प्रॉपर्टी विवाद निपटाने के कानूनी दांव-पेंच: मौजूदा संपत्ति को पाने व बिक चुकी संपत्ति को बचाने के हथकंडे
KHULASA FIRST
संवाददाता

5 साल के अध्ययन में 10 हजार फैसलों से निकाला सार
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रॉपर्टी विवाद अब घर-घर की कहानी बन चुके हैं। किसी को बिक चुकी संपत्ति बचाने की कवायदें करनी पड़ती हैं तो किसी को मौजूदा संपत्ति के बंटवारे की दरकार है। कहीं नामांतरण नहीं हो पा रहा तो कहीं कब्जे का विवाद और कहीं मालिकी का मसला प्रकरणों के निपटारे में अड़ंगा डाल देता है। इन्हीं सब के मद्देनजर इंदौर के एक वकील ने इन्हें निपटाने के लिए दांव-पेंचों से भरी किताब ही लिख डाली।
पिछले 20 साल में आए प्रॉपर्टी के भावों में उछाल के बाद अब प्रॉपर्टी के झगड़े आम बात हो गई है। गांवों में तो तहसीलों में सैकड़ों प्रकरण रोजाना लगते ही हैं, इंदौर जैसे बड़े शहर भी अछूते नहीं हैं। कहीं जमीन बंट नहीं पा रही तो कहीं विवादित जमीन की रजिस्ट्री हो गई या फिर कभी-कभी एक ही जमीन की दो रजिस्ट्री जैसे हालात भी बन जाते हैं।
कहीं रजिस्ट्री कैंसिल कराने की जद्दोजहद है तो कहीं नामांतरण, बंटवारे-नपती के झगड़े मुंह उठाये खड़े हैं। वहीं मालिकी, किराएदारी व इकरारनामे के विवाद भी कम नहीं हैं। आलम यह है कि मप्र में राजस्व न्यायालयों में करीब 10 लाख केस लंबित हैं, वहीं सिविल कोर्ट में भी जमीन-जायदाद के लाखों प्रकरणों की भरमार है।
इनकी तादाद कम होने के आसार इसलिए भी कम हैं कि केस को लंबा खींचने-खिंचवाने के हथकंडों से एवं जागरूकता के अभाव में सालों तक निपटने का नाम नहीं लेते हैं।
वहीं इन विषयों की गहरी जानकारी और इस विधा के जानकारों का अभाव प्रकरणों की संख्या में इजाफा कर देता है और निपटारे की प्रक्रिया को भी पेचीदा कर देता है, जबकि एक केस निपटने की तुलना में कई गुना नए केस पैदा हो जाते हैं।
ऐसे में इंदौर के वकील राजेंद्र कचोलिया ने इस गंभीर मसले को आसानी से सुलझाने के लिए पिछले 5 साल तक काफी अध्ययन किया और सुप्रीम कोर्ट से लेकर छोटी अदालतों तक के करीब 10 हजार फैसलों का सार निकालकर जमीन के दांव-पेंच नाम से एक किताब लिखी है।
ये उनकी पहली किताब है, जो ए-फोर साइज के 248 पेज में है। सिविल प्रकरणों के जानकार एडवोकेट राजेंद्र कचोलिया बताते हैं कि जमीन-जायदाद के प्रकरणों के लंबे समय तक खिंचने के पीछे एक बड़ा कारण उससे जुड़े कानूनों की जटिलता, कठिन भाषा और काफी महीन बिंदु हैं, जिनके चलते कई केस, जो महज एक पॉइंट पर निपट सकते हैं, वे सालोसाल अदालतों में चलते रहते हैं।
मुवक्किल, यानी पक्षकार तो इनसे अंजान रहता ही है, कानूनों की अधिकता व सामनेवाले वकील की चालाकी से सिविल, यानी दीवानी प्रकरणों के वकील भी कई मर्तबा कन्फ्यूज हो जाते हैं कि अब कौन-सा पैंतरा चलें, क्योंकि सिविल मामलों में फंसने और बचने के 10 गलियारे होते हैं, जबकि इसके विपरीत क्रिमिनल, यानी लड़ाई-झगड़ों के मामले में कानून तय है और सामान्यत: एक ही रास्ता रहता है।
उदाहरण के लिए- जैसे हत्या का मामला है, तो सबूत व गवाही के बाद फैसला होता है।
यदि किसी के द्वारा हत्या करना साबित हो जाए तो उम्रकैद या फांसी तय है, लेकिन जमीन के अपराधों में ऐसा नहीं है। मसलन एक कब्जा गैरकानूनी भी हो तो एक मियाद के बाद मालिकी का हक दे देता है और ऐसा ही कब्जा खेती की जमीन पर हो तो उसका केस रोजाना चलाया जाकर निपटाने तक का कानून में प्रावधान है, किंतु हकीकत में संबंधित लोगों में जागरूकता की कमी व अपने पक्ष को सही ढंग से, निडरतापूर्वक नहीं रख पाने से उस पर अमल नहीं हो पाता।
कानून की अधिकांश किताबों में सिर्फ ‘कानून’ लिखा है, लेकिन ‘जमीन के दांव-पेंच’ में उन बातों का भी समावेश किया गया है, जो प्रैक्टिकली भी होती हैं और इनसे निपटने के तरीके भी लिखे हैं, ताकि कोई केस लंबा नहीं खिंचे और उनका शीघ्रता से निपटारा कराया जा सकें।
इस किताब को सुविधा के हिसाब से बंटवारे, कब्जा, नपती, वसीयत, रजिस्ट्री रद्द कराने, रास्ता विवाद, स्टे, धोखाधड़ी जैसे कई शीर्षकों में बांटकर लिखा गया है, ताकि किसी को भी अपने विषय विशेष की जानकारी छांटने के लिए पन्ने पलटाने नहीं पड़ें और वे पहली नजर में ही अनुक्रमणिका देखकर संबंधित विषय से जुड़े तथ्य, कानूनी नजीरें, प्रावधान व दलीलें पढ़-देख सकें।
ऐसे में वकील इन्हें देखकर विषय विशेष के हिसाब से किसी मुद्दे पर समय नहीं लेकर तत्काल बहस भी कर सकते हैं, जिससे प्रकरण का निपटारा कम समय में हो सकता है और तारीख पर तारीख लेने की नौबत भी नहीं आएगी।
ये किताब इस मायने में भी खास है कि आमतौर पर कानून की किताबें काफी मोटी व कठिन भाषा में होती हैं, जबकि इस किताब में भाषा समझने योग्य व बोलचाल की भाषा में कानूनी भाषा के साथ है। इसके लेखक
राजेंद्र कचोलिया सिविल व राजस्व न्यायालयों में तेजी से प्रकरण निपटाने के लिए पहचाने जाते हैं।
वकीलों के साथ आमजन तक के लिए भी उपयोगी
आमतौर पर प्रॉपर्टी, यानी संपत्ति के मामले सिविल प्रक्रिया संहिता 1908, यानी सीपीसी के तहत संचालित होते हैं। कृषि भूमि होने पर मप्र भू-राजस्व संहिता 1959 के प्रावधान लागू होते हैं, लेकिन जहां इस भू-राजस्व संहिता में कोई प्रावधान नहीं हो या अस्पष्ट हो तो वहां सीपीसी लागू होती है।
ये दोनों विषय बहुत ही नीरस तो हैं ही, इनकी भाषा भी काफी कठिन है, इसलिए अधिकांश वकीलों का रुझान क्रिमिनल, क्लेम व फैमिली विवाद में रहता है, क्योंकि उनमें कम समय में फीस अच्छी मिलती है, जबकि सिविल, यानी दीवानी मामलों में समय लगता है और संयम भी रखना पड़ता है।
ये किताब वकीलों से लेकर आमजन के लिए भी अपने मामले को समझने व उससे निपटने के लिए उपयोगी है। इसमें दावा लगाने से लेकर जवाब दावे देने तक का उल्लेख है और उनकी बारीकियों को भी बताया गया है। साथ ही कोर्ट फीस कितनी व किसे देना होगी, इसकी भी जानकारी दी गई है।
बच्चे की संपत्ति बेच नहीं सकते मां-बाप, बेटी के हक सहित हैं कई फंडे
इस किताब में नाबालिग की संपत्ति जैसे गंभीर विषयों को भी उठाया गया है। आमतौर पर किसी बालक की संपत्ति उसके माता-पिता या अभिभावक बेच देते हैं, जबकि इस संबंध में कानून स्पष्ट है कि बिना कोर्ट की इजाजत के कोई भी बच्चे की संपत्ति नहीं बेच सकता।
इस पुस्तक में इस गंभीर विषय पर भी प्रकाश डाला गया है और अहम न्यायदृष्टांत (नजीरें) भी बताया गया है, जिससे बच्चे की संपत्ति को बिकने या बंटने से बचाया जा सकता है। इसी तरह पुत्र भी पिता या दादा के जीते-जी संपत्ति में हिस्सा नहीं मांग सकता।
बेटी के बराबरी के हक को भी बताया गया है। इसके अलावा किताब में कई समस्याओं के फंडे और दलीलें भी हैं, जिनसे अपने प्रकरणों में जीत हासिल की जा सकती है।
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