मेट्रोपॉलिटन रीजन विकास या बड़ा संकट: शहर और गांवों को लेना होगा मोर्चा; प्राकृतिक संसाधन और जलवायु आएगी खतरे में
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रदेश सरकार द्वारा उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन रीजन विकसित करने की अवधारणा को आर्थिक विकास और निवेश का नया इंजन बताया जा रहा है लेकिन समानांतर एक बड़ा सवाल भी है क्या यह परियोजना आने वाले वर्षों में जल, पर्यावरण, स्वास्थ्य और कृषि संकट, जंगल, जैव विविधता, गांव, ग्रामीण जीवन को और गंभीर संकट में तो नहीं डाल देगी?
ज रूरत है सस्टेनेबल मेट्रोपॉलिटन रीजन की न कि मेट्रो सिटी या मेट्रोपॉलिटिन योजनाओं की, जो जलवायु परिवर्तन के कारण मानव अस्तित्व के लिए खतरा बन चुकी हैं। दुनिया भर में विकास और निवेश जैसे शब्द अब मानव अस्तित्व के लिए ही बड़ा संकट बन गए हैं।
भयावह महामारी कोरोना से भी हमने विकास और निवेश के मामले में सबक नहीं लिया। अब जलवायु परिवर्तन से बचने के लिए भी कोई उपाय करना नहीं चाहते इसीलिए मेट्रोपॉलिटन रीजन पश्चिम के मॉडल जैसा हो या सनातनी, इस पर विचार करना चाहिए था लेकिन सनातन सरकार ने विचार किए बिना ग्रीक संस्कृति से आए मेट्रोपॉलिटन की कॉपी पेस्ट वाली अवधारणा की लक्ष्मणरेखा खींच दी।
विकास और निवेश वाले मेट्रो के रंग में रंगी ब्यूरोक्रेसी... सरकार पॉलीटीक़ल निवेश वाले रीजन बनाकर बेनामी जमीन और जायजाद का काला महासागर भले ही खड़ा करवा ले, वर्तमान में इससे कोई शिकायत नहीं लेकिन यह पूरी परियोजना सनातनी प्रकृति आधारित बनाकर गांव, खेती-किसानी, पानी, जंगल, हवा, खाद्यान्न सुरक्षा ओपन स्पेस को बचाए अन्यथा इसके डिटेल प्लान भी मास्टर प्लान जैसे ही छोड़ पकड़ वाले होंगे इसमें कोई दो मत नहीं और इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों गांव, खेती सबकी बलि होना तय है। ऐसे में शहर और गांव को साथ आकर मोर्चा लेना होगा।
विशेषज्ञों का मानना है मेट्रोपॉलिटन विस्तार बिना पर्यावरणीय वहन क्षमता का आकलन किए किया गया तो निमाड़ -मालवा को भारी कीमत चुकाना पड़ेगी। दानवाकार मेट्रोपॉलिटन रीजन की जरूरतों की आपूर्ति के लिए पानी का संकट और गहरागा।
इंदौर पहले ही अपनी पेयजल जरूरतों के लिए दूर नर्मदा नदी पर निर्भर है। शहर की बढ़ती आबादी के साथ नर्मदा से लगातार अधिक पानी लाया जा रहा है।
यदि इंदौर-उज्जैन महानगरीय क्षेत्र में लाखों नई आबादी क लिए उद्योग, टाउनशिप और व्यावसायिक केंद्र विकसित होते हैं तो पानी की मांग कई गुना बढ़ जाएगी।
चिंता की बात है निमाड़-मालवा क्षेत्र भूजल संकट से जूझ रहा है 1970 से लेकिन योजनाकार इस संकट को कम करना तो दूर नियंत्रित भी नहीं कर पाए। अब भूजल भी तेजी से खत्म हो रहा है।
हरियाली और उत्तम खेती के लिए पहचाने जाने वाले मालवा-निमाड़ में खेती की उपजाऊ भूमि और जलस्रोत खत्म हो रहे हैं और हरियाली के संकट से पहले ही जूझ रहे है।
कई इलाकों में जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। कंक्रीट और डामर का विस्तार वर्षाजल के प्राकृतिक पुनर्भरण को कम कर चुका है।
बढ़ेगी स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां... विशेषज्ञों के अनुसार अनियोजित शहरी विस्तार से स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। वायु प्रदूषण, वाहनों और उद्योगों की संख्या बढ़ने से सूक्ष्म धूल कण (पीएम2.5), नाइट्रोजन ऑक्साइड,ओजोन प्रदूषण जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इस कारण अस्थमा, फेफड़ों के रोग हृदय रोग, बच्चों में श्वसन समस्याएं बढ़ने का खतरा रहता है।
हीट वेव का दुष्प्रभाव... कंक्रीट आधारित विकास से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव बढ़ता है, जिससे शहर आसपास के क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म होते हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में यह स्थिति बुजुर्गों, बच्चों और श्रमिक वर्ग के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती है।
तेजी से घट रही खेती की जमीन...
इंदौर, सांवेर, महू, मानपुर, धार, मंदसौर, देवास, उज्जैन और आसपास का विशाल कृषि और जंगल क्षेत्र प्रदेश के सबसे उपजाऊ प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता में गिना जाता था। अब खेती और प्रकृति को विकास के मॉडल ने संकट में ला दिया है, यह सर्वज्ञात है।
मेट्रोपॉलिटन विकास के लिए उपजाऊ कृषि भूमि, हरियाली, जंगल और उससे जुड़े इलाके प्राकृतिक जलस्रोत सब कुछ अधिग्रहित होकर मेट्रोपॉलिटिन्य रचना के लिए आवश्यक होंगे।
नई सड़कें, औद्योगिक कॉरिडोर, टाउनशिप, लॉजिस्टिक हब, व्यावसायिक क्षेत्र इन सबके लिए बड़ी मात्रा में कृषि भूमि का अधिग्रहण बड़े पैमाने पर होगा। गांव खत्म हो जाएंगे।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है खेती योग्य भूमि लगातार घटती रही तो भविष्य में खाद्यान्न उत्पादन, ग्रामीण रोजगार और किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पडना तय है।
गांवों से पलायन और बढ़ेगा, ग्राम और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था जब खत्म होगी तो बेरोजगारी अनियंत्रित हो जाएगी। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि भूमि कम होने और खेती की लाभप्रदता घटने से लोग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर सकते हैं।
इसका परिणाम होगा गांवों की सामाजिक संरचना कमजोर होना, कृषि श्रमिकों की कमी, पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था का क्षरण, शहरों में झुग्गी बस्तियों का विस्तार। कई महानगरों में यही स्थिति पहले से है।
पर्यावरण और जैव विविधता पर असर
इंदौर और उज्जैन संभाग का विशाल भूभाग क्षेत्र केवल कृषि क्षेत्र नहीं है बल्कि अनेक छोटे जलस्रोतों, तालाबों, चरागाहों और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों का भी हिस्सा है। अत्यधिक शहरीकरण से तालाबों का अतिक्रमण, जल निकासी मार्गों का अवरोध, हरित क्षेत्र में कमी, स्थानीय जैव विविधता को नुकसान होगा ।
जलवायु परिवर्तन के दौर में नया जोखिम
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय यदि बड़े शहरी क्षेत्र विकसित किए जाते हैं तो यह सुनिश्चित करना आवश्यक है वर्षाजल संचयन अनिवार्य हो, कृषि भूमि संरक्षण नीति बने, हरित क्षेत्र सुरक्षित रहें व सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता मिले।
भूजल पुनर्भरण की व्यवस्था हो अन्यथा भविष्य में पानी, प्रदूषण और गर्मी की समस्याएं नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं।
निवेश बनाम सस्टेनेबल डेवलपमेंट
उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन रीजन आर्थिक गतिविधि, निवेश और रोजगार को बढ़ावा दे सकता है लेकिन मॉडल केवल रियल एस्टेट, उद्योग और कंक्रीट आधारित विस्तार पर आधारित रहा तो मालवा-निमाड़ को जल
संकट, कृषि भूमि हानि, पर्यावरणीय क्षरण और स्वास्थ्य समस्याओं की बड़ी कीमत चुकाना पड़ेगी।
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