आस्था के कठिन पथ पर पौराणिक रहस्य
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
पिस्सू टॉप: देवताओं की विजय और राक्षसों के संहार की वह भूमि, जहां आज भी दिखते हैं ‘महायुद्ध’ के निशान, पहाड़ों के सीने पर दर्ज देवासुर संग्राम की कहानी: जहां पीस दिए गए थे आसुरी हौसले और कहलाया ‘पिस्सू टॉप’, चट्टानों की अनूठी बनावट और संकरे रास्तों का रहस्य: आखिर क्यों आम पहाड़ियों से बिल्कुल जुदा है पिस्सू टॉप का भूगोल?, सांस फुला देने वाली अमरनाथ यात्रा की पहली अग्निपरीक्षा; जहां कदम-कदम पर मानसिक दृढ़ता की कसौटी है पिस्सू टॉप, डगर बाबा बर्फानी की: केवल एक कठिन ट्रैक नहीं, देवताओं की विजय और दानवों के संहार का जीवंत प्रतीक है यह शिखर
कैसे पड़ा ‘पिस्सू टॉप’ नाम?... स्थानीय मान्यता है कि उस युद्ध में राक्षसों के विशालकाय शरीर इस कदर क्षत-विक्षत हुए और ‘पिस’ गए कि उस मलबे और अस्थियों के ढेर ने एक ऊंचे पहाड़ का रूप ले लिया। राक्षसों के शरीरों के पिस जाने के कारण ही इस दुर्गम और तीखे शिखर का नाम कालान्तर में ‘पिस्सू टॉप’ पड़ गया।
अ मरनाथ यात्रा मार्ग पर चंदनवाड़ी का सुरम्य मैदान छोड़ते ही श्रद्धालुओं का सामना प्रकृति की सबसे कठोर और अग्निपरीक्षा जैसी चढ़ाई से होता है। समुद्र तल से करीब 11,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस स्थान को पूरी दुनिया ‘पिस्सू टॉप’ के नाम से जानती है।
सांस फुला देने वाली यह खड़ी चढ़ाई न केवल यात्रियों के शारीरिक स्टेमिना की परीक्षा लेती है, बल्कि इसका हर एक मोड़ सनातन इतिहास के एक ऐसे भयंकर देवासुर संग्राम की गवाही देता है, जिसने इस पूरे पहाड़ का भूगोल ही बदल दिया था।
जब महादेव के दर्शन के लिए आपस में भिड़ गए देव और दानव...शिव पुराण और स्थानीय श्रुतियों के अनुसार, यह बात उस कालखंड की है जब भगवान शिव माता पार्वती को अमरत्व का ज्ञान देने के लिए गुफा की ओर प्रस्थान कर चुके थे।
महादेव के इस पावन और दुर्लभ स्वरूप के दर्शन के लिए देवताओं और राक्षसों (दानवों) के बीच एक होड़ मच गई। दोनों ही दल जल्द से जल्द पहाड़ों को पार कर शिव के सम्मुख पहुंचना चाहते थे।
राक्षसों की हठ और मार्ग अवरुद्ध करना... जैसे ही दोनों दल चंदनवाड़ी से थोड़ा आगे बढ़े, राक्षसों ने छल और अपनी आसुरी शक्ति का प्रयोग कर देवताओं का रास्ता पूरी तरह रोक दिया।
राक्षस नहीं चाहते थे कि देवता महादेव तक पहले पहुंचें। इसके परिणामस्वरूप इस ऊंचे शिखर पर देवताओं और दानवों के बीच एक अत्यंत विनाशकारी और भयंकर युद्ध छिड़ गया।
महासंहार से बना पहाड़...युद्ध कई दिनों तक चला। अंततः देवताओं ने महादेव का स्मरण किया और भगवान शिव की कृपा व सहायता से राक्षसों पर अंतिम प्रहार किया। इस महायुद्ध में दानवों की सेना पूरी तरह गाजर-मूली की तरह काट दी गई। देवताओं ने राक्षसों का पूरी तरह संहार कर उनके मृत शरीरों को एक ही स्थान पर संचित कर दिया, जिससे लाशों का एक विशाल ढेर लग गया।
कटी-फटी चट्टानें और युद्ध के निशान... इस स्थान का भूगोल और भूगर्भीय संरचना आज भी कौतूहल का विषय है। पिस्सू टॉप पर पहुंचने पर पता चलता है कि यहां की मिट्टी और पत्थरों की बनावट आम कश्मीरी पहाड़ियों से बिल्कुल अलग है। यहां की चट्टानें अत्यधिक नुकीली, कटी-फटी और गहरे मटमैले रंग की हैं।
लोक मान्यता...अमरनाथ जाने वाले पुराने साधु-संत और स्थानीय गाइड बताते हैं कि इन पत्थरों की यह कटी-फटी और बिखरी हुई स्थिति उसी पौराणिक देवासुर संग्राम के दौरान चले अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार का परिणाम है। ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी ने पूरी पहाड़ी को अंदर से मथ दिया हो।
यात्रियों का मनोवैज्ञानिक नॉकआउट... अमरनाथ यात्रा का यह सबसे पहला और मुख्य खड़ी चढ़ाई वाला हिस्सा है। यहां का रास्ता इतना संकरा और तीखा है कि घोड़े और पालकी वालों को भी फूंक-फूंक कर कदम रखने पड़ते हैं, लेकिन जैसे ही श्रद्धालु इस शिखर पर पहुंचते हैं, वहां से नीचे चंदनवाड़ी और लिद्दर नदी का जो विहंगम दृश्य दिखता है, वह अद्भुत है।
यहां आकर यात्री मानते हैं कि जिस तरह देवताओं ने बाधाओं को पीसकर विजय पाई थी, उसी तरह उन्होंने भी यात्रा की पहली बड़ी बाधा को पार कर लिया है।
पिस्सू टॉप केवल एक भौगोलिक चुनौती या ट्रैकिंग का हिस्सा नहीं है। यह स्थान याद दिलाता है कि अध्यात्म और सत्य की राह में हमेशा आसुरी शक्तियां रास्ता रोकने का प्रयास करेंगी, लेकिन अडिग विश्वास और महादेव की कृपा से उन बाधाओं को ‘पीसकर’ आगे बढ़ा जा सकता है। जब श्रद्धालु इस तीखी चढ़ाई पर हांफते हुए बाबा का जयकारा लगाते हैं, तो वे अनजाने में ही सही, उसी दैवीय विजय का उत्सव मना रहे होते हैं।
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