अशोक के प्रति अनुराग: बर्णवाल से ज्यादा अचंभित कर रहा है राजोरा का मुख्य सचिव नहीं बन पाना
KHULASA FIRST
संवाददाता

कुर्सी, किस्मत और कयास: अशोक बर्णवाल के हाथों में एमपी की कमान; क्या दिल्ली हाईकमान और समीकरणों ने बदला गेम?
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश शासन में कल देर रात प्रशासनिक सत्ता का विधिवत हस्तांतरण हो गया। पुराने मुख्य सचिव अनुराग जैन प्रदेश से विदा हो गए और उनके स्थान पर नए मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल काबिज हो गए हैं।
जितनी रोचक बर्णवाल की नियुक्ति है, उससे ज्यादा उनसे वरिष्ठ डॉ. राजेश राजौरा का मुख्य सचिव नहीं बन पाना अचंभित कर रहा है। अटकलें लगाई जा रही हैं कि अशोक के प्रति अनुराग कैसे हुआ?
क्या करीबी माने जाने वाले राजोरा के प्रति मुख्यमंत्री का अनुराग कम हो गया? या फिर दिल्ली हाईकमान के लिए राजोरा की मुख्यमंत्री से नजदीकी फिर बाधक बन गई। या कोई और मजबूरी रही, जो राजोरा को मुख्य सचिव की कुर्सी से बार-बार खींचती रही है?
मुख्य सचिव बनने के लिए प्रयासरत लगभग आधा दर्जन भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों को पीछे छोड़ते हुए बर्णवाल चेयर रेस में आगे निकल गए।
सेवानिवृत्त हुए मुख्य सचिव अनुराग जैन देर रात अपने साथ बर्णवाल को लेकर मुख्यमंत्री से औपचारिक मुलाकात के लिए गए। यह सामान्य प्रोटोकॉल कहा जा सकता है, लेकिन यह भी चर्चा में आ गया कि बर्णवाल हो सकता है जैन की पसंद हों।
एक अटकल इसलिए भी लगाई जा रही है, क्योंकि प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ मुख्य सचिव कौन होगा, यह हाईकमान तय करता है, ऐसी धारणा बनी हुई है। हाईकमान द्वारा मुख्य सचिव की नियुक्ति को प्रदेश शासन की चौकीदारी के रूप में भी इंगित किया जाता रहा है, ताकि सरकार पर मुख्य सचिव के माध्यम से हाईकमान की निगरानी पूरे समय बनी रहे।
बहुत संभव है कि नए मुख्य सचिव के लिए अनुराग जैन से भी भोपाल और दिल्ली के स्तर पर मंत्रणा की गई हो। इस मंत्रणा से अशोक बर्णवाल का नाम निकलकर आया होगा।
कहा जा रहा है कि हो सकता है राजोरा मुख्यमंत्री के करीबी अधिकारी माने जाते रहे हैं और यह हाईकमान के लिए मुफीद नहीं रही हो। हो सकता है बीते दो वर्ष में मुख्यमंत्री की पसंद में कोई बदलाव आया हो, इस कारण भी राजोरा जहां पहुंचना चाहते थे, वहां तक नहीं पहुंच पाए।
करण और समीकरण जो भी रहे हों, राजोरा के लिए मुख्य सचिव की कुर्सी उनकी किस्मत में फिलहाल नहीं है। अंग्रेजी कहावत है ‘देयर इज मेनी स्लिप बिटवीन कप एंड लीप’.... यानी चाय की प्याली और होठों के बीच भी बाधा बनी रहती है। किस्मत साथ नहीं दे तो चाय की प्याली होठों तक आते-आते हाथों से फिसल जाती है।
उल्लेखनीय है सामान्य प्रशासन विभाग ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अशोक बर्णवाल (1991 बैच) को प्रदेश का नया मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया है। 22 जुलाई 2026 को जारी आदेश के साथ ही पिछले कई महीनों से चल रही अटकलों पर विराम लग गया, लेकिन इस नियुक्ति के साथ एक सवाल फिर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है कि कभी मुख्य सचिव पद के सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे राजेश राजौरा आखिर पीछे क्यों रह गए?
करीब दो वर्ष पहले तक प्रशासनिक हलकों में यह धारणा थी कि राजेश राजोरा अगले मुख्य सचिव बनने की दौड़ में सबसे आगे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ उनकी कार्यशैली, मुख्यमंत्री कार्यालय में उनकी सक्रिय भूमिका और प्रशासनिक पकड़ को उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, लेकिन अंतिम फैसला अशोक बर्णवाल के पक्ष में गया।
क्या केवल मुख्यमंत्री की पसंद से तय होता है मुख्य सचिव? इस धारणा के बारे में वरिष्ठ अधिकारी स्पष्ट करते हैं कि प्रशासनिक व्यवस्था में मुख्य सचिव की नियुक्ति केवल मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं होती।
वरिष्ठता, सेवा रिकॉर्ड, प्रशासनिक अनुभव, केंद्र और राज्य सरकार के साथ समन्वय क्षमता, शासन की प्राथमिकताएं तथा राजनीतिक नेतृत्व का व्यापक विश्वास इन सभी पहलुओं का समग्र मूल्यांकन किया जाता है, इसलिए किसी अधिकारी का मुख्यमंत्री के निकट होना एक सकारात्मक पहलू हो सकता है, लेकिन यह नियुक्ति की गारंटी नहीं माना जाता।
कुल मिलाकर अशोक बर्णवाल की नियुक्ति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मुख्य सचिव जैसे सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर निर्णय केवल व्यक्तिगत समीकरणों से नहीं होते। राजोरा का चयन क्यों नहीं हुआ, इसका कोई आधिकारिक कारण नहीं है।
इसलिए यह कहना कि मुख्यमंत्री से उनकी नज़दीकी, मुख्यमंत्री की नाराजगी या निवर्तमान मुख्य सचिव की असहमति इसकी वजह थी, किसी भी तरह से उचित नहीं होगा।
इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मुख्य सचिव की नियुक्ति में वरिष्ठता, प्रशासनिक अनुभव, राजनीतिक नेतृत्व का विश्वास, संस्थागत स्वीकार्यता और शासन की तत्कालीन प्राथमिकताएं ये सभी तत्व मिलकर अंतिम निर्णय का आधार बनते हैं। यही कारण है कि प्रशासनिक गलियारों में यह नियुक्ति आने वाले समय तक चर्चा का विषय बनी रहेगी।
क्या अनुराग जैन की भूमिका रही?
निवर्तमान मुख्य सचिव अनुराग जैन के कार्यकाल को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं होती रही हैं। कुछ प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार उनकी अपनी प्रशासनिक प्राथमिकताएं रहीं, लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने राजोरा का समर्थन नहीं किया या उनके चयन के पक्ष में नहीं रहे हों। इसलिए इस तरह की चर्चा अनुमान के आधार पर ही कही जा रही है।
बर्णवाल के पक्ष में क्या रहा?
अशोक बर्णवाल का चयन कई संस्थागत कारणों से स्वाभाविक माना जा रहा है। उनका लंबा और विविध प्रशासनिक अनुभव। वरिष्ठता और स्थिर सेवा रिकॉर्ड। केंद्र और राज्य स्तर पर समन्वय का अनुभव। विभिन्न विभागों में नेतृत्व का व्यापक अनुभव।
सरकार की वर्तमान प्रशासनिक प्राथमिकताओं के अनुरूप कार्यशैली। यानी यह नियुक्ति केवल किसी एक व्यक्ति की पसंद या नापसंद का परिणाम नहीं, बल्कि कई संस्थागत कारकों के संतुलन का फैसला भी मानी जा रही है। बावजूद इस सबके राजेश राजोरा अब भी मध्य प्रदेश के सबसे अनुभवी और प्रभावशाली अधिकारियों में गिने जाते हैं।
प्रशासनिक व्यवस्था में शीर्ष अधिकारियों की भूमिकाएं समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती हैं। ऐसे में भविष्य में उन्हें कोई अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलना असंभव नहीं माना जा सकता।
क्या राजोरा की छवि उनके लिए चुनौती बन गई?
प्रशासनिक और राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि कई बार किसी अधिकारी की किसी एक सत्ता केंद्र से अत्यधिक निकटता की धारणा भी उसके लिए चुनौती बन सकती है। मुख्य सचिव से अपेक्षा रहती है कि वह सरकार, नौकरशाही और विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच पूरी तरह संतुलित और सर्वस्वीकार्य समन्वयक की भूमिका निभाए।
हालांकि राजेश राजोरा के मामले में यही कारण निर्णायक रहा, ऐसा कहना उचित नहीं है। इसे केवल प्रशासनिक हलकों में चल रही चर्चाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
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