ऐसे हो सकता है एमआर-11 का पूरा निर्माण: रास्ते को प्रशासन के कदम का इंतजार
KHULASA FIRST
संवाददाता

मास्टर प्लान की सड़क की शासकीय भूमि को अवैध कब्जा और डिक्री के खेल में उलझाया
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर के विकास और सुगम यातायात के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले एबी रोड और बायपास को जोड़ने वाले मास्टर प्लान के प्रमुख मार्ग एमआर-11 के निर्माण में एक बड़ा संदिग्ध भू-घोटाला और प्रशासनिक पेचीदगी सामने आई है। इसके चलते इस लिंक रोड का निर्माण कई वर्षों से रुका हुआ है।
यहां पर यह बाधा एक छोटे-से मंदिर के कारण है। इस मंदिर के आसपास की सरकारी जमीन अपनी बताकर कुछ प्रभावशाली लोगों ने कब्जा कर लिया। जैसा कि आमतौर पर होता है, धार्मिक स्थल के नाम पर सेवा भूमि सरकार के बजाय निजी हो जाती है।
इस मामले में भी ऐसा ही कुछ पेंच है। प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह मामला उलझा हुआ ही छोड़ दिया गया। यदि प्रशासन कदम बढ़ाए तो राह मिल सकती है।
ग्राम लसूड़िया स्थित शासकीय भूमि (सर्वे नं. 45/2, रकबा करीब 4.00 एकड़) पर अनधिकृत कब्जों और संदिग्ध डिक्री के कारण इस बहुप्रतीक्षित सड़क का निर्माण कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इस भूमि का मूल्य करोड़ों रुपए है।
यह है पूरा मामला... मास्टर प्लान-2021 के तहत आरक्षित इस मार्ग की भूमि को लेकर न्यायालय और प्रशासनिक स्तर पर कई चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा हुआ है।
डिक्री और पुजारी के अस्तित्व पर सवाल... दशम व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-2, इंदौर के न्यायालय में बाबा पूजनदास उदासी (निवासी ग्राम लसूड़िया) द्वारा कब्जे के आधार पर भूमि स्वामी घोषित करने हेतु वाद (क्रमांक-195 ए/04) दायर किया गया था।
शासनहित में मजबूत पैरवी न होने के कारण 20 सितंबर 2005 को उक्त भूमि पर बाबा पूजनदास को भूस्वामी घोषित करने का आदेश पारित कर दिया गया। हैरानी की बात यह कि वर्ष 2005 में डिक्री पारित होने के पूर्व से ही मूल डिक्रीधारी बाबा पूजनदास का कोई अता-पता नहीं है।
अधूरी प्रक्रिया और खारिज नामांतरण... बाबा पूजनदास के तथाकथित आम मुख्तार भगतराम (निवासी साउथ तुकोगंज, इंदौर) ने वर्ष 2010 में तहसील न्यायालय में नामांतरण हेतु आवेदन प्रस्तुत किया था।
प्रकरण (क्रमांक 154/अ-6/9-10) के परीक्षण में पाया गया कि आवेदन में मुख्तारनामे का कोई उल्लेख नहीं था और न ही बाबा पूजनदास द्वारा कभी कोई वैध आम मुख्तारनामा प्रस्तुत किया गया।
गायब रहे मूल डिक्रीधारी... 7 अप्रैल 2010 से 19 अक्टूबर 2010 के बीच मूल डिक्रीधारी पूजनदास एक बार भी न्यायालय में उपस्थित नहीं हुए, जिसके चलते तहसीलदार द्वारा नामांतरण आवेदन निरस्त कर दिया गया था।
मौके पर कब्जे की जमीनी हकीकत... यह 1.615 हेक्टेयर भूमि एक लंबी पट्टी के कैंपस के रूप में बाउंड्रीवॉल से घिरी हुई है। कभी इस जगह पर महज 8x8 फीट का एक छोटा-सा मंदिर हुआ करता था और शेष भूमि पूरी तरह पड़त थी, जो आज भी पड़त है।
अब इस बेशकीमती जमीन पर अपना कब्जा जमाने और उसे वैध दिखाने के उद्देश्य से अलग-अलग स्थानों पर 4-5 बड़े-बड़े टीन शेड खड़े कर लिए गए हैं। मौके पर ‘पंजाब अरोड़वंशी गोशाला’ के नाम का एक बोर्ड भी चस्पा बताया जाता है।
स्थानीय स्तर पर बताया जाता है कि बाबा पूजनदास को इस क्षेत्र में आते-जाते कभी नहीं देखा गया। बाउंड्रीवॉल और शेड बनाकर कब्जा करने का यह पूरा खेल लसूड़िया क्षेत्र के कुछ स्थानीय व्यवसायियों द्वारा किया जा रहा है, जबकि मूल डिक्रीधारी व्यक्ति का अस्तित्व ही संदिग्ध है।
यह है प्रशासनिक कार्रवाई का रास्ता
प्रशासन द्वारा सरकारी भूमि को कब्जे से मुक्त करने के लिए अपील में जाना होगा। राजस्व अधिकारियों के मुताबिक केवल नामांतरण निरस्त होने से इस बेशकीमती शासकीय भूमि को अतिक्रमणमुक्त नहीं कराया जा सकता। इसके लिए प्रशासन के पास निम्नलिखित ठोस कदम उठाने का विकल्प मौजूद है-
डिक्री के खिलाफ अपील
चूंकि मामला शासकीय भूमि से जुड़ा है, इसलिए जिला प्रशासन द्वारा इस पुरानी डिक्री के विरुद्ध उच्च न्यायालय या ऊपरी अदालत में अपील दायर की जानी चाहिए।
पुन: शासकीय संपत्ति घोषित करें
मूल भूमिस्वामी के अस्तित्व में न होने और कानूनी प्रक्रिया के पालन के अभाव में भूमि का कब्जा लेकर इसे पुनः शासकीय घोषित किया जाए। अवैध निर्माणों व मार्ग के उपयोग वाली इस भूमि पर बिना किसी वैध अनुमति के खड़े किए गए शेड्स, बाउंड्रीवॉल और अन्य अवैध कब्जों को तत्काल प्रभाव से ध्वस्त किया जाए।
पर्दे के पीछे कौन?
मात्र नामांतरण निरस्त होने से बात नहीं बनेगी। सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन इस संदिग्ध डिक्री को चुनौती देने के लिए कोई कानूनी कदम उठाएगा? बाबा पूजनदास नामक कोई वास्तविक व्यक्ति इस दुनिया में मौजूद है या नही, या यह सिर्फ कागजों पर खड़ा किया गया एक किरदार है? जांच का विषय यह भी है कि भगतराम जुनेजा द्वारा किस अधिकार और आधार पर नामांतरण का आवेदन प्रस्तुत किया गया था?
मास्टर प्लान की इस बहुमूल्य मार्ग की भूमि पर जब मूल व्यक्ति का कोई अता-पता नहीं होना बताया जा रहा है, तो असल में यहां किसका कब्जा है? कहा जा रहा है कि क्रेन व्यवसाय से जुड़े लोग इसमें प्रमुख रूप से शामिल हैं।
मार्ग की उपयोगिता वाली इस सार्वजनिक भूमि पर बिना अनुमति के मंदिर की आड़ में बाउंड्रीवॉल और शेड खड़े करने की छूट किसने दी? यह सवाल महत्वपूर्ण है इसका जवाब प्रशासन को देना चाहिए।
यदि जिला प्रशासन, आईडीए और नगर निगम थोड़ी-सी भी सख्ती व तत्परता दिखाएं, तो शहर की इस महत्वपूर्ण जीवनरेखा के रास्ते की तमाम बाधाएं दूर हो सकती हैं। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन बिना देर किए कदम बढ़ाए, ताकि जनता को सुगम मार्ग मिल सके।
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