अब बिना प्रदेश संगठन महामंत्री के चलेगी मध्य प्रदेश भाजपा
KHULASA FIRST
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मप्र भाजपा में प्रदेश संगठन महामंत्री का पद पिछले करीब दो महीने से खाली है। इस पद पर नई नियुक्ति को लेकर सियासी गलियारों में कई तरह की अटकलें चल रही थीं। लेकिन अब अंदरखाने से जो संकेत मिल रहे हैं, वे कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। चर्चा यह है कि फिलहाल पार्टी प्रदेश संगठन महामंत्री के बिना ही काम आगे बढ़ा सकती है।
वो इसलिए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इस पद को लेकर अपनी परंपरागत व्यवस्था में बदलाव पर विचार कर रहा है। अब तक आमतौर पर संघ की ओर से ‹प्रचारक› को इस जिम्मेदारी के लिए भेजा जाता रहा है। लेकिन यदि इस परंपरा में बदलाव होता है तो मप्र भाजपा में प्रदेश संगठन महामंत्री की नई नियुक्ति कुछ समय के लिए टल सकती है।
दरअसल, मौजूदा प्रदेश संगठन महामंत्री की संघ में वापसी या यूं कहें कि भाजपा से मुक्त किए जाने के बाद से संगठनात्मक कामकाज की कमान क्षेत्रीय संगठन महामंत्री ने संभाल रखी है। प्रदेश स्तर की बैठकों से लेकर विभिन्न कार्यक्रमों तक, अब अधिकांश गतिविधियां उनके मार्गदर्शन और मौजूदगी में ही संचालित हो रही हैं।
पहले प्रदेश संगठन महामंत्री के रहते क्षेत्रीय संगठन महामंत्री का केवल बड़ी बैठकों या खास मौकों पर ही पार्टी मुख्यालय में आगमन होता था। लेकिन पिछले कुछ समय से उनका नियमित रूप से मुख्यालय में बैठना और संगठन के कामकाज पर नजर रखना कई नए संकेत दे रहा है। चर्चा है कि फिलहाल नये प्रदेश संगठन महामंत्री की नियुक्ति पर विराम लग सकता है। इसके साथ ही संगठनात्मक ढांचे में कुछ बदलाव भी देखने को मिल सकते हैं।
श्रीमंत, महारानी और राजकुमार... इस बार तीनों चुनावी मैदान में उतरेंगे?
मप्र के सियासी गलियारों में इन दिनों एक चर्चा जोर पकड़ रही है कि, क्या इस बार श्रीमंत के साथ उनकी महारानी और राजकुमार भी चुनावी राजनीति में किस्मत आजमाएंगे? दरअसल, अपने संसदीय क्षेत्र में श्रीमंत की लगातार सक्रियता तो पहले से ही चर्चा में रही है, लेकिन अब ग्वालियर में उनकी महारानी और राजकुमार की बढ़ती राजनीतिक मौजूदगी ने ग्वालियर-चंबल अंचल भाजपा के कई पुराने धुरंधर नेताओं की पेशानी पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
बताया जा रहा है कि इन दिनों महारानी ग्वालियर में बिल्कुल आम महिला की तरह लोगों के बीच घुलती-मिलती नजर आ रही हैं। कभी किसी के घर चाय पर पहुंच जाती हैं, तो कभी रास्ते में गाड़ी रुकवाकर लोगों के आग्रह पर पकोड़ों का स्वाद लेती दिख जाती हैं। छोटे-बड़े सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी लगातार मौजूदगी भी लोगों का ध्यान खींच रही है।
उधर, राजकुमार की बढ़ती सक्रियता ने भी सियासी चर्चाओं को हवा दे दी है। चुनाव में अभी करीब ढाई साल का वक्त है, लेकिन श्रीमंत परिवार की अचानक बढ़ी सक्रियता देखकर लोग कहने लगे हैं, लगता है इस बार पूरा ग्वालियर किला ही चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में है।
परिवहन महकमा बना रहा ‘उपकृत’ खबरनवीसों की सूची!
कुछ महीने पहले परिवहन महकमे से कथित तौर पर ‘उपकृत’ किए जाने वाले ‹खबरनवीसों› की एक सूची अचानक चर्चाओं में आई थी। उस समय यह सवाल भी उठा था कि सूची में शामिल नाम वाकई उपकृत थे या नहीं? चर्चा है कि एक बार फिर परिवहन महकमे ने ऐसे ‘उपकृत खबरनवीसों› की नई सूची तैयार करने की कवायद शुरू कर दी है।
इतना ही नहीं, बताया जा रहा है कि उपकृत करने का सिलसिला भी शुरू हो गया है। इसकी शुरुआत फिलहाल दो ‹खबरनवीसों› से हुई है। नारदजी के सूत्रों के मुताबिक इनमें से एक ‹खबरनवीस› यूट्यूब चैनल चलाने के साथ एक दैनिक अखबार के स्वामी बताए जाते हैं। दूसरे ख़बरनवीस एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन करते हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि यह सिलसिला इन दो नामों तक ही सीमित रहता है या आने वाले दिनों में ‘उपकृत’ होने वालों की सूची और लंबी होती है।
संघ को नाराज करना ‘साहब’ को भारी पड़ा
प्रदेश में जब भाजपा की सरकार हो और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का प्रभाव चरम पर हो, तब उससे जुड़े किसी काम को टालना गुस्ताखी करने जैसा है। लेकिन प्रदेश के एक प्रमुख राजस्व आयुक्त (आईएएस) ने शायद यही जोखिम उठा लिया और इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी।
दरअसल, संघ के एक अनुषांगिक संगठन ने इंदौर और मुरैना में जमीन आवंटन की मांग रखी थी। बताया जाता है कि सरकार ने इस संबंध में निर्देश भी दे दिये थे। मगर साहब ने फाइल को आगे बढ़ाने में ऐसी ‘धीमी रफ्तार’ दिखाई कि मामला काफी समय तक अटका ही रहा। फिर क्या? साहब की सुस्ती से नाराजगी ऊपर तक पहुंच गई।
नतीजा यह हुआ कि साहब को उनके अहम पद से हटा दिया गया और ऐसी जगह भेज दिया गया, जिसे सरकारी शब्दों में ‘लूप लाइन’ कहा जाता है। नारदजी कहते हैं कि सरकारी नौकरी में लंबे समय तक ‘मलाईदार’ पद पर टिके रहने के लिए सिर्फ नियम-कायदों का ज्ञान ही काफी नहीं होता, बल्कि सत्ता के असली शक्ति केंद्रों की नब्ज समझना भी उतना ही जरूरी होता है। वरना फाइल की रफ्तार कभी-कभी करियर की दिशा भी बदल देती है।
बरकतउल्ला विवि से गोपनीय फाइलें गायब!
गड़बड़ियों और विवादों के कारण अक्सर सुर्खियों में रहने वाला बरकतउल्ला विश्वविद्यालय एक बार फिर चर्चाओं में है। दरअसल, विश्वविद्यालय से करीब दर्जनभर अत्यंत गोपनीय फाइलें रहस्यमय तरीके से गायब हो गई हैं, जिससे परिसर में हड़कंप मचा हुआ है। बताया जा रहा है कि गायब हुई इन फाइलों में कई कॉलेजों की संबद्धता, परीक्षाओं और पीएचडी से जुड़ी अहम व संवेदनशील जानकारियां थीं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। इसमें जांच की सुई विश्वविद्यालय के भीतर ही कुछ कर्मचारियों की ओर भी घूम रही है। चर्चा है कि पुलिस जल्द ही कुछ संदिग्ध कर्मचारियों के घरों पर छापेमारी कर सकती है।
नारदजी कहते हैं कि गोपनीय फाइलों का इस तरह गायब होना महज लापरवाही का नतीजा है या इसके पीछे कोई बड़ा खेल है? असलियत अब पुलिस जांच के बाद ही सामने आएगी।
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