मोहन की लीला न्यारी: जन्माष्टमी और सियासी हांडी; भागीरथपुरा से विदिशा, दतिया, ग्वालियर, चंबल, बुंदेलखंड तक फोड़ी सियासी हांडी
KHULASA FIRST
संवाददाता

सियासी हांडी फोड़ चटखारे
कहीं हांडी फूटी, कहीं रस्सी टूटी, कहीं गोविंदाओं की टोली ही थक गई
दिल्ली से बढ़ती रही हांडी की ऊंचाई!
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नाम भी ऐसा कि संयोग को संयोग मानना मुश्किल हो जाए। मुख्यमंत्री मोहन यादव...नाम में ही मोहन और मोहन यानी कान्हा। लिहाजा सियासी गलियारों में तंज कसने वालों ने भी अपनी कल्पनाओं को पंख दे दिए- कृष्ण की लीलाएं तो पुराणों में पढ़ी थीं, अब मध्य प्रदेश की राजनीति में मोहन की लीला देखिए।
कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि प्रदेश में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अगली हांडी कहां फूटेगी, बल्कि सवाल यह है कि हांडी फोड़ने के लिए बनी गोविंदाओं की टोली किसकी है और हांडी आखिर किसके सिर पर लटकी है?
इंदौर की हांडी और शिकायतों का खट्टा-मीठा मिश्रण। राजनीतिक चटखारों में इंदौर का जिक्र आते ही दही-हांडी का अपना अलग अध्याय खुल जाता है। यहां की सियासी हांडी में दही से ज्यादा शिकायतें, आरोप-प्रत्यारोप, नाराजगी, संगठनात्मक खींचतान और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का मिश्रण बताया जाता है। '
हांडी जितनी ऊपर जाती है, नीचे खड़े लोग उतने ही उत्साहित होते हैं। कोई पहला पायदान बनने को तैयार है, कोई दूसरा, कोई तीसरा। लेकिन जैसे ही गोविंदा ऊपर चढ़ते हैं, नीचे से आवाज आती है-"संभलकर! हांडी बहुत ऊंची है।’ और फिर कभी हांडी फूटती है, कभी पिरामिड गिरता है और कभी पूरी टोली को अगले जन्माष्टमी तक इंतजार करना पड़ता है। इसीलिए इंदौर की राजनीतिक महफिलों में इन दिनों चुटकी ली जा रही है कि हांडी तो भागीरथपुरा में फूट गई, लेकिन उसकी छाछ अभी तक पूरे राजनीतिक शहर में घूम रहा है।
विदिशा की हांडी सबसे रहस्यमयी!...अब नजर विदिशा की ओर है। राजनीतिक गलियारों की चर्चाओं में वहां की हांडी को लेकर तरह-तरह की उपमाएं दी जा रही हैं। कोई इसे सामान्य मटकी बताता है तो कोई विशालकाय हांडी। कहा जा रहा है कि विदिशा की हांडी का आकार मौसम के साथ नहीं, राजनीतिक तापमान के साथ बदलता है। कभी छोटी दिखाई देती है, कभी अचानक इतनी बड़ी हो जाती है कि गोविंदा टोली को दो-तीन मंजिल और बढ़ानी पड़ जाए।
व्यंग्यकार कहते हैं कि इस हांडी में नीचे से दही, ऊपर से मिश्री और बीच-बीच में राजनीतिक मसाला पड़ता रहता है। कभी यह मसाला चिट्ठी बनकर आता है, कभी शिकायत के रूप में, कभी किसी संगठन की आवाज बनकर और कभी राजनीतिक चर्चाओं के रूप में। अब यह मसाला कहां से आता है। कोई दिल्ली की ओर देखता है, कोई भोपाल की ओर और कोई दूर खड़े होकर सिर्फ मुस्कुराता है।
दतिया में फूटी हांडी का असर...दतिया की राजनीतिक हांडी भी इन चर्चाओं में पीछे नहीं है। यहां भी मोहन सरकार को लेकर समय-समय पर उठती राजनीतिक चर्चाओं को दही-हांडी के खेल से जोड़कर देखा जा रहा है। उपचुनाव के बाद यहां मोहन की घेराबंदी करने के लिए गोविंदा टोली बनी, ढोल बजे, नारे लगे, पिरामिड खड़ा हुआ, हांडी ऊपर पहुंची।
नीचे से आवाज आई-"बस अबकी बार फूटेगी!’ लेकिन राजनीति में सबसे मजेदार बात यही है कि हांडी फूटने से पहले ही कई बार खेल का पूरा समीकरण बदल जाता है। ऊपर चढ़ने वाला हांडी नीचे ले जाता है, नीचे खड़ा अचानक ऊपर पहुंच जाता है और जिसे लोग सबसे मजबूत पायदान समझ रहे थे, वही कभी-कभी पूरी संरचना को हिला देता है। दतिया की हांडी को लेकर भी राजनीतिक चुटकुले इसी अंदाज में सुनाए जा रहे हैं।
ग्वालियर-चंबल की हांडी की कहानी...ग्वालियर-चंबल की राजनीति में हांडी फोड़ना आसान खेल नहीं। यहां गोविंदा बनने वालों को पहले यह देखना पड़ता है कि नीचे खड़े लोग साथ हैं भी या नहीं। कहा जा रहा है कि यहां कई बार हांडी ऊपर जाने से पहले ही नीचे आ जाती है।
कभी रस्सी ढीली पड़ती है, कभी पिरामिड का संतुलन बिगड़ता है और कभी गोविंदा टोली के सदस्य ही आपस में यह तय करने लगते हैं कि ऊपर कौन जाएगा। नतीजा यह कि दर्शक तालियां बजाते रह जाते हैं और हांडी अपनी जगह सुरक्षित लटकी रहती है। राजनीतिक पंडितों का व्यंग्य है-ग्वालियर-चंबल में हांडी फोड़ने से ज्यादा मुश्किल हांडी तक पहुंचने की रणनीति बनाना है।
टीकमगढ़ में भी फूट चुकी है हांडी...बुंदेलखंड की राजनीति भी इस सियासी दही-हांडी प्रतियोगिता में पीछे नहीं है। टीकमगढ़ की राजनीतिक हलचल को लेकर भी अलग-अलग चर्चाएं चलती रही हैं। यहां गोविंदा टोली बनती है, पिरामिड बनता है, ढोल बजता है और फिर राजनीतिक मौसम देखकर ऊंचाई तय होती है।
मगर मोहन की हांडी की खासियत यह बताई जा रही है कि जैसे ही कोई टोली उसकी ऊंचाई नापने लगती है, रस्सी थोड़ी और ऊपर खिंच जाती है। गोविंदा ऊपर देखते हैं, हांडी ऊपर, फिर थोड़ा और ऊपर, गोविंदा फिर ऊपर देखते हैं, हांडी फिर ऊपर! आखिर में टोली नीचे बैठकर कहती है- अगली बार पक्का फोड़ेंगे।
मोहन की सबसे बड़ी ताकत-हांडी की ऊंचाई!...राजनीतिक व्यंग्य की असली पंचलाइन यही है। कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के खिलाफ राजनीतिक दबाव या घेराबंदी की जितनी चर्चाएं तेज होती हैं, हांडी उतनी ही ऊंची होती जाती है। जो लोग समझते हैं कि अब बस हाथ पहुंचने ही वाला है, उन्हें अचानक पता चलता है कि हांडी तो एक मंजिल और ऊपर चली गई। राजनीतिक भाषा में इसे समर्थन कहिए, संगठनात्मक संतुलन कहिए, हाईकमान का भरोसा कहिए या फिर मोहन की राजनीतिक टाइमिंग-नाम चाहे जो दीजिए, लेकिन खेल दिलचस्प जरूर है। और यहीं से जन्माष्टमी की दही हांडी राजनीति के लिए बड़ा रूपक बन गईं है।
हाईकमान हांडी का ऑपरेटर...सियासी चुटकुले यहीं खत्म नहीं होते। कहा जा रहा है कि जब-जब प्रदेश में मोहन की हांडी फोड़ने की तैयारी होती है, ऊपर से कोई अदृश्य हाथ हांडी को थोड़ा और ऊपर कर देता है। गोविंदा टोली पूरी ताकत लगाती है। एक-दूसरे के कंधों पर चढ़ती है। नारे लगते हैं। ढोल बजता है। मोबाइल कैमरे चालू होते हैं। और तभी- हांडी ऊपर! गोविंदा नीचे!
फिर से कोशिश। हांडी फिर ऊपर!... अब गोविंदा टोली के सामने दो ही रास्ते हैं-या तो और लंबा पिरामिड बनाओ या फिर नीचे बैठकर रणनीति पर पुनर्विचार करो। राजनीति में दूसरा विकल्प अक्सर ज्यादा सुरक्षित माना जाता है।
मोहन पहलवानी के अखाड़े से राजनीति के अखाड़े तक... मोहन यादव की राजनीति को समझने वाले लोग एक और दिलचस्प तुलना करते हैं। कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने अखाड़े की मिट्टी देखी हो, वह राजनीति के अखाड़े में गिरने और उठने का खेल भी समझता है। पहलवानी में सामने वाले की ताकत ही नहीं देखी जाती, उसका संतुलन भी देखा जाता है।
राजनीति में भी यही खेल है। कौन किसके साथ खड़ा है? कौन किसके कंधे पर चढ़ रहा है? किसका पांव कहां है? किसका संतुलन कितना मजबूत है? और सबसे महत्वपूर्ण-कौन आखिरी समय तक खड़ा रहेगा? इस लिहाज से मोहन यादव के राजनीतिक सफर को देखने वाले व्यंग्यकारों ने उन्हें अब नया खिताब देना शुरू कर दिया है-"अखाड़े के उस्ताद तो थे ही, अब सियासी हांडी के भी उस्ताद!’
असली खेल हांडी का नहीं, संतुलन का...दही-हांडी की तरह राजनीति में भी सिर्फ ऊपर पहुंचना पर्याप्त नहीं होता। पूरी टोली का संतुलन बनाए रखना पड़ता है। एक खिलाड़ी जरा सा हिला तो पूरा पिरामिड नीचे। एक नेता नाराज हुआ तो समीकरण बदले। एक बयान आया तो नई चर्चा शुरू। एक चिट्ठी निकली तो नया अध्याय खुल गया।
और अगर हाईकमान ने एक बार भरोसा जता दिया तो पूरी हांडी की ऊंचाई ही बदल जाती है। इसीलिए प्रदेश की राजनीति में चल रही इन चर्चाओं को दही-हांडी के रूपक में देखने वालों का कहना है कि मोहन की असली लीला हांडी फोड़ने में नहीं, हांडी को बचाए रखने और सही समय पर उसकी ऊंचाई तय करने में है।
आखिर किसकी फूटेगी हांडी?...यह सवाल फिलहाल सबसे बड़ा है। क्या इंदौर की हांडी फिर फूटेगी? क्या विदिशा की हांडी अपना आकार बदलेगी? क्या दतिया की हांडी का असर बुंदेलखंड तक पहुंचेगा? क्या ग्वालियर-चंबल में कोई नई गोविंदा टोली बनेगी? क्या टीकमगढ़ में फिर से पिरामिड खड़ा होगा? या फिर इन सबके बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव अपनी हांडी को और ऊपर लटकाकर आराम से खड़े होकर यह पूरा खेल देखते रहेंगे?
राजनीतिक गलियारों में फिलहाल किसी के पास इसका पक्का जवाब नहीं...लेकिन जन्माष्टमी के मौके पर एक जुमला खूब सुनाई दे रहा है- "गोविंदा कितने भी हों, पिरामिड कितना भी ऊंचा हो, ढोल कितना भी तेज बजे, मोहन की हांडी तक पहुंचना इतना आसान नहीं।’
और अगर राजनीतिक पंडितों की बातों पर भरोसा करें तो मध्य प्रदेश की सियासत में इस जन्माष्टमी का सबसे बड़ा संदेश यही है "हांडी फोड़ने वालों की टोली बहुत है, लेकिन हांडी की ऊंचाई तय करने वाला कौन है-असल लीला तो यहीं है!’ इसीलिए फिलहाल प्रदेश की राजनीतिक गलियों में कृष्ण-कन्हैया के भजनों के साथ एक नया राजनीतिक जुमला भी गूंज रहा है- "मोहन की लीला न्यारी है...
हांडी ऊपर हमारी है!’
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों कृष्ण जन्माष्टमी का रंग कुछ ज्यादा ही गाढ़ा दिखाई दे रहा है। मंदिरों में कान्हा के जन्म की तैयारियां थीं, गलियों में दही-मिश्री की हांडी सज रही थी और गोविंदा टोलियां मटकी फोड़ने के लिए पिरामिड बना रही थीं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसी दही-हांडी ने एक नया रूप ले लिया-सियासी हांडी फोड़ प्रतियोगिता।
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