जानिये युद्ध से आप पर क्या असर पड़ेगा: क्या पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे; कीमती धातुओं का क्या होगा, अब कच्चे तेल की आपूर्ति कैसे होगी
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, दिल्ली।
इजराइल और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबरों के बाद पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है। इसका सीधा असर भारत समेत दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। खासकर कच्चे तेल की सप्लाई, पेट्रोल-डीजल के दाम, शेयर बाजार और सोना-चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
क्यों अहम है ‘होर्मुज स्ट्रेट’?
तनाव की सबसे बड़ी वजह होर्मुज स्ट्रेट है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। आशंका है कि अगर यह जलमार्ग बंद हुआ तो वैश्विक तेल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ेगा। एनालिटिक्स फर्म केपलर के मुताबिक, जनवरी-फरवरी 2026 में भारत ने अपनी जरूरत का करीब 50% कच्चा तेल इसी रास्ते से मंगवाया। ऐसे में यदि यह मार्ग बाधित होता है तो सप्लाई घटेगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
1. पेट्रोल-डीजल और महंगाई
कच्चा तेल महंगा होने पर भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं। डीजल महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी, जिसका असर फल-सब्जी, दूध, अनाज समेत रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा। इससे खुदरा महंगाई बढ़ सकती है।
2. शेयर बाजार
तेल की कीमतों में उछाल से कंपनियों की लागत बढ़ेगी और मुनाफा घट सकता है। ऐसे में निवेशक शेयर बेच सकते हैं, जिससे बाजार में गिरावट आ सकती है। युद्ध जैसे हालात में विदेशी निवेशक भी सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं।
3. सोना-चांदी
भू-राजनीतिक तनाव के समय निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश मानते हैं। मांग बढ़ने से कीमतों में तेजी आ सकती है। कमोडिटी एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि यदि संघर्ष लंबा चला तो 10 ग्राम सोना 1.90 लाख रुपए तक पहुंच सकता है।
150 डॉलर तक जा सकता है कच्चा तेल
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को एक दिन के लिए भी ब्लॉक किया, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। फिलहाल ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत करीब 66 डॉलर प्रति बैरल है।
केपलर लिमिटेड की सीनियर क्रूड एनालिस्ट मुयू जू के अनुसार, यदि यह मार्ग बाधित हुआ तो सप्लाई चेन गंभीर रूप से प्रभावित होगी। फरवरी में सैन्य कार्रवाई की आशंकाओं के बीच तेल पहले ही छह महीने के उच्च स्तर पर पहुंच चुका है। ब्लूमबर्ग के विश्लेषण के मुताबिक, रूट असुरक्षित होने पर तेल टैंकरों को पश्चिमी नौसेना की सुरक्षा में चलना पड़ेगा, जिससे शिपमेंट की रफ्तार धीमी होगी और लागत बढ़ेगी।
दुनिया के 20% पेट्रोलियम की आवाजाही इसी मार्ग से
होर्मुज स्ट्रेट करीब 167 किमी लंबा जलमार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के कुल पेट्रोलियम का लगभग 20% हिस्सा यहीं से गुजरता है।सऊदी अरब, इराक, कुवैत और ईरान जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देश अपने निर्यात के लिए इसी पर निर्भर हैं।
प्रतिदिन लगभग 1.78 से 2.08 करोड़ बैरल कच्चा तेल और ईंधन इस मार्ग से गुजरता है। ईरान खुद करीब 17 लाख बैरल प्रतिदिन इसी रास्ते से निर्यात करता है। भारत के कुल नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट का 10% से अधिक हिस्सा भी इसी मार्ग से होता है, जिसमें बासमती चावल, चाय, मसाले और इंजीनियरिंग उत्पाद शामिल हैं।
ईरान को भी होगा नुकसान
यदि होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है तो ईरान खुद अपना तेल निर्यात नहीं कर पाएगा, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर भी भारी असर पड़ेगा। ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है। सप्लाई बाधित होने पर दोनों देशों के संबंधों पर भी असर पड़ सकता है।
विकल्प क्या हैं?
सऊदी अरब के पास ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ का विकल्प है, जो 746 मील लंबी है और रेड सी टर्मिनल तक जाती है। इसके जरिए प्रतिदिन लगभग 50 लाख बैरल तेल भेजा जा सकता है।
भारत भी संभावित संकट को देखते हुए खाड़ी देशों के बाहर से तेल आयात बढ़ा रहा है। जरूरत पड़ने पर सरकार अपने ‘स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ (SPR) का इस्तेमाल कर सकती है।
ईरान-इजराइल तनाव अगर लंबा खिंचता है और होर्मुज स्ट्रेट बाधित होता है, तो इसका सीधा असर तेल कीमतों, महंगाई, शेयर बाजार और सोने-चांदी पर पड़ेगा। हालांकि, यह भी सच है कि यह कदम ईरान के लिए भी आत्मघाती साबित हो सकता है। फिलहाल दुनिया की नजर इस अहम समुद्री मार्ग और पश्चिम एशिया की स्थिति पर टिकी है।
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