नामांतरण घोटाला: एफआईआर से दूरी; क्या किसी बड़े सच को छिपाने की मजबूरी
KHULASA FIRST
संवाददाता

अभिषेक मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम का नामांतरण घोटाला अब केवल फर्जी नामांतरण का मामला नहीं रह गया है। इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि जब नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारी स्वयं इसे एफआईआर योग्य कृत्य मान रहे हैं, तब अब तक पुलिस में अपराध दर्ज क्यों नहीं कराया गया?
किसी नागरिक की संपत्ति उसकी जानकारी के बिना दूसरे के नाम चढ़ जाना, सरकारी रिकॉर्ड में छेड़छाड़ होना, अधिकृत लॉगिन आईडी का दुरुपयोग होना और नियमों को ताक पर रखकर नामांतरण होना...यदि यह सब आपराधिक कृत्य नहीं हैं तो फिर अपराध किसे कहा जाएगा?
सबसे अहम सवाल यह भी है कि क्या एक साथ इतनी बड़ी संख्या में नामांतरण कोई छोटा कर्मचारी अपने दम पर कर सकता है? क्या बिना किसी वरिष्ठ स्तर के संरक्षण, मिलीभगत या प्रशासनिक वरदहस्त के ऐसा संगठित खेल संभव है? यदि नहीं, तो फिर जांच की दिशा ऊपर तक क्यों नहीं जाती दिखाई दे रही? इससे भी अधिक गंभीर तथ्य यह है कि जिन संपत्तियों का नामांतरण हुआ, उनमें से कई की आगे रजिस्ट्री तक हो गई।
यदि फर्जी नामांतरण के आधार पर संपत्तियों का हस्तांतरण आगे बढ़ गया तो क्या यह केवल विभागीय गलती थी या एक सुनियोजित षड्यंत्र? और यदि यह इतना गंभीर मामला है, तो फिर अब तक एफआईआर क्यों नहीं?
नगर निगम नोटिस भेज रहा है, जवाब ले रहा है और सुनवाई की तैयारी कर रहा है। यह प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन आपराधिक जांच का विकल्प नहीं। यदि किसी बैंक के सर्वर से करोड़ों की धोखाधड़ी हो जाए तो पहले एफआईआर दर्ज होती है, बाद में जांच। यहां उल्टा क्यों हो रहा है? क्या पुलिस जांच उन परतों तक पहुंच सकती है, जहां विभागीय जांच नहीं पहुंचना चाहती?
क्या डिजिटल रिकॉर्ड ऐसे नाम उजागर कर सकते हैं, जिनसे बचना जरूरी समझा जा रहा है? या फिर निगम को यह भय है कि एफआईआर के बाद जांच केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि निर्णय लेने वाली पूरी शृंखला सवालों के घेरे में आ जाएगी?
अपराध के स्पष्ट संकेत होने के बाद भी यदि कानून का पहला कदम नहीं उठाया जाता तो संदेह स्वाभाविक है, इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल नामांतरण घोटाले के साथ एफआईआर का अभाव भी है और जब तक इसका जवाब नहीं मिलता, तब तक यह प्रश्न भी जीवित रहेगा कि क्या इस घोटाले की जड़ें इतनी गहरी हैं कि पुलिस जांच से कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं?
यदि नहीं, तो फिर देरी किस बात की? और यदि हां... तो यह घोटाला निगम व्यवस्था की विश्वसनीयता पर खड़ा सबसे बड़ा अभियोग बन चुका है।
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