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ड्रोन से नापी जमीन: पटवारी ने चढ़ाए गलत नाम

Khulasa First

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संवाददाता

16 सितंबर 2026, 1:34 pm
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ड्रोन से नापी जमीन

धार के बुढ़ियाखेड़ी की गड़बड़ी का खुलासा

जो मालिक नहीं, उन्हें मिल गया पट्टों का मालिकाना हक

पट्टों के स्वामित्व की कार्यप्रणाली पर सवाल

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
केंद्र सरकार की योजना के अंतर्गत मध्य प्रदेश में पट्टाधारकों को दिए जाने वाले अधिकार अभिलेख या रजिस्ट्री को लेकर प्रदेश सरकार और भाजपा संगठन द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म दिवस पर बड़ा आयोजन किया जा रहा है, लेकिन इस योजना की प्रशासनिक प्रक्रिया में कई त्रुटियां होने से संपत्तिधारक की स्थिति को लेकर अभी से विवाद खड़े हो गए और शिकायतें शुरू हो गईं।

कुछ मामलों का खुलासा हुआ, जिसमें बताया जा रहा है कि सरकार जिस व्यक्ति को मालिकाना हक दे रही है, वह वास्तव में उस संपत्ति का मालिक ही नहीं है और जो वास्तविक मालिक है, उसका नाम दस्तावेज से गायब है। ऐसा पटवारी के स्तर पर हो रहा है। यानी पटवारी जो करे सो कम है।

जो मामले सामने आए, हो सकता है उनमें पक्ष/विपक्ष की राजनीति भी अंदरूनी तौर पर काम कर रही होगी। इसके कारण असली संपत्ति मालिक की जगह किसी दूसरे को काबिज कराया जा रहा हो। ऐसी आशंका को लेकर तरह-तरह की चर्चा है।

गांव की आबादी में वर्षों से मकान और भूखंड पर काबिज परिवारों को अब केवल कब्जे के भरोसे नहीं, बल्कि सरकारी अधिकार अभिलेख और प्रॉपर्टी कार्ड के जरिये स्वामित्व का दस्तावेज देने की प्रक्रिया मध्य प्रदेश में बड़े स्तर पर चल रही है।

केंद्र की ‘स्वामित्व’ (सर्वे ऑफ विलेज एंड मैपिंग विथ इम्प्रोवाइज्ड टेक्नोलॉजी इन विलेज एरियाज) योजना के तहत ड्रोन और आधुनिक तकनीक से गांवों की आबादी भूमि का सर्वे कर भूखंडों की सीमाएं तय की जा रही हैं और उसके आधार पर अधिकार अभिलेख तैयार किए जा रहे हैं, लेकिन ड्रोन सर्वे के बाद तैयार अधिकार अभिलेख और पटवारी रिपोर्ट में कई भूखंडों के मालिकों के नाम गलत दर्ज हुए। कहीं दूसरे लोगों के नाम जोड़ दिए गए और कुछ वास्तविक भूखंडधारियों के नाम रिकॉर्ड से गायब हैं।

धार जिले की ग्राम पंचायत सिंघाना के बुढ़ियाखेड़ी में सामने आई शिकायतों ने इसी प्रक्रिया की शुद्धता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसान संघ के उपाध्यक्ष दयाराम पाटीदार ने जमीन, मकान आदि के पट्टों के आधार पर संपत्ति की रजिस्ट्री कर संबंधित पट्टाधारक को मालिकाना हक का अधिकार अभिलेख देने की नीति का तत्काल संज्ञान लिया और इसमें हुई तकनीकी गलतियां या पटवारी स्तर पर जानबूझकर की गई गड़बड़ी खोजी।

उन्होंने इस बारे में तत्काल उप मुख्यमंत्री को दिए ज्ञापन में आरोप लगाया है कि ड्रोन सर्वे के बाद तैयार अधिकार अभिलेख और पटवारी रिपोर्ट में कई भूखंडों के मालिकों के नाम गलत दर्ज हुए हैं, कहीं दूसरे लोगों के नाम जोड़ दिए गए और कुछ वास्तविक भूखंडधारकों के नाम रिकॉर्ड से गायब हैं।

सरकार की योजना क्या है?
स्वामित्व योजना का मूल उद्देश्य पुरानी ग्रामीण आबादी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को उनके मकान और भूखंड का अधिकार अभिलेख उपलब्ध कराना है। इसके लिए ड्रोन और कोर्स तकनीक से आबादी क्षेत्र का उच्च सटीकता वाला नक्शा तैयार किया जाता है।

इसके बाद राज्य सरकार की राजस्व व्यवस्था में जांच, आपत्ति और सत्यापन की प्रक्रिया के आधार पर अधिकार अभिलेख/प्रॉपर्टी कार्ड तैयार किए जाते हैं। इसका उद्देश्य पुराने समय से चले आ रहे सीमा विवाद, कब्जे के विवाद और मालिकाना हक को लेकर अनिश्चितता के साथ रजिस्ट्री दस्तावेज नहीं होने से वित्तीय संस्थाओं द्वारा संपत्तिधारक को लोन नहीं मिलने जैसी समस्याओं का समाधान करना है।

संपत्ति कार्ड के आधार पर संपत्ति का आर्थिक उपयोग और संस्थागत ऋण लेने की संभावनाएं भी बढ़ती हैं। उक्त दस्तावेज नहीं होने से कई ग्रामीण अपने बच्चों को उच्च अध्ययन करने के लिए बैंक से एजुकेशन लोन भी नहीं ले पा रहे, क्योंकि बैंक संपत्ति की रजिस्ट्री के आधार पर ही लोन स्वीकृत करती है।

लंबे समय से यह समस्या चली आ रही है। केंद्र सरकार के अनुसार अगस्त 2026 तक स्वामित्व योजना के तहत देशभर में ऐसे प्रॉपर्टी कार्ड के आधार पर 11,147 ऋण, कुल 1,713 करोड़ रुपए के वितरित किए जा चुके थे।

मध्य प्रदेश में कितने लोग/संपत्तियां दायरे में?... मध्य प्रदेश में योजना का पैमाना काफी बड़ा है। राज्य के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 42,055 लक्षित आबादी गांवों में से 39,916 गांवों में काम पूरा किया जा चुका था। प्रदेश में कुल 72.67 लाख प्लॉट सर्वेक्षित किए गए हैं। इनमें से 64.89 लाख प्लॉटों के अधिकार अभिलेख तैयार किए जा चुके थे। इनमें लगभग 46.07 लाख निजी प्लॉट और 18.81 लाख शासकीय प्लॉट शामिल हैं।

इस बारे में किसान संघ के दयानंद पाटीदार बताते हैं जब ड्रोन सर्वे के बाद तैयार रिकॉर्ड को ही भविष्य में ग्रामीण आबादी की संपत्ति के अधिकार का आधार बनाया जाना है, तब रिकॉर्ड में एक नाम गलत जुड़ना, वास्तविक मालिक का नाम छूटना या एक ही भूखंड में कई लोगों के नाम दर्ज होना सामान्य प्रशासनिक गलती भर नहीं मानी जा सकती।

उन्होंने धार जिले के ऐसे ही एक ग्राम बुढ़ियाखेड़ी के दस्तावेज का खुलासा किया है। अपने ज्ञापन में बताया कि उदाहरण के तौर पर उपरोक्त ग्राम में प्लॉट नंबर 9 में वैध रजिस्ट्रीधारी प्रवीण पिता दयाराम के साथ अन्य नाम जोड़े दिए गए हैं।

दिनेश गोपाल के मकान/प्लॉट का नाम छूटने, राजेंद्र पिता परसराम के खरीदे मकान में दूसरे व्यक्ति के नाम जोड़ने और देवेंद्र पिता नारायण के मकान के रिकॉर्ड में दूसरे नाम दर्ज किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। यह तो एक गांव का उदाहरण है, हो सकता है ऐसे कई गांव और संपत्ति के मामले हों। इस मामले में किसान संघ ने जरूरी प्रक्रियागत सुझाव भी दिए हैं।

उपरोक्त गांव का हवाला देते हुए दयाराम बताते हैं कि संपत्ति के नामकरण में सही वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा, ऐसा प्रतीत होता है। राजस्व विभाग को सबसे पहले अधिकार अभिलेख का सार्वजनिक प्रकाशन चाहिए था, जो नहीं हुआ ऐसा लगता है। उसके बाद मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन और फिर आपत्तियां बुलाई जाना थीं। आपत्तियों के निराकरण के बाद ही अंतिम रिकॉर्ड तथा प्रॉपर्टी कार्ड देना था और यही किसान संघ की भी मांग है।

स्वामित्व योजना का उद्देश्य ही संपत्ति की सीमा और मालिकाना हक को अधिक स्पष्ट करना है। इसलिए ड्रोन से तैयार नक्शा तभी उपयोगी होगा जब उसके बाद मौके की वास्तविक स्थिति, पुराने दस्तावेज, कब्जा, हिस्सेदारी और संबंधित परिवार की जानकारी का सही मिलान हो।

सरकारी दस्तावेजों में भी योजना की प्रक्रिया में ग्राउंड वेरिफिकेशन और डिस्प्यूट रिसॉल्युशन यानी विवादों के निराकरण को महत्वपूर्ण बताया गया है, ताकि अंतिम स्वामित्व रिकॉर्ड सही तरीके से तैयार हो सके।

बुढ़ियाखेड़ी की शिकायत इसी प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी पर सवाल उठाती है। क्या ड्रोन से तैयार डिजिटल नक्शे और पटवारी रिकॉर्ड को मौके पर वास्तविक कब्जे और वैध दस्तावेजों से पर्याप्त रूप से मिलाया गया है? शायद ऐसा नहीं हुआ होगा, इसीलिए अब शिकायत और विवाद की स्थिति बनी है।

72 लाख प्लॉट का रिकॉर्ड, छोटी गलती का बड़ा असर
मध्य प्रदेश में 72.67 लाख प्लॉटों का सर्वे और करीब 64.89 लाख अधिकार अभिलेख तैयार होना इस योजना के व्यापक पैमाने को बताता है। ऐसे में बुढ़ियाखेड़ी जैसे मामलों से एक बड़ा प्रशासनिक सबक भी निकलता है।

अधिकार अभिलेख को अंतिम रूप देने से पहले ग्राम स्तर पर सार्वजनिक प्रकाशन और आपत्ति-सुनवाई केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि स्वामित्व विवाद रोकने की सुरक्षा व्यवस्था बन सकती है।

किसान संघ की मांग भी इसी दिशा में है कि पहले गांव में रिकॉर्ड सार्वजनिक हो, हर भूखंड का मौके पर सत्यापन हो, नाम और हिस्से की त्रुटियां सुधारी जाएं तथा विवादित मामलों का निराकरण करने के बाद ही अंतिम अधिकार अभिलेख और पट्टे/प्रॉपर्टी कार्ड वितरित किए जाएं।

यानी सरकार की नीति का लक्ष्य ग्रामीणों को मालिकाना हक का सरकारी दस्तावेज देना है, लेकिन बुढ़ियाखेड़ी का मामला यह सवाल सामने ला रहा है कि मालिकाना हक देने से पहले ‘सही मालिक कौन’ है, यह तय करने की प्रक्रिया मजबूत है या नहीं?

इसकी खोज-खबर सरकार को लेनी चाहिए और वह भी समय रहते, अन्यथा राजस्व अधिकारी इस तरह के विवादों का निराकरण करने में ही वर्षों तक लगे रहेंगे और नीति का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

1.34 लाख लोगों को इंदौर में मिलेगा कानूनी हक

सरकार उठाएगी रजिस्ट्री का खर्च

नितिन नबीन देंगे स्वामित्व के दस्तावेज
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में ग्रामीणों को उनकी संपत्तियों का वैधानिक अधिकार देने की मुहिम बड़े पैमाने पर चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर प्रदेश के लाखों पट्टा धारकों को संपत्ति का अधिकार पत्र या रजिस्ट्री वितरित की जाएगी।

प्रदेश सरकार और भारतीय जनता पार्टी इस योजना को बड़े जोर-शोर से प्रचारित कर रही है और विशाल स्तर पर आयोजन भी किया जा रहा है। इस कार्यक्रम के लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन को आमंत्रित किया गया है, लेकिन इस योजना में कई सारी प्रशासनिक त्रुटियां भी सामने आ रही हैं जो सहायक सरकार के संज्ञान में नहीं है।

मध्यप्रदेश में वर्षों से आबादी भूमि और पट्टे की जमीन पर रह रहे परिवारों को अब केवल अधिकार अभिलेख ही नहीं, बल्कि पंजीकृत दस्तावेज के माध्यम से कानूनी मालिकाना हक देने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। 17 सितंबर को इंदौर के सुपर कॉरिडोर क्षेत्र में स्वामित्व योजना के तहत आयोिजत कार्यक्रम में 1.34 लाख लोगों को लाभ मिलेगा।

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