सरकार इंदौर पर भी हो नजर-ए-करम: सीधी जैसा एक आकस्मिक दौरा अहिल्या नगरी का भी हो जाए साहब
KHULASA FIRST
संवाददाता

दुपट्टा पहनाने, मुंह दिखाने विमानतल आते हैं विधायक, विभागों में नहीं जाते, ‘आप’ ही कुछ करें
‘नवरत्न’ चुनने व ‘सरकार’ के अधीन होने के बावजूद दुर्दिनों के दौर से गुजर रहा हमारा इंदौर
स्वयं ‘सरकार’ जिस शहर की ‘खैरख्वाह’ वहां हर तरफ क्यों निकल रही आह?
हर छोटे-बड़े काम के लिए शहर के बाशिंदे भी खूब हो रहे परेशान, हर विभाग में लगाना पड़ते हैं चक्कर
जिला अस्पताल अब तक नहीं बना, एमवाय सुधरने को नहीं तैयार, सड़कों पर अतिक्रमण बेशुमार
आकस्मिक निरीक्षण करें ‘सरकार’ तो इंदौर में भी होगा खुलासा, आगाह करके आने पर सब आपको ‘हरा-हरा’ दिखाते-जंचाते हैं
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
‘सरकार…’ हमारे इंदौर पर भी तो कभी ‘नजरें करम’ कर दें, जैसी कल छुट्टी वाले दिन सुदूर सीधी जिले में की। वहां अकस्मात दौरा हुआ और हर वो अफसर छुट्टी वाले दिन छुट्टी पर भेज दिया गया, जो जनता के दुःख-दर्द-समस्याओं से दूर था। कलेक्टर तक की छुट्टी हो गई। अहिल्यानगरी में भी कोई कम अराजकता नहीं पसरी हुई है।
हर सरकारी महकमे की व्यवस्था ‘अंधेर नगरी-चौपट राजा' की तर्ज पर चल रही है। चाहे वे जनता की रोजमर्रा की समस्याओं-जरूरतों से जुड़े महकमे हों या सुरक्षा-स्वास्थ्य-यातायात आदि से जुड़े दफ्तर। ये अराजकता तब व्याप्त है, जब शहर ने ‘नवरत्न’ चुनकर आपके दल को दिए। इन ‘नवरत्नों’ को भी जनता से जुड़ी समस्याओं से रूबरू होने व निराकरण करने में कोई रुचि नहीं।
जनता के बीच घूमते, समस्याओं के निराकरण से जूझते एक-दो ‘रतन’ को छोड़ दो तो शेष सभी के ‘दरबार’ शहर की ‘रियाया’ से रीते हैं। रियाया भी जानती है कि ये ‘रत्न’ किसी काम के नहीं। सिवाय ‘अपना घर’ भरने के।
नतीजतन इस शहर के बाशिंदों को अब सब उम्मीदें ‘आप’ से ही हैं। और हों भी क्यों नहीं? आखिर ‘सरकार’ स्वयं इस शहर की ‘खैरख्वाह’ हैं तो हर तरफ से वाह-वाह की जगह ‘आह' क्यों उठे?
‘स रकार’ हम जानते हैं कि ये सब आपके हिस्से का काम नहीं। इसके लिए सांसद हैं, विधायक हैं, मंत्री हैं, पार्षद हैं, मेयर हैं। भारी-भरकम सरकारी अमला, अफसर, कारिंदे हैं। विधायक तो बस आपके आगमन पर रस्म अदायगी करने विमानतल पर पहुंचते हैं।
मुंह दिखाई की, दुप्पट्टा ओढ़ाया और फिर अपने आशियाने में समा जाते हैं। ये तब ही नजर आते हैं, जब आप इंदौर आते हैं। शेष दिन कहां हैं, किस जनता के काम में लिप्त हैं, ये इंदौर जैसा ‘जानकार’ शहर भी जान नहीं पाता।
सबकी ‘रमुज’ रखने वाले इंदौरी भी इस मामले में फेल हैं कि आखिर शहर के तमाम विधायक क्यों जनहित के मामलों में सक्रिय नजर नहीं आते। न इन माननीयों को कभी किसी ने आम जनता के अस्पताल एमवाय में देखा, न जिला अस्पताल में।
न बस अड्डों पर, न रेलवे स्टेशन पर। न शहर के बेतरतीब ट्रैफिक में। न आरटीओ में, न पासपोर्ट दफ्तर में। शहर के थाने, चौकी भी इनकी आमदरफ्त से दूर हैं। समझ ही नहीं आता कि आखिर सब जगह पर इन चुने हुए जनप्रतिनिधियों की आवाजाही क्यों नहीं? इन सब स्थानों पर ही तो जनता रोज-रोज जूझती है। फिर ये जनहित से दूर क्यों?
पार्षद तो जनता की रोजमर्रा की समस्याओं के निराकरण के लिए ही चुने जाते हैं, लेकिन इनमें से भी अधिकांश जनता के पार्षद होने की जगह रसूखदारों के प्रतिनिधि हो चले हैं। हर उस काम में इनकी सक्रियता देखने लायक होती है, जो इनकी ‘सेहत’ से जुड़ा होता है। शेष कामकाज के लिए इनकी सुस्ती दूर ही नहीं होती।
मंत्री, सांसद, विधायक के रूप में सबके अपने-अपने ‘आका’ हैं और जिस जनता ने इन्हें अपना आका चुना है, वह ‘राम भरोसे हिंदू होटल’ की तर्ज पर गुजर-बसर को मजबूर है। इसी का परिणाम है कि मेयर को जनता के बीच उनके दरवाजे पर जाकर रूबरू होने का अभियान चलाना पड़ रहा है।
पार्षदों के हौसले इस कदर हैं कि वे मेयर के इस अभियान का भी उपयोग गुटीय राजनीति के हिसाब से करने से गुरेज नहीं कर रहे। भले ही फिर इसके लिए पार्टी-संगठन-सरकार की जनता के बीच छीछालेदर हो जाए। शहर ठगा-सा, टुकुर-टुकुर देख रहा है कि इस दिन के लिए के एकमुश्त इतने पार्षद जिताए? अपने-अपने वार्ड में हर पार्षद की सुबह सिर्फ और सिर्फ उस काम के लिए ही होती है, जो ‘ज्ञान-गणित’ से जुड़ा हो। वह इस ‘गणित-ज्ञान’ के लिए वार्ड से लेकर निगम दफ्तर ही नहीं, भोपाल तक जूझता नजर आ जाएगा।
समस्याओं की फेहरिस्त तो अच्छी-खासी लंबी है। ये सिर्फ एक बानगी भर है, इसलिए एक आकस्मिक दौरे की जरूरत इंदौर भी अपने ‘खैरख्वाह’ से कर रहा है। शहर की चाह है कि किसी दिन या किसी रात ‘सरकार’ भी दबे पांव इंदौर आ धमकें। न सिर्फ आए, बल्कि शहर की सड़कों पर वैसे ही निकल जाए, जैसे प्रजा का हाल जानने अवंतिका नरेश निकल जाते हैं।
तभी असल पता चलेगा कि सरकार की सरपरस्ती वाले शहर की हकीकत क्या है? सरकारी अस्पतालों के सूरत-ए-हाल क्या हैं? थानों पर किसकी थानेदारी है? आदि। हालांकि ये सब काम जनप्रतिनिधियों के हैं, लेकिन वे हर जनहित के मसले पर ‘मूक-बधिरता’ ओढ़े हुए हैं।
यूं आगाह कर आपका आगमन सब अराजकताओं को फौरी तौर पर चाक-चौबंद कर देता है। वे विधायक भी नजर आ जाते हैं, जो आम दिनों में आम आदमी को दर्शन तक नहीं देते। न सिर्फ नजर आते हैं, बल्कि आपको ऐसे घेर लेते हैं कि वे ही आपके खास हैं। साहब-बहादुरों से लेकर माननीय विधायक-पार्षद-सांसद व मंत्री तक आपको ‘हरा-हरा’ ही दिखाते व जंचाते हैं।
इस हरे के पीछे कितना ‘काला-पीला’ है, ये तो मध्य प्रदेश के सीधी जिले में छुट्टी वाले दिन हुए आपके एकाएक दौरे से ही सामने आ गया। वहां आपने जिला कलेक्टर व सहकारी बैंक के मुखिया को हटाकर एक बार फिर साफ भी कर दिया है कि जनता पहले, अफसर बाद में। तो ‘श्रीमान’ ये शहर उम्मीद करे कि आप ऐसे ही ‘नायक’ बन किसी दिन ‘औचक’ आएंगे?
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