मदमहेश्वर, जहां पत्थरों में धड़कता है महादेव का नाभि मंडल: चौखंबा की छांव में छुपा ‘धरती का स्वर्ग’
KHULASA FIRST
संवाददाता

पंचकेदार की अनछुई सरहद, भीड़भाड़ से दूर, जहां पिघलता है हिमालय का घमंड
11 हजार फीट की ऊंचाई पर छुपा धरती का वो कोना, जिसे कहते हैं शांति की अंतिम सरहद
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
चार धाम यात्रा के पारंपरिक, कोलाहल और वीआईपी कल्चर वाले रास्तों से दूर, उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में एक ऐसा गुप्त कोना भी है जहां पहुंचकर घड़ी की सुइयां मानो थम जाती हैं।
समुद्र तल से लगभग 11,000 फीट की ऊंचाई पर बादलों को चीरती बर्फ से ढकी गगनचुंबी चौखंबा चोटियों के साए में बसा है मदमहेश्वर धाम।
‘पंचकेदार’ शृंखला के इस द्वितीय केदार तक पहुंचने की डगर भले ही हाड़-मांस कंपा देने वाली खड़ी चढ़ाइयों से भरी हो, लेकिन यहां की असीम शांति और अलौकिक वातवरण के कारण इसे आज भी धरती का स्वर्ग कहा जाता है।
आम सैलानियों की व्यावसायिक चकाचौंध से दूर यह पावन धाम आज भी उन एकांतप्रिय साधकों और घुमक्कड़ों का इंतजार कर रहा है जो हिमालय के असली आध्यात्मिक वैभव और उसकी निस्तब्धता को जीना चाहते हैं।
महाभारत कालीन इतिहास- जब बैल का रूप धर कर अंतर्ध्यान हुए शिव
मदमहेश्वर के प्राकट्य की कहानी कुरुक्षेत्र के उस महाविनाश के बाद शुरू होती है, जब पांडव गोत्र-हत्या और गुरु-हत्या के घोर पाप के पश्चाताप के लिए व्याकुल थे। कथा है कि महादेव पांडवों से रुष्ट थे और उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे।
पांडवों को ढूंढते हुए जब शिव केदारनाथ पहुंचे, तो उन्होंने एक विशाल बैल (वृष) का रूप धारण कर लिया और धरती में समाने लगे। तभी महाबली भीम ने उन्हें पहचान कर उनकी पीठ का हिस्सा कसकर पकड़ लिया, जो आज ‹केदारनाथ› के रूप में पूजा जाता है, लेकिन महादेव की माया यहीं समाप्त नहीं हुई।
धरती के गर्भ से होते हुए उनका मध्य भाग यानी नाभि मंडल जहां प्रकट हुआ, वही अलौकिक स्थान आज मदमहेश्वर के नाम से विश्व विख्यात है। इसके बाद उनके अन्य अंग भुजंग (तुंगनाथ), मुख (रुद्रनाथ) और जटा (कल्पेश्वर) में प्रकट हुए।
अद्भुत गर्भगृह- जहां मूर्ति नहीं नाभि रूपी पाषाण की होती है पूजा
इस मंदिर की स्थापत्य कला और आकर्षण का केंद्र इसका गर्भगृह है। देश के आम शिवालयों की तरह यहां आपको कोई पारंपरिक जलहरी वाला शिवलिंग या इंसानी नक्काशी वाली मूर्ति नजर नहीं आएगी।
मदमहेश्वर के गर्भगृह में प्राकृतिक रूप से उभरे हुए, नाभि के आकार के एक अत्यंत प्राचीन पाषाण (पत्थर) की पूजा होती है। काले पत्थर की इस भव्य शिला का सुबह-शाम होने वाला श्रृंगार और अभिषेक देखना अपने आप में एक ऐसा आध्यात्मिक अनुभव है जो रोंगटे खड़े कर देता है।
स्थानीय पुजारियों के अनुसार, चूंकि यहां संपूर्ण ब्रह्मांड के केंद्र यानी महादेव के मध्य भाग की पूजा होती है, इसलिए इस पूरे परिसर में एक असीम, मौन और चुंबकीय ऊर्जा का प्रवाह हमेशा महसूस किया जा सकता है।
यह ऊर्जा आधुनिक जीवन की आपाधापी से थके और तनावग्रस्त यात्री के मन को भी पल भर में ध्यान की स्थिति में ले आती है।
...तब तक अधूरी मानी जाती है यात्रा
मदमहेश्वर की यह यात्रा तब तक अधूरी और बेमानी मानी जाएगी, जब तक कि आप मुख्य मंदिर से करीब दो किलोमीटर की खड़ी और संकरी चढ़ाई पार करके बूढ़ा मदमहेश्वर न पहुंच जाएं। यह स्थान मुख्य परिसर से भी अधिक ऊंचाई पर एक रिज (कटक या पर्वत-श्रेणी) पर स्थित है।
जहां पहुंचते ही प्रकृति का कैनवास बदल जाता है और दूर-दूर तक फैले हरे-भरे मखमली बुग्याल आपका स्वागत करते हैं। यहां से सामने खड़ी चौखंबा, केदारनाथ और नीलकंठ जैसी विशालकाय चोटियां इतनी साफ, भव्य और नजदीक दिखाई देती हैं कि पहली बार देखने वाले को भ्रम होता है मानो हाथ बढ़ाते ही वह इन गगनचुंबी शिखरों को छू लेगा।
इन मखमली घास के मैदानों पर जब सूर्योदय और सूर्यास्त की पहली और आखिरी किरणें पड़ती हैं, तो चांदी जैसे सफेद बर्फ के पहाड़ अचानक सोने) की तरह दमक उठते हैं।
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