरह से विसर्जित कर दिया था।
भस्म त्याग का यह कृत्य इस बात का प्रतीक था कि अमरत्व और ज्ञान की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को अपने बाहरी आवरणों, अहंकार और अतीत की सभी स्मृतियों को पूरी तरह छोड़ना पड़ता है।
दुर्गम भूगोल और प्रकृति का एकांत... समुद्र तल से लगभग 11,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित जोजीपाल का भूगोल बेहद कठोर और विस्मयकारी है।
यहाँ बड़े-बड़े प्राकृतिक पत्थर बिखरे पड़े हैं, जिन पर बैठकर यात्री अपनी थक चुकी काया में नई ऊर्जा भरते हैं। यहां का वातावरण इतना शांत है कि केवल पहाड़ों से टकराती बर्फीली हवाओं की सरसराहट ही सुनाई देती है।
प्राचीन काल में, जब अमरनाथ यात्रा केवल पैदल या साधुओं के जत्थों के साथ होती थी, तब यात्री जोजीपाल की इन पवित्र शिलाओं पर माथा टेककर और यहाँ की माटी का तिलक लगाकर आगे बढ़ते थे।
माना जाता था कि यहां की माटी में शिव के विभूति-त्याग का अंश समाहित है, जो पथिक को आगे आने वाले कठिन मार्ग विशेषकर शेषनाग और महागुणास टॉप को पार करने का आत्मबल देता है।
पड़ाव के शोर में गुम होती साधना... आज के समय में जब यात्रा का स्वरूप तीव्र और समयबद्ध हो गया है, श्रद्धालु जोजीपाल में केवल अपनी जैकेट के जिप ठीक करते हैं, ऑक्सीजन का स्तर जांचते हैं या तस्वीरें खींचकर आगे निकल जाते हैं।
आपाधापी के इस दौर में उस आध्यात्मिक दर्शन की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता जो यह सिखाता है कि अमरनाथ की गुफा तक केवल शरीर नहीं, बल्कि पवित्र और निष्पाप मन लेकर जाना होता है।
जोजीपाल की यह बर्फीली घाटी आज भी चुपचाप बहती हवाओं के साथ श्रद्धालुओं से यही पुकार करती है कि जिस प्रकार शिव ने यहां अपनी भस्म का त्याग किया था, उसी प्रकार यात्री भी अपनी थकान, भय और अहंकार को इन शिलाओं पर छोड़कर ही आगे शेषनाग की पावन झील की ओर कदम बढ़ाएं।
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