खाकी पर भारी खादी और बेखौफ माफिया: खातेगांव टीआई दिलीप पुरी की मौत ने खड़े किए कई सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

छोटे बदमाशों से डोजियर भरवाकर और फोटोबाजी करती है पुलिस, बड़े गैंगस्टरों का नेताओं के साथ उठना-बैठना
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मंगलवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ कानून-व्यवस्था की समीक्षा की। अवैध शराब के परिवहन, भंडारण और क्रय-विक्रय पर सख्ती से रोक लगाने के निर्देश दिए।
साथ ही केन्द्र सरकार के निर्देशानुसार वर्ष 2029 तक नशे के अवैध कारोबार और ड्रग माफियाओं के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा। वहीं यह भी निर्देश िदए कि नशे के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई के लिए भी मजबूत तंत्र विकसित करें।
खातेगांव टीआई दिलीप पुरी की शराब तस्करों के ट्रक से कुचलकर हत्या ने मध्य प्रदेश में पुलिस और माफिया के रिश्तों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। टिमरनी से गुजरात तक फैले करोड़ों के अवैध शराब सिंडिकेट का खुलासा, कांग्रेस नेता से लेकर वकील और शराब कारोबारियों की गिरफ्तारी और मुख्य आरोपी चालक का पुलिस अभिरक्षा से भागने का प्रयास बताता है कि अवैध कारोबार की जड़ें कितनी गहरी हैं।
सवाल सिर्फ एक टीआई की हत्या का नहीं, बल्कि उस पुलिसिंग का है, जिसमें छोटे-मोटे बदमाशों को थाने बुलाकर डोजियर भरवाने, फोटो खिंचवाने और रील बनाने तक कार्रवाई सिमट जाती है, जबकि बड़े गैंगस्टर और माफिया खुलेआम रसूख दिखाते घूमते हैं।
नेताओं के साथ मंच साझा करते हैं, आयोजनों में नजर आते हैं और पुलिस के साथ उठने-बैठने की तस्वीरें भी सामने आती हैं। आखिर खाकी का खौफ अपराधियों में क्यों नहीं है? क्या इसकी वजह राजनीतिक संरक्षण और पुलिस पर सत्ताधारियों का दबाव है?
टीआई दिलीप पुरी की हत्या के मामले में जांच के दौरान करोड़ों के शराब सिंडिकेट का खुलासा हुआ है। पुलिस ने कांग्रेस नेता राहुल जायसवाल, केरमसिंह और इंदौर के वकील विजय राव को गिरफ्तार कर सात दिन की रिमांड पर लिया है।
मुख्य आरोपी ड्राइवर अक्कू उर्फ गजेंद्र और वाहन के क्लीनर धीरज मंडलोई को भी पकड़ा गया है। पुलिस के मुताबिक, गजेंद्र ने अभिरक्षा से भागने का प्रयास किया, जिसके बाद पुलिस की जवाबी फायरिंग में उसके पैर में गोली लगी।
क्लीनर धीरज के घायल होने की भी जानकारी सामने आई है। हालांकि, इस पूरे नेटवर्क का खुलासा और उसके सरगनाओं तक पहुंचना अभी सबसे बड़ी चुनौती है। यूपी में पुलिस का खौफ कायम है, क्योंकि वहां सीधे ही एनकाउंटर होते हैं।
बात अगर करें एमपी की तो यहां संगीन अपराधों का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम या यूं कहे कि गुंडे-बदमाशों और माफियाओं पर कठोर कार्रवाई के नाम पर यहां महज शार्ट एनकाउंटर होते हैं। वो भी यदाकदा। इसके चलते समय के साथ पुलिस का खौफ कम होता जाता है।
छोटों पर डोजियर, बड़ों से गलबहियां- पुलिस की कार्रवाई का एक चेहरा वह है, जिसमें छोटे अपराधों में शामिल युवकों को थाने बुलाकर डोजियर भरवाए जाते हैं, लाल-पीले कागज थमाए जाते हैं और फोटो-वीडियो बनाकर कार्रवाई का प्रचार किया जाता है।
दूसरा चेहरा उन बड़े बदमाशों का है, जिनकी राजनीतिक पहुंच और रसूख के किस्से चर्चा में रहते हैं। उनके जन्मदिन, आयोजनों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के आरोप भी पुलिसिंग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं।
इसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर नजर आ ही जाते हैं। ऐसे में सवाल है कि जब अपराधियों को यह भरोसा हो जाए कि रसूख के दम पर कार्रवाई से बचा जा सकता है, तब कानून का डर कैसे कायम होगा?
नेताओं का संरक्षण खत्म हुए बिना कैसे रुकेंगे अपराध?
अपराधियों के हौसले बढ़ने के पीछे राजनीतिक संरक्षण की शिकायतें लंबे समय से उठती रही हैं। आरोप है कि किसी प्रभावशाली नेता की नाराजगी पर पुलिसकर्मियों को लाइन अटैच या निलंबित कर दिया जाता है।
हाल ही में एरोड्रम थाने के टीआई वेदेंद्र सिंह कुशवाह सहित पांच पुलिसकर्मियों के निलंबन का मामला भी इसी बहस के केंद्र में रहा। जब पुलिसकर्मी अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले राजनीतिक प्रतिक्रिया का हिसाब लगाने लगें, तो अपराधियों में खौफ पैदा करना मुश्किल है।
टीआई दिलीप पुरी की पत्नी कविता ने भी उनके सेंधवा में पदस्थ रहने के दौरान एक नेता द्वारा धमकी दिए जाने और परेशान किए जाने का आरोप लगाया है। इस आरोप की भी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
चार दिन का फ्री हैंड नहीं, पांच साल का चाहिए
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शराब माफिया को खत्म करने के लिए पुलिस को फ्री हैंड देने की बात कही है, लेकिन सवाल यह है कि पुलिस को सिर्फ शराब माफिया के खिलाफ ही नहीं, बल्कि जमीन माफिया, ड्रग्स माफिया, अवैध हथियारों के कारोबारियों, वसूली करने वाले गिरोहों और राजनीतिक संरक्षण में पल रहे हर अपराधी के खिलाफ कार्रवाई की स्वतंत्रता क्यों नहीं मिलनी चाहिए?
पुलिस को चार दिन के अभियान या किसी बड़ी वारदात के बाद मिलने वाली छूट नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल में निष्पक्ष कार्रवाई का अधिकार चाहिए। कानून के सामने नेता, अफसर और अपराधी सभी बराबर हों।
चुनाव आचार संहिता के दौरान पुलिस पर राजनीतिक दबाव अपेक्षाकृत कम होने से कई मामलों में कार्रवाई की स्वतंत्रता बढ़ती है। यही निष्पक्षता सामान्य दिनों में भी दिखनी चाहिए। पहले शहरों में गुंडा अभियान के दौरान बदमाशों में ऐसा खौफ रहता था कि वे त्योहारों पर शहर छोड़कर चले जाते थे।
आज सवाल यह है कि क्या पुलिस फिर वैसा भरोसा और भय कायम कर पाएगी? बड़े अपराधियों के राजनीतिक संपर्क, आयोजनों में उनकी मौजूदगी और पुलिस के साथ नजदीकियों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई से कायम होगा पुलिस का खौफ
टीआई दिलीप पुरी की मौत सिर्फ एक पुलिस अधिकारी की हत्या नहीं, बल्कि कानून के इकबाल के सामने खड़ी चुनौती है। अब कार्रवाई का पैमाना थाने में फोटो खिंचवाने वाले छोटे बदमाश नहीं, बल्कि अवैध कारोबार चलाने वाले बड़े चेहरे होने चाहिए।
खाकी का खौफ तभी लौटेगा, जब अपराधी का रसूख उसके लिए ढाल नहीं बनेगा और खादी का दबाव खाकी के फैसलों पर भारी नहीं पड़ेगा, क्योंकि पुलिस का खौफ नेताओं की मेहरबानी से नहीं, निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई से कायम होता है।
केरम सिंह बोला था- कुछ भी हो गाड़ी पकड़ाना नहीं चाहिए
1-2 नंवबर की दरमियानी रात इंदौर-बैतूल हाइवे पर शराब तस्करी कर गुजरात ले जा रहे ट्रक चालक अक्कू उर्फ गजेंद्र ने खातेगांव टीआई दिलीप पुरी की कुचलकर हत्या कर दी थी। हत्या के बाद से चालक अक्कू और क्लीनर धीरज मंडलोई निवासी रामपुरा जोबट फरार थे।
कल पुलिस ने दोनों को आलीराजपुर के चंद्र शेखर आजाद नगर से पकड़ लिया। बरोठा थाना क्षेत्र में अक्कू ने हथियार छीनकर भागने की कोशिश की। इसके चलते पुलिस ने उसका शार्ट एनकाउंटर कर दिया। क्लीनर धीरज को भी पैर में गोली मारी है।
पुलिस ने टिमरनी के कांग्रेस नेता राहुल जायसवाल और केरम सिंह सहित अन्य को गिरफ्तार किया था। सोमवार रात तस्दीक के लिए जब केरम सिंह को संदलपुर फाटा ले जाया गया तब उसने भागने की कोशिश की और घायल हो गया।
सूत्रों के मुताबिक पता चला है कि केरम सिंह ने शराब तस्करी के लिए ट्रक उपलब्ध कराया था। ड्राइवर अक्कू केरम सिंह के संपर्क में था। जब टीआई पुरी ने ट्रक की घेराबंदी की तो केरम सिंह ने ही चालक अक्कू से कहा था कि कुछ भी हो जाए गाड़ी पकड़ाना नहीं चाहिए, बाकी बातें बाद में निपट लेंगे।
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