हिम-सिंहासन है केदारनाथ जहां नियति भी मांगती है महादेव की अनुमति: सांसों की अग्निपरीक्षा और मोक्ष का साक्षात्कार; हिमालय की गोद में केदारनाथ धाम आस्था का सबसे कठिन सफर
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संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
‘न केदार समं तीर्थं न कृतं न भविष्यति। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन द्रष्टव्यः केदारेश्वरः॥’ (स्कंद पुराण, केदार खंड)
अर्थात्- केदारनाथ के समान कोई दूसरा तीर्थ न कभी हुआ है और न ही भविष्य में कभी होगा। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में हर संभव प्रयत्न करके भगवान केदारेश्वर के दर्शन अवश्य करने चाहिए।
बारह ज्योतिर्लिंगों की स्तुति में केदारनाथ के महत्व को इस पंक्ति से भी समझा जा सकता है- हिमाद्रौ तु केदारं...’ अर्थात् हिमालय के धवल शिखरों पर साक्षात केदारेश्वर विराजमान हैं। शून्य से शिखर तक की पुकार समुद्र तल से 11,759 फीट की उस अलौकिक ऊंचाई पर, जहां मंदाकिनी नदी की कल-कल ध्वनि और हिमालय की धवल चोटियों का पहरा है, वहां विराजमान हैं- बाबा केदार।
यह केवल पत्थरों से निर्मित कोई ढांचा नहीं, बल्कि अनगित श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और हमारे देश की अजेय सनातनी जिजीविषा का जीवंत प्रतीक है। जब सुमेरु पर्वत की चोटियों को सूर्य की पहली रश्मि स्पर्श करती है, तो पूरी केदार घाटी किसी स्वर्ण-मुकुट की भांति दमक उठती है।
केदारनाथ धाम की यह यात्रा देह की थकान मिटाने का साधन नहीं, अपितु आत्मा के विश्राम का वह मार्ग है जहां पहुंचते ही इंसान खुद को ईश्वर के सबसे करीब महसूस करता है। कल यानी 22 अप्रैल को जब मंदिर के कपाट खुलेंगे तो यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और परमात्मा के महा-मिलन का उत्सव भी बन जाएगा।
क्या कहते हैं हमारे पौराणिक ग्रंथ... हम पौराणिक ग्रंथों और इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो जानकारी मिलेगी कि कुरुक्षेत्र के पश्चाताप से केदार के प्राकट्य तक केदारनाथ की कथा सीधे महाभारत के उस कालखंड से जुड़ती है जब विजय के बाद भी पांडव गोत्र-हत्या के ग्लानि से दबे थे।
मुक्ति की खोज में जब वे हिमालय के इन दुर्गम अंचलों में पहुंचे, तो महादेव उनसे रुष्ट थे। शिव ने ‘महिष’ (बैल) का रूप धारण कर पांडवों को छकाने का प्रयास किया, लेकिन महाबली भीम ने उन्हें पहचान लिया। गुप्तकाशी से केदार तक की उस दिव्य लुका-छिपी में जब महादेव धरती में समाने लगे, तो भीम ने बैल की पीठ के कूबड़ (अचल शिला) को दृढ़ता से पकड़ लिया।
वही भाग केदारनाथ धाम में ‘दिव्य ज्योतिर्लिंग’ के रूप में पूजा जाता है, जबकि उनके शरीर के अन्य हिस्से ‘पंच-केदार’ के रूप में अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए। यह स्थान साक्षी है कि यदि श्रद्धा सच्ची हो, तो महादेव को भी भक्त के वश में होना पड़ता है।
इतिहास और विज्ञान का अनूठा संगम
400 वर्षों की ‘बर्फीली कैद’ और चमत्कार इतिहास और विज्ञान का ऐसा अनूठा संगम कहीं और नहीं मिलता। भूगर्भ शास्त्रियों के शोध इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच आए ‘लिटल आइस एज’ यानी लघु हिमयुग के दौरान यह मंदिर लगभग 400 वर्षों तक ग्लेशियर के नीचे दबा रहा।
आश्चर्य की बात यह है कि जब सदियों बाद बर्फ पिघली, तब भी कत्यूरी शैली में बना यह मंदिर अपनी जगह से एक इंच भी नहीं डिगा। मंदिर की पीली दीवारों पर आज भी बर्फ की रगड़ के निशान उस भीषण दौर की गवाही देते हैं।
इसी परंपरा में 2013 की प्रलयंकारी बाढ़ का वह दृश्य भी जुड़ गया, जब एक विशाल ‘भीम शिला’ ने मंदिर के पीछे ढाल बनकर तबाही के प्रवाह को दो हिस्सों में बांट दिया और बाबा केदार का दरबार अक्षुण्ण रहा।
आस्था, संकल्प और फेफड़ों की परीक्षा
गौरीकुंड से शुरू होने वाली 18-20 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई केवल एक पैदल यात्रा नहीं, बल्कि भक्ति और धैर्य की अग्निपरीक्षा है। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, हवा में ऑक्सीजन का स्तर घटने लगता है और बर्फीली हवाएं फेफड़ों की परीक्षा लेती हैं।
यहां का मौसम ‘पल में तोला, पल में माशा’ की तर्ज पर व्यवहार करता है। कभी खिली धूप आस्था से भरे श्रद्धालुओं का हौसला बढ़ाती है, तो कभी अचानक शुरू हुई बर्फबारी उनके संकल्प को भरपूर परखती है।
किंतु, जब 80 वर्ष के बुजुर्ग और नन्हे बच्चों के कंठ से ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष गूंजता है, तो थकान का नामो-निशान मिट जाता है। घोड़े-खच्चरों की टापों और घंटियों की आवाज के बीच हर श्रद्धालु अपनी निजी व्यथा भूलकर बस उस शिखर की ओर बढ़ता है, जहां आज भी मोक्ष की आस जीवित है।
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