जानिये कैसे हुई महाकालेश्वर की उत्पत्ति: जब भक्तों की पुकार पर प्रकट हुए भगवान शिव; पुराणों में मिलता है उल्लेख
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग को लेकर प्रचलित कथा केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथ शिव पुराण में भी मिलता है। पुराणों के अनुसार यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के उस स्वरूप का प्रतीक है, जो अपने भक्तों की रक्षा के लिए स्वयं प्रकट होते हैं।
कथा के अनुसार प्राचीन उज्जयिनी नगरी में वेदप्रिय नामक एक ब्राह्मण अपने चार पुत्रों के साथ निवास करता था। पूरा परिवार शिवभक्ति में लीन रहता था और नियमित रूप से पूजा-अर्चना करता था। उसी समय दूषण नाम का एक शक्तिशाली राक्षस क्षेत्र में उत्पात मचा रहा था। उसने धार्मिक अनुष्ठानों को बंद कराने और लोगों में भय फैलाने का प्रयास किया।
दूषण ने ब्राह्मण और उसके पुत्रों को भी शिव पूजा छोड़ने की धमकी दी, लेकिन उन्होंने भयभीत होने के बजाय और अधिक श्रद्धा से भगवान शिव का स्मरण किया। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर अचानक धरती कंपित हुई और तेज प्रकाश के साथ भगवान शिव प्रकट हुए।
पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने उग्र रूप धारण कर दूषण राक्षस का संहार किया और अपने भक्तों को भयमुक्त किया। इसके बाद उन्होंने उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित होकर सदैव अपने भक्तों की रक्षा करने का संकल्प लिया। यही स्थान आगे चलकर महाकालेश्वर के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
धार्मिक मान्यता है कि “महाकाल” रूप में भगवान शिव समय और मृत्यु के भी स्वामी माने जाते हैं। यही कारण है कि उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में आज भी विशेष रूप से काल और जीवन से जुड़ी आस्था दिखाई देती है।
इस तरह महाकालेश्वर की यह कथा न केवल पुराणों में वर्णित एक धार्मिक प्रसंग है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि सच्ची भक्ति और विश्वास के आगे संकट टिक नहीं पाता और जब श्रद्धा अडिग हो, तो स्वयं महाकाल अपने भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।
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