राजा चंद्रसेन, बालक और महाकाल की कृपा: इस तीर्थनगरी की अनूठी कथा; कैसे त्याग दिया युद्ध का विचार
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्राचीन समय में उज्जैन पर राजा चंद्रसेन का शासन था। वे भगवान शिव के परम भक्त थे और उनके पास एक दिव्य रत्न था, जिसे “चिंतामणि” कहा जाता था। मान्यता थी कि इस रत्न की वजह से राज्य में समृद्धि और सुरक्षा बनी रहती थी।
राजा की इस शक्ति और समृद्धि को देखकर आसपास के कई राजा ईर्ष्या करने लगे।
उन्होंने मिलकर उज्जैन पर आक्रमण की योजना बनाई, ताकि चिंतामणि रत्न को हासिल किया जा सके। जब यह खबर नगर में फैली, तो लोग भयभीत हो गए, लेकिन राजा चंद्रसेन अपने महल में बैठकर पूरी श्रद्धा से भगवान शिव की आराधना में लीन रहे।
इसी दौरान एक गरीब ग्वाले का छोटा बालक राजा को पूजा करते देख प्रभावित हुआ। वह भी घर जाकर एक पत्थर को शिवलिंग मानकर उसी तरह पूजा करने लगा। उसकी मां को यह सब व्यर्थ लगा और उसने गुस्से में आकर उस पत्थर को फेंक दिया।
कथा के अनुसार, जैसे ही बालक का मन टूटा और वह रोते हुए भगवान को पुकारने लगा, उसी क्षण वहां एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। उस स्थान पर एक भव्य मंदिर और शिवलिंग प्रकट हो गया। यह देख आसपास के लोग और राजा चंद्रसेन भी वहां पहुंच गए।
उधर, जो राजा उज्जैन पर आक्रमण करने आए थे, उन्होंने भी इस चमत्कार को देखा और समझ गए कि यह कोई साधारण स्थान नहीं है। उन्होंने युद्ध का विचार त्याग दिया और भगवान शिव की शरण में आ गए।
कहते हैं कि उसी समय भगवान शिव ने “महाकाल” रूप में प्रकट होकर उज्जैन की रक्षा का वचन दिया। इसके बाद से यह स्थान महाकालेश्वर के रूप में प्रसिद्ध हुआ और उज्जैन को उनकी विशेष नगरी माना जाने लगा।
यह कथा बताती है कि सच्ची भक्ति के लिए न धन की जरूरत होती है और न बड़े विधि-विधान की—एक मासूम भाव भी भगवान तक पहुंच सकता है। महाकाल की कृपा वहां जरूर होती है, जहां विश्वास सच्चा होता है।
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