जंतर-मंतर का जनमंत्र: युवाओं की आवाज को सुने-समझे सरकार; राजनीति का नहीं देश के मन की बात का आंदोलन
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर कल का कॉकरोच जनता पार्टी के मुद्दों को लेकर युवाओं ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। इसे मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों ने हमेशा की तरह आंदोलन को राजनीति में घसीटने की कोशिश की।
सवाल उठाए कि प्रदर्शन को सरकार ने अनुमति क्यों और कैसे दे दी? पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके को गिरफ्तार क्यों नहीं किया वगैरह-वगैरह। अनुमति नहीं देते और गिरफ्तार करते तो इसके उलट हो जाते कि ऐसा क्यों किया और सरकार की खूब आलोचना की जाती।
अंतरराष्ट्रीय स्तर तक सवाल खड़े होते और सरकार की बदनामी होती। मीडिया और विश्लेषकों ने देश के हालात और विद्यार्थियों-युवाओं के इस आंदोलन पर गंभीर बहस खड़ी नहीं की। जनता के मन के मंत्र को जानने की जरूरत है और सरकार के लिए भी जरूरी है अपनी बेहतरी के लिए।
चुनाव और दिल्ली, दोनों अभी दूर हैँ इसलिए सरकार को देश के मन की बात पर विचार करना चाहिए। युवाओं से संवाद करना चाहिए। जैसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर युवाओं से बतियाते हैं कुछ इस तरह की पहल कर सकते हैं, राजनीतिक नफे नुकसान से हटकर।
यह प्रदर्शन जितना महत्वपूर्ण अपने मुद्दों के कारण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण उन सवालों के कारण भी, जो मीडिया द्वारा हो सकता है जानबूझकर भी खड़े किए गए हैं। क्या यह स्वतःस्फूर्त युवा आंदोलन है? जवाब यही है युवाओं की मन की बात को लेकर है और कुछ ऐसी ही आवाज देश के अमूमन हर वर्ग से सुनाई दे रही है। सरकार के मौन से लोकतंत्र के सवाल बलवती हो रहे हैं।
क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक संरक्षण है? यह स्वाभाविक है विपक्ष विकल्प पेश नहीं कर पा रहा है और उसे ऐसे अवसरों की तलाश रहती है। यह भारतीय राजनीति की पुरानी तासीर है लेकिन इस समय युवा राजनीति के फेर में नहीं आने वाले।
उन्हें तो इस समय बस सरकार व विपक्ष की जवाबदेही से मतलब है। उनके लिए दोनों समान हैं। सरकार का गुणगान करने वाला मीडिया भी जिम्मेदारी और जवाबदेही का अहसास करना चाह रहा है।
सरकार ने छवि बचाने के लिए नरम रुख अपनाया?
यह कारण महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार की छवि सहमति और सहिष्णुता वाली नहीं बन पाई है। क्या भविष्य के किसी नए राजनीतिक मंच की प्रस्तावना है? देश का युवा, जो इस समय आंदोलनरत हैं, वह सिस्टम को जवाबदेह बनाने के लिए ज्यादा है यही सरकारें भी चाहती हैं लेकिन करती नहीं इसलिए तरुणाई राजनीति से बचेगी।
इस आंदोलन को रोक-टोक के बिना होने देने के पीछे अंतरराष्ट्रीय पहलू भी हो सकता है। जहां तक अंतरराष्ट्रीय छवि का सवाल है लंदन के बिर्कबेक कॉलेज में आयोजित ‘आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस एंड इंटरनेशनल लॉ’ विषयक कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से कुछ श्रोताओं ने भारत में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के प्रति बढ़ती कथित असहिष्णुता पर सवाल पूछने की कोशिश की।
आयोजकों ने इन सवालों को कार्यक्रम के विषय से बाहर बताते हुए रोक दिया, जिससे विवाद हो गया। भारत के उच्चायोग ने इसे ‘अनुचित और असभ्य व्यवहार’ बताया। दिलचस्प है सवाल वही था जो भारत में विपक्ष और नागरिक समाज बार-बार उठाता रहा है—क्या भारत में असहमति की पर्याप्त स्वतंत्रता है?
सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की जंतर-मंतर का प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है कि विरोध की पूरी आजादी है। जबकि आलोचक पूछेंगे ऐसा है तो लोकतंत्र और असहमति पर पूछे गए सवालों से सरकार में असहजता क्यों दिखाई देती है? वर्तमान परिस्थितियों में यह कहना अधिक उचित होगा कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन राजनीतिक दलों की लड़ाई से अधिक देश के युवाओं द्वारा व्यवस्था से जवाबदेही की मांग का आंदोलन है। इसे किसी दल विशेष के समर्थन या साजिश से जोड़ने के बजाय इसके मूल मुद्दों पर गंभीर चर्चा होना अधिक आवश्यक है।
तीन प्रधान: एक सवाल
कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन ने एक दिलचस्प प्रतीकात्मक स्थिति पैदा कर दी है। देश के युवा आज तीन ‘प्रधानों’ के सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं— पहले प्रधान है प्रधानमंत्री, दूसरे प्रधान न्यायाधीश और तीसरे हैं शिक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान।
जेन-जी यानी युवाओं का यह आंदोलन इन तीन प्रधानों के कारण आकर ले पाया है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है कि समय रहते सरकार, समाज और लोकतंत्र के चारों स्तंभ को प्रधान सवालों पर सोचने के लिए युवाओं ने मजबूर किया है।
प्रधान न्यायाधीश को साधुवाद कि उनकी टिप्पणी के कारण देश की हकीकत सामने आई। उनकी टिप्पणी भी अपरोक्ष रूप से यही कहती है कि युवा किस कदर परेशान हैं? यही कारण है बरसों से भीतर ही भीतर आकार ले रहा आक्रोश का ज्वालामुखी समय रहते बाहर आ गया इसने देश के जिम्मेदारों को सकारात्मक सोच के लिए मजबूर किया है।
युवाओं के सवाल रोजगार, भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता, शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही और भविष्य की सुरक्षा से जुड़े हैं। जंतर-मंतर से सोशल मीडिया तक लगातार उठ रहे हैं लेकिन युवाओं को लगता है स्पष्ट और संतोषजनक उत्तर नहीं मिला है।
राजनीतिक सत्ता, न्यायिक व्यवस्था और शिक्षा प्रशासन—तीनों संस्थाएं लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। ऐसे में युवाओं की अपेक्षा केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जवाबदेही और समाधान की है।
आज तस्वीर कुछ ऐसी दिखाई देती है कि तीन प्रधान अपने-अपने संस्थागत दायित्वों के साथ खड़े हैं, जबकि उनके सामने देश का युवा वर्ग अपने भविष्य को लेकर प्रश्न पूछ रहा है।
लोकतंत्र में सवाल पूछना युवाओं का अधिकार है और उन सवालों का जवाब देना संस्थाओं की जिम्मेदारी। यही कारण है यह आंदोलन किसी व्यक्ति या दल से अधिक उस संवाद की मांग बन गया है, जिसका इंतजार देश के लाखों युवा कर रहे हैं।
इस्तीफा जवाबदेही का प्रतीक
कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को किसी व्यक्ति विशेष को पद से हटाने की मांग के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
यह दरअसल शिक्षा व्यवस्था, भर्ती परीक्षाओं, सिस्टम में अनियंत्रित भ्रष्टाचार और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही तय करने का एक प्रतीकात्मक संदेश है।
वैसे सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों के प्रति बेहद कठोर रहे हैं। गैर जिम्मेदार मंत्रियों को उन्होंने दंडित भी किया है इसलिए शिक्षा मंत्रालय को लेकर भी वह निश्चित तौर पर कठोर कदम उठाएंगे और हो सकता है इसके लिए उन्हें उचित समय का इंतजार हो।
यह भी सच है कई अवसरों पर देश में ऐसे मामलों पर संवेदनशीलता के साथ मंत्रियों ने स्वयं त्यागपत्र दे दिए या फिर लिए गए। लेकिन सरकारों और सरकारी सिस्टम को बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा।
केवल मंत्री के इस्तीफा देने भर से परीक्षा प्रणाली की खामियां, भर्ती प्रक्रियाओं की समस्याएं या युवाओं की बेरोजगारी जैसी चुनौतियां स्वतः समाप्त नहीं हो जाएंगी। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब किसी विभाग को लेकर लगातार सवाल उठते हैं, तब जवाबदेही की मांग अक्सर इस्तीफे के रूप में सामने आती है।
युवाओं का मूल सवाल एक मंत्री से अधिक उस व्यवस्था से है, जो बार-बार विवाद और अव्यवस्था के घेरे में आती रही है इसलिए असली चुनौती पद परिवर्तन नहीं बल्कि व्यवस्था में भरोसा बहाल करने और ठोस सुधार लागू करने की है।
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